हाय पानी! बिगाड़ दी तुमने शहर की फ़िज़ा

एक फ़िल्म के गीत की पंक्तियाँ ‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा’ आज शहर के भगीरथपुरा काण्ड पर सटीक बैठ रहा है। इस पानी ने, जिसका रंग भी दूषित नहीं पर, इस शहर की फ़िज़ा बिगाड़ दी। कई अफ़सरों की सीआर बिगाड़ दी, यही नहीं कई नेताओं का पानी भी उतार दिया। बीते 8 दिनों से अपने सोशल मीडिया को भी अपडेट नहीं कर पा रहे, ऐसे नेताओं का रंग भी उतार दिया। और फिर भी अब तक नगर निगम का अमला इस बात की खोज ही कर रहा है कि आख़िर पाइपलाइन का लीकेज कहाँ से हुआ!

शहर इन्दौर की कुण्डली में न जाने कौन से राहु-केतु बैठ गए, जिनके कारण शहर बीते एक वर्ष से तो चैन की साँस तक नहीं ले पा रहा है। कभी एमवाय में चूहे नवजात बच्चों को कुतर देते हैं तो कभी कोई ट्रक आम जनता पर चढ़ जाता है। कहीं एक्सपायरी दवाएँ मरीज़ों की जान ले लेती हैं। कहीं बसों का अंधाधुंध चलना, कहीं सड़क दुर्घटनाओं में जाती जाने, कहीं मंत्री का मौन तो कहीं जनप्रतिनिधियों की चुप्पी। शहर सच में भगवान भरोसे ही हो गया। फिर अंततः इस ज़हरीले पानी पर शहर का गुस्सा अब तक फूट ही रहा है।
इस ज़हरीले पानी ने 20 से अधिक लोगों की जान ले ली और बेशर्म प्रशासन अब भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि आख़िर कितने लोग अपनी जान दे चुके। माननीय न्यायालय यदि फटकार नहीं लगाता तो शायद 18 लोग भी घोषित नहीं हो पाते, प्रशासन तो 4 पर ही अटका हुआ था।
शहर के कुछ क्षेत्रों का पानी ही दूषित नहीं हुआ, बल्कि शहर की राजनीति ही दूषित होकर अफ़सरशाही के भरोसे चल रही थी। ईश्वर यदि सद्बुद्धि नहीं देगा तो यकीनन यह पानी आगामी चुनाव में सत्तासीन दल के मंसूबे पर पानी फेर देगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

चीख़ती जनता, तड़पती ज़िन्दगी और शहर में मौत का ताण्डव

हिंदी फ़िल्म के गीत की यह पंक्तियाँ ‘तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही, मुझको सज़ा दी प्यार की’, आज इन्दौर के भागीरथपुरा पर हूबहू ठीक बैठ रही है। पार्षद, महापौर, विधायक और सांसद तक को अपने मत का तोहफ़ा देकर जीत दिलवाने वाला क्षेत्र आज बिना किसी ग़लती के मौत की सज़ा पा रहा है तो निकलने वाली आह निश्चित रूप से पीड़ा का स्वर ही होगी।
बीता हुआ साल का आख़िरी सप्ताह शहर के दुर्भाग्य में शामिल हो गया, एक ऐसे अनजाने गुनाह की सज़ा के रूप में भागीरथपुरा के 200 से अधिक लोग अस्पताल में अपनी ज़िंदगी की भीख माँग रहे हैं और 10 से अधिक ज़िन्दगी तो मौत से इश्क़ कर बैठी और उसमें शामिल एक दुधमुंहा 5 महीने का बच्चा भी है, जिसकी माँ ने दूध में पानी इसलिए मिलाया था ताकि बच्चा दूध पचा सके। उस माँ को क्या पता था कि यह पानी ही ज़हर है। अनजाना गुनाह यह कि उन्होंने आँख बंद करके उस राजनैतिक दल को चुना, जिसके रहम ओ करम पर एक अधिकारी 20 साल से इसी शहर की पानी की व्यवस्था में संजीव रूप से तैनात है, एक अधिकारी शिकायतों की फ़ाइलें अपने पास महीनों से दबा कर बैठा, उस क्षेत्र का पार्षद भयावहता के बाद भी झूला झूलने कर फुरसत का समय काट रहा।
इस गंदे पानी ने शहर का पानी ही उतार दिया, प्रदेश सरकार नगर में आती है, मृतकों की जान की क़ीमत 2 लाख रुपए लगा कर निकल जाती है, पर कमाऊ अफ़सरों पर मुँह में दही जमा लेती है। नगर सरकार ‘घण्टा’ बजा रही है।
कभी चुल्लू भर पानी में डूब कर मरने का मुहावरा था, अब इन्दौर के लिए ‘चुल्लू भर भागीरथपुरा का पानी पिला दो’ यह मुहावरा गढ़ दिया। हुक्मरानों से क्या उम्मीद करेगी जनता, जो जनता को साफ़ पानी तक पीने के लिए नहीं दे सके।
किसी फ़िल्म का संवाद था कि ‘जनता तो मरने के लिए ही बनी है’ उसी संवाद को इन्दौर में सही साबित होता देख रहे हैं।
माफ़ी तो जनता को माँगनी चाहिए, जो अपने वोट से तोल दिया ऐसे लोगों को, जिनका पानी ही उतर गया।
शहर में 59 ऐसे अन्य स्थान भी हैं जो भागीरथपुरा बनने की कगार पर हैं, जहाँ के पानी के सेम्पल फैल हो चुके हैं। पर नगर सरकार जागे तब तो, अन्यथा वहाँ भी लोग मरेंगे, तब 2 लाख रुपए का नमक लगा कर इति श्री कर लेंगे।
ऐसे में कैलेंडर नव वर्ष की सूचना इन्दौर की चरमराती और दूषित होती व्यवस्थाओं ने दे दी। जनप्रतिनिधियों की थकी हुई जमात तो बारूद के ढेर पर बैठकर शहर को मौत का मंज़र परोस कर अपनी नींद सो रहे हैं। अब तो शहर के प्रभारी मंत्री को भी सुध लेने का भी नहीं कह सकते, पता नहीं किस तरह फिर शहर के अहित को बलवान कर दे। अब तो ईश्वर ही शेष है, जिनसे न्याय की उम्मीद है और वही एकमात्र सहारा भी है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

अटल जी की स्मृति को नगर निगम ने दिया स्थायी पता : अटल बिहारी मार्ग

देशभर में नाम परिवर्तन की बयार छाई हुई है, कहीं शहरों के नए नामकरण हो रहे हैं तो कहीं-कहीं गाँव, गली और मोहल्लों के नाम बदले जा रहे हैं। कहीं इमारतों के नाम तक बदल दिए, ऐसे में नगर निगम इंदौर ने पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को इंदौर में जीवटता से प्रस्तुत करते हुए महत्त्वपूर्ण आगरा-बॉम्बे मार्ग का नाम बदल कर अटल बिहारी मार्ग कर दिया है।
अटल जी की जन्मशताब्दी के सुअवसर पर इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपनी निष्ठा वाले राजनैतिक दल के पितृपुरुष व भारत के गौरवशाली प्रधानमंत्री के नाम पर एबी रोड़ का नाम परिवर्तन कर शहर को गौरव तो दिया ही, साथ में अपनी पार्टी के आकाओं की नज़र में भी एक बड़ा काम कर दिया है।
अब शहर के जिस मार्ग को अटल जी के नाम पर किया है, उसे शराबखोरी, पब और अन्य अवैधानिक गतिविधियों से भी मुक्त कर अटल जी को श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
श्रद्धेय अटल जी ने जिस सांस्कृतिक निष्ठा का जीवन पर्यन्त अनुपालन किया, उसे ध्यान में रखकर उस मार्ग की सद्गति भी निर्धारित की जाए। यदि उसी मार्ग पर कोई शराबी, चरसी, नशेड़ी पब से निकले और पुलिस की धरपकड़ में आया तो यही लिखा जाएगा कि अटल बिहारी मार्ग पर पकड़ाए नशेड़ी, यह भी नाम के साथ विरोधाभास और कलंकित कृत्य होगा। ऐसे में जनता तो चाहती है कि एबी रोड को पब कल्चर से मुक्ति दिलाई जाए, आपराधिक तत्त्वों की धरपकड़ कर कम से कम उस मार्ग की तमाम शराब दुकानों को हटवाया जाए, ताकि पूर्व प्रधानमंत्री के नाम की गरिमा अनुरूप कार्य हो। संस्कृति और साहित्य का केन्द्र भी उस मार्ग पर बन सकता है। महापौर भार्गव से इस दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर, मध्यप्रदेश

लघुकथा- वायरल बुआ

लघुकथा

वायरल बुआ

“अरे! मुझे बता ये किसकी फ़ोटो सोशल मीडिया पर है?” रॉबिन ने इंटरनेट पर अपने दोस्त सनी को अपने फ़ोन में एक फ़ोटो देखकर कहा।

सन्नी ने कहा- “भाई होगी कोई, पर देख तो कॉफ़ी हाउस में बैठकर खुलेआम अपने बॉयफ्रेंड के साथ मस्ती कर रही है लड़की…।”
रॉबिन गौर से तस्वीर देखने के बाद एकदम चुप था, कुछ बोला नहीं।

“भाई! तू क्यों चुप हो गया इसे देखकर? तू भी देख, नया फ़ोटो है”, सन्नी ने कहा।

“चल छोड़ न सन्नी, हमें क्या…पर किसने अपलोड की होगी यार!”
सन्नी तपाक से बोल गया, “अरे वायरल बम है भाई…. इस समय ट्रेंडिंग हो रही है….. वायरल लड़की है।”

“नहीं भाई! यह फ़ोन हैक करके भी तो किसी की शरारत हो सकती है।”
(रॉबिन बोलते-बोलते चुप हो गया)

सन्नी ने कहा, “अरे यार रॉबिन, बिना फ़ोन से फ़ोटो खींचे कैसे कोई निकाल सकता है! खींचते वक्त तो इनकी बुद्धि होगी ही ना!”
एक लम्बा मौन पसर रहा था रॉबिन और सन्नी के बीच। रॉबिन रुआँसा हो गया।
सन्नी ने धीरे से कहा, “तू जानता है क्या इसे…? नहीं न ! फिर क्यों इतना टेंशन ले रहा है।”

रॉबिन चुपचाप वहाँ से चल दिया, जाते-जाते उसके दिमाग़ में एक ही चीज़ घूम रह थी, ‘सीकर वाली बुआ…. बहुत वायरल हो गई।’

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

शहर में फैल रहा ‘ई-रिक्शा’ से अव्यवस्थाओं का महाजाल

लापरवाह और बेपरवाह बनता जा रहा महानगर इन्दौर, इन दिनों ई-रिक्शा के कहर से भी अछूता नहीं है। जहाँ मर्ज़ी ई-रिक्शा रोकी और सवारी बैठाना-उतारना शुरू, जहाँ मर्ज़ी वहाँ पार्किंग। ऐसे में आलम यह है कि शहर की सुचारू बन रही यातायात व्यवस्थाओं में भी यह ई-रिक्शा मुसीबत बनती जा रही हैं।
बीते दिनों तो इन्दौर शहर में ई-रिक्शा की बैटरी फटने से दो लोगों की मौत हो गई। मामला विजय नगर क्षेत्र का है, जिसमें ई-रिक्शा की बैटरी फटने से झुलसी 60 वर्षीय रामकुंवर बाई पति नाथूसिंह के इलाज के दौरान बुधवार सुबह मौत हो गई। इसी हादसे में झुलसी उनकी बेटी पवित्रा की सोमवार को मौत हो गई थी। दोनों का एमवाय अस्पताल में इलाज चल रहा था। ई-रिक्शा चालक भी इस दुर्घटना में झुलसा है, जिसका इलाज चल रहा है। उसके ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला भी दर्ज कर लिया है।
ई-रिक्शा निश्चित रूप से सस्ते और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अच्छा माध्यम हो सकते हैं किन्तु अव्यवस्था और मनमानी के चलते हादसों के कारण भी बनते जा रहे हैं। ऐसे कई मामले हैं जिसमें ई-रिक्शा से यात्रियों की जान जोखिम में डालना, यातायात नियमों का उल्लंघन, और दुर्घटनाएँ शामिल हैं, जैसे कि एक ई-रिक्शा में बहुत ज़्यादा लोगों का बैठना, बैटरी फटने से आग लगना, और अन्य वाहनों से टक्कर। ये घटनाएँ लापरवाही, सुरक्षा नियमों की अनदेखी और कभी-कभी जानबूझकर ख़तरे पैदा करने का परिणाम हैं।
ये बेलगाम ई-रिक्शा संचालक यात्रियों की क्षमता से ज़्यादा लोगों को उसमें बैठा लेते हैं, और इससे यात्रियों की जान जोखिम में डाल देते हैं। ई-रिक्शा का अन्य वाहनों से टकराना और दुर्घटनाओं का कारण बनना भी शामिल है, जिसमें कई मौतें भी हुई हैं।
शहर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना है तो इन ई-रिक्शाओं को नियंत्रित और नियमानुसार संचालित करना होगा, भीड़ वाले क्षेत्र जैसे राजवाड़ा, रीगल, पलासिया चौराहा, मधुमिलन क्षेत्र, विजय नगर, रसोमा चौराहा सहित लालबाग चौराहा, महूनाका, अन्नपूर्णा क्षेत्र इत्यादि में इन ई-रिक्शाओं के कहर से यातायात व्यवस्था भी बिगड़ रही है और यात्रियों की जान का संकट भी खड़ा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा,
इन्दौर

पत्रकारों से क्यों छूट रहा पुस्तकालय या संदर्भ कक्ष?

चौथा खम्बा

लिखने से अधिक पढ़ना चाहिए, यह सनातन सत्य है, जो हर लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति से कहा जाता है, पर क्या आज भी लोग लिखने से अधिक पढ़ने में विश्वास करते हैं? इस प्रश्न के उत्तर को खोजने पर खाली हाथ ही लौटना होगा। कारण साफ़ है, आपाधापी के दौर में पत्रकारिता के लोग अब केवल लिखने पर विवश हैं, भाषाई समृद्धता की ओर न तो पत्रकारिता संस्थान ध्यान देते हैं और न ही पत्रकार।

यही सच है कि मीडिया संस्थानों से पुस्तकालयों ने विदाई लेना शुरू कर दी है, कुछेक इक्का-दुक्का संस्थान ही शेष बचे हैं जहाँ निजी पुस्तकालय जीवित हैं। कुछ मीडिया संस्थानों में पुस्तकालय तो जीवित हैं पर वहाँ पत्रकारों के पास फुरसत नहीं है कि उस पुस्तकालय का कभी उपयोग कर लिया जाए। इन्दौर प्रेस क्लब में पूर्व अध्यक्ष अरविंद तिवारी ने प्रीतमलाल दुआ स्मृति संदर्भ एवं अध्ययन कक्ष का निर्माण करवाया, सैंकड़ों किताबें रखवाईं, वरिष्ठ लाइब्रेरियन एवं पत्रकार कमलेश सेन के माध्यम से दुरुस्तीकरण और संयोजन भी करवाया पर भाग्य अनुसार उस पुस्तकालय में 6 महीने में कुछ पाठक भी ऐसे नहीं आए, जो किसी किताब को पढ़ना चाहते हों अथवा उन्हें पढ़ने के लिए ऐसी किसी पुस्तक की आवश्यकता हो जो पुस्तकालय में नहीं हो और क्लब उसे ख़रीदकर बुलवा सके।
ऐसे कठिन दौर में भी पत्रकारों को अपनी पढ़ने-लिखने की आदत को फिर से जीवित रखना होगा। पहले के समय में जैसे संदर्भों का उपयोग/प्रयोग ख़बरों में किया जाता था, अब वह भी डायनासोर की भांति विलुप्त होता जा रहा है। संदर्भों का अध्ययन करना होगा, तभी हमारी लिखने की शक्ति बढ़ेगी, भाषाई और शाब्दिक संपदा में बढ़ोत्तरी होगी वरना एक दिन यह अच्छी भाषा भी विलुप्त हो जाएगी। इस समय पत्रकारिता के सामने भाषाई सौन्दर्य और हिन्दीनिष्ठ भाषा दो महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं, जो भाषाई अस्तित्व को बचा सकती हैं। ऐसे में यदि हमने पुस्तकालय नहीं बचाए तो पुस्तक संस्कृति मर जाएगी, फिर रोबोट ही लिखेंगे एआई या गूगल के सहारे तथ्यात्मक ख़बरें।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं लेखक, इंदौर

पारंपरिक सराफ़ा बाज़ार बचाना शहर की ज़िम्मेदारी

वर्षों से शहर की पुरातन परम्पराएँ जीवित हैं, उसमें शहर की पहचान भी सम्मिलित है और शहर के खान-पान का ठियों का भी अपना महत्त्व है। उन्हीं पारंपरिक पहचान में शहर के सराफ़ा बाज़ार में रात में लगने वाला खाने-पीने का बाज़ार भी शामिल है। लगभग सौ वर्षों से अधिक समय से यह बाज़ार इस शहर में सजता है।
इंदौर के स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजन पूरे भारत में मशहूर हैं। यहाँ का सराफ़ा बाज़ार का स्‍ट्रीट फ़ूड मार्केट है। यहाँ घूमने आने वाले लोगों को हज़ारों तरह के अलग-अलग व्‍यंजनाें का स्‍वाद चखने का मौका मिलता है। अगर आप शाकाहारी हैं, तो आपके लिए तो यह मार्केट बहुत अच्‍छा है, क्‍योंकि यहाँ पर कुछ भी माँसाहारी नहीं मिलता। स्थानीय सराफ़ा व्यापारियों ने ही इस बाज़ार को प्रोत्साहित किया था, ताकि उनकी दुकानें अंधेरी रात में भी सुरक्षित रहें। किन्तु विगत कुछ सालों से इस बाज़ार में पारंपरिक स्वाद के अलावा विदेशी स्वाद चाइनीज़, इटालियन, मैक्सिकन खाद्य सामग्री की भरमार होने लग गई। साथ ही, कई विकृतियों ने घर करना शुरू कर दिया था। इसी को लेकर स्थानीय सराफ़ा व्यापारियों ने प्रशासन से शिकायतें कीं और परिणाम स्वरूप इस मार्केट से अब उन गैर पारंपरिक खाद्य पदार्थों का विक्रय प्रतिबंधित किया गया है।
बहरहाल, विषय यह भी है कि क्या इंदौर चाहता है कि हम ‘फ़ूड कैपिटल ऑफ़ मध्यप्रदेश’ का अपना तमगा खो दें या फिर अपने पुरातन स्वाद को समाप्त कर दें या फिर उन पारंपरिक व्यंजनों से आने वाली पीढ़ी को वंचित कर दें?
यदि इंदौर यह सब नहीं चाहता है तो फिर इंदौर को प्रशासन के इस निर्णय के साथ खड़ा होना होगा। हमें अपने पुरातन स्वाद को बचाना है तो तटस्थ होना ही होगा। हमें सराफ़ा में होने वाली उच्छंदताओं के विरुद्ध एकजुट होना पड़ेगा, खाद्य सामग्रियों के नाम पर परोसे जाने वाले कचरे का विरोध करके अपने इंदौर के पारंपरिक स्वाद को जीवित रखना होगा, तभी हम देशभर में व्याप्त हमारी पहचान बचा पाएँगे वरना एक दिन यह सब चाइनीज़, इटेलियन, मैक्सिकन और न जाने क्या उटपटांग की भेंट चढ़ जाएगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर

ट्रैफिक प्रहरी अभियान में शामिल होकर डॉ. अर्पण जैन ने जागरूकता में दिया योगदान

सड़क सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी, आदतें बदलने से होगा सुधार

इंदौर। ट्रैफिक पुलिस द्वारा संचालित “ट्रैफिक प्रहरी अभियान” लगातार शहर में सड़क सुरक्षा और यातायात में जनसहभागिता बढ़ाने का कार्य कर रहा है।
इसी कड़ी में डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’, अध्यक्ष-मातृभाषा उन्नयन संस्थान और सामाजिक कार्यकर्ता सौरव गौसर ने अभियान से जुड़कर अपनी सक्रिय सहभागिता दी। डॉ.जैन द्वारा यातायात पुलिस के साथ खड़े होकर वाहन चालकों को सड़क सुरक्षा, नियमों के पालन और जिम्मेदार ड्राइविंग के प्रति जागरूक किया गया। उन्होंने कहा कि “जिस तरह इंदौर ने स्वच्छता में देशभर में सिरमौर बनकर मिसाल कायम की है, उसी तरह यदि नागरिक ट्रैफिक नियमों का जिम्मेदारी से पालन करें, तो हम सभी की सहभागिता से इंदौर यातायात व्यवस्था में भी बेहतर बना सकते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि “अभियान में शामिल होकर मैं स्वयं अनुभव कर रहा हूँ कि यातायात संचालन कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन यदि इंदौरवासियों का सहयोग मिलेगा, तो सड़क हादसों में निश्चित रूप से कमी आएगी और शहर की यातायात व्यवस्था और भी सुगम व सुरक्षित बनेगी।”

विकास के नाम पर ‘इंदौर की मौत’

तरक़्क़ी की गगनचुम्भी इमारत खड़ी करने की कवायद है, शहर को मेट्रो पर दौड़ाने की तैयारी जारी है, मास्टर प्लान लागू करने की बेहद जल्दी है, पर इन सबके बीच शहर के बीचोबीच बना जंगल उजाड़ा जा रहा है, पुरानी और ऐतिहासिक इमारतों को तोड़ने की चर्चा आम है। शहर की पुरानी सड़कों को दुरुस्त करने की बात तो होती है, पर बैठकों में सीधे फ़रमान जारी होता है, अतिक्रमण के नाम पर धरोहरों को तोड़ दो।
साहब! इंदौर अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक वैभव के कारण जाना जाता है, विश्व की धरोहरों में शामिल राजवाड़ा जैसी इमारतों के साथ-साथ यहाँ की परम्पराएँ जैसे रंगपंचमी की गैर, अनंत चतुर्दशी की झाँकियाँ और अन्य कई उत्सव और इमारतें इस शहर की पहचान हैं।
एक तरफ़ अफ़सर यह कहते हैं कि 100 फ़ीट की सड़कें तैयार करनी हैं, तो बीच में आने वाले मकान तोड़ दो। पर वही अफ़सर इस बात पर मौन है कि मुआवज़ा कितना देना चाहिए, जिनके पास सालों से पट्टे या रजिस्ट्री हैं।
आपने आज चुना मास्टर प्लान पर 100 साल पहले या 200 साल पहले कोई मास्टर प्लान नहीं था, तात्कालिक लोगों ने अपनी ज़मीन ख़रीदी और मकान बनाए, पर आज के काग़ज़ अब उन्हें अपनी धरोहरों को अतिक्रमण साबित करने से बचाने में लगे हैं। आख़िरकार इस तरह के विकास की अंधाधुंध दौड़ से इंदौर की मौत होगी।
मर जाएगा यह उत्सवधर्मी शहर, क्योंकि इस शहर की साँस इसकी ऐतिहासिकता के कारण चल रही है। एमजी रोड, भमोरी चौराहे से एमआर 10 वाली सड़क सब तरफ़ अफ़सरों ने अतिक्रमण दिखा दिया जबकि शहर विकास के नाम पर छला जा रहा है।
शहर की मौत के ज़िम्मेदार वे जनप्रतिनिधि भी होंगे, जो इस कृत्य पर मौन हैं। जब विकास का दुःशासन शहर की पांचाली का चीर हरण कर रहा है और जितने धृतराष्ट्र, पितामह भीष्म अपना मौन धारण कर रहे हैं, वे सबके सब अपराधी ही माने जाएँगे। इतिहास इन जनप्रतिनिधियों को भी माफ़ नहीं करेगा।
एक तरफ़ मेट्रो को दौड़ाने की जल्दबाज़ी है तो दूसरी तरफ़ पार्किंग न होना शहर पर बोझ है। ऐसे में शहर इंदौर मर रहा है, अब इसे बचाने के लिए क्या फिर किसी कृष्ण के जन्म की सद्इच्छा रखनी होगी या फिर शहर यूँ ही मर जाएगा!

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा, इंदौर

मीडिया का उतावलापन है बेहद घातक

चौथा खम्बा

समाचारों को भेजने और ख़बर को ब्रेक करने की रणनीति, ‘पहले हम-पहले हम’ की अनावश्यक भागमभाग, फ़्लैश करने की हड़बड़ी और इन सबके बीच विश्वसनीयता का गहरा संकट आज की मीडिया के सामने मुँहबाहें खड़ा हुआ है।
बीते दिनों फ़िल्म अभिनेता धर्मेन्द्र के मामले में भी यही नज़र आया। देश के सबसे बड़े चैनल होने का दावा देने वाले न्यूज़ चैनल और उससे जुड़े पत्रकारों ने धर्मेन्द्र के निधन के समाचार अपने चैनल और सोशल मीडिया हैंडल पर चला दिए। इस समाचार को देख लाखों प्रशंसकों ने अपने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि तक दे दी, यहाँ तक कि कई बड़े राजनेताओं ने भी शोक संदेश तक जारी कर दिए। इसी बीच धर्मेन्द्र की पत्नी हेमा मालिनी एवं बेटी ईशा देओल ने पिता के जीवित होने का ट्वीट कर मीडिया को कोसा भी।
सच भी यही है कि, किसी व्यक्ति के अत्यधिक अस्वस्थता होने पर भी परिवार जीवित होने की प्रार्थनाएँ करता है और ऐसे मुश्किल समय मीडिया का इस तरह का गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार परिवार को भी आहत करता है।
ऐसा पहली बार भी नहीं हो रहा है, बीते 5 वर्षों में कम से कम दसियों विशिष्ट व्यक्तित्व के मामलों में मीडिया के लोगों का इस तरह अपुष्ट समाचार प्रसारित करना मीडिया की गंभीरता पर प्रश्न चिह्न लगाता है और विश्वसनीयता पर भी संकट खड़ा होता है।
पुलवामा हमले के बाद कश्मीर एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में दुश्मन देश पाकिस्तान द्वारा ड्रोन हमले किए जा रहे हैं, उसी समय एक बड़े चैनल ने वीडियो गेम वाले ड्रोन वीडियो लाइव चैनल पर चला कर भी आमजन के बीच किरकिरी करवाई थी।
आख़िर अमानुषता मीडिया के क्षेत्र में क्यों हावी होती जा रही है? यह भी विषय खोजने का है। आख़िर किस बात की इतनी जल्दबाज़ी है कि मीडिया के साथी बिना पुष्टि और ठोस आधार के गंभीर मुद्दों पर भी जनभावना से खिलवाड़ करने वाली ख़बरें प्रसारित कर देते हैं? जब हाल बड़े चैनलों का इस तरह का है तो छोटे समाचार संस्थाओं की तो हालत और भी खस्ता है। आधे से ज़्यादा न्यूज़ पोर्टल और रीजनल चैनल अपने सोशल मीडिया पर नाम के बड़े चैनलों को ही ख़बर की पुष्टि मानकर कॉपी-पेस्ट की रणनीति के तहत ख़बरें प्रसारित कर देते हैं। उन्हें अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, अन्यथा वैसे भी कई मामलों में भारतीय मीडिया अब जनता के बीच कम विश्वसनीय बचा है, रही सही कसर इस तरह के घटनाक्रम पूरी कर देते हैं। अब भी समय विश्वसनीयता पुनः स्थापित करने में गंभीरता दर्शाने का है, अन्यथा एक दिन मीडिया देश में अप्रासंगिक हो जाएगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा, इंदौर