पब्लिक ट्रांसपोर्ट बन सकता है एक बेहतर विकल्प

शहर अपने अल्हड़ और ज़िंदादिल मिज़ाज के लिए पूरे देशभर में पहचाना जाता है। देवी अहिल्या बाई ने जिस शहर इंदौर पर आधिपत्य किया, आज वही शहर अपनी आदतों से कमज़ोर भी होता नज़र आ रहा है। शहर के बाशिन्दों में अनुशासन के प्रति अपना रुझान नहीं दर्शाया, न केवल नागरिक अनुशासन बल्कि नागरिक कर्त्तव्यों में भी शहर पिछड़ रहा है। रोज़-रोज़ लगता सड़कों पर जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और सड़क सुरक्षा नियमों की रोज़ अनदेखी सैंकड़ों मौत को दावत देती है। ऐसे में पब्लिक ट्रांसपोर्ट एक बेहतर विकल्प के रूप में शहर को गति दे सकता है।
यही नहीं, शहर के लोग भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट के उपभोग के मामले में फिसड्डी ही हैं। यहाँ जितनी जनसंख्या है, उससे अधिक वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन वाहनों को रखने से स्टेटस सिम्बल खड़ा होता है, बल्कि शहरीकरण की सबसे बड़ी समस्या भी इन्हीं वाहनों से उत्पन्न हो रही है।
मेट्रों की धीमी गति के पहले बीआरटीएस और सिटी बस सेवाओं के उपयोग में इन्दौरी अव्वल नहीं रहे। व्यक्तिगत गाड़ी का उपयोग करने से समय और सुरक्षा के साथ-साथ शहर में पार्किंग की भी समस्या खड़ी होती है। ऐसे में सरकारों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए, छोटे-छोटे क्षेत्र तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा पहुँचे, यह जवाबदारी सरकारों की भी है। नागरिकों को इस बात की चिंता होनी चाहिए कि शहर में ज़्यादातर सड़क दुर्घनाओं के चलते पब्लिक ट्रांसपोर्ट, सिटी बस, नगर सेवा जैसे विकल्पों के प्रयोग किए जाएँ।
थोड़ी दूरी पर जाने के लिए वाहन की बजाए पैदल गमन करना चाहिए। इस हेतु शहर की सामाजिक संस्थाओं को भी जागरुकता अभियान चलाकर नागरिकों को जागरुक करना होगा। क्योंकि आज शहर की हालत यातायात के मामले में बेहद खस्ता हो रही है, आम ज़िन्दगी सड़कों पर सुरक्षित नहीं है। यह इन्दौर के नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है कि अपने शहर को सुरक्षित बनाने में सहभागी बनें।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

डर्टी पॉलिटिक्स का शिकार हो रहा ‘इन्दौर’

स्वच्छता की पहचान बना इन्दौर अब डर्टी पॉलिटिक्स की चपेट में है। राजनीतिक खेल, आरोप और साज़िशें कैसे शहर को नुकसान पहुँचा रही हैं-जानिए पूरा सच।

राज की नीति और नीति का राज दोनों के बीच होती अहम की टक्कर कभी लोकतंत्र के लिए लाभदायक नहीं होती। यही मलाल अब प्रदेश की आर्थिक राजधानी और कई मुख्यमंत्रियों के सपनों के शहर इन्दौर को भी हो रहा है। यहाँ राजनीति की टकसाल से अब व्यक्तिगत अहम को बल देते नेताओं ने शहर को अफ़सरशाही की प्रयोगशाला में बदल दिया। और अफ़सर अब मनमर्ज़ी से इस शहर की तासीर को समझे बगैर बग़ैर अपने प्रयोगों से रोज़ सूली पर चढ़ाने में लगे हैं।
अंदरखाने की ख़बर तो यह है कि सत्ताधारी दल के नेताओं और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच की अनबन भी अब खुल कर सामने आ रही है। और इस मनभेद का फ़ायदा वो उठा रहे हैं, जो इन्दौर के कभी अपने नहीं रहे।
बीते दिनों शहर में दूषित और ज़हरीले पानी की सप्लाई से भागीरथपुरा क्षेत्र में पीने का पानी भी दूषित हो गया और 20 से अधिक लोगों की जान चली गईं। मामला राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया, और देशभर में सबसे स्वच्छ शहर की साख पर पलीता लगना शुरू हो गया। काबीना मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की भद्द पिटना शुरू हो गई। मौके की नज़ाकत को समझकर मुख्यमंत्री ने इन्दौर से नियत दूरी रखना शुरू कर दिया। यह दूरी राजनीति प्रेरित और घटना के बाद अपने व्यक्तिगत अहम की तुष्टि को बल देने वाली साबित होने लगी। इसी बीच गणतंत्र दिवस पर झंडावन्दन के लिए मंत्रियों को जिलों के प्रभार दिए, उसमें भी कैलाश विजयवर्गीय को कहीं का प्रभार न देकर यह दिखाया गया कि कहीं कुछ ठीक तो नहीं हैं। इसी के तुरन्त बाद मंत्री विजयवर्गीय ने एक पत्र जारी कर निकटतम मित्र के परिवार में गमी का बहाना बनाकर 8 दिन का अवकाश, सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना दी।
आख़िरकार मंत्री और मुख्यमंत्री के बीच की अनबन अब सार्वजनिक होने लगी है। और इस डर्टी पॉलिटिक्स का खामियाज़ा शहर इन्दौर भुगत रहा है। शहर के फ़ैसलों में मुख्यमंत्री कार्यालय के रोकटोक अब जनता को दिखाई देने लग गई। पार्टी के भीतर की यह अनबन अब शहर की अव्यवस्था में बदल रही है, जो किसी भी तरह इन्दौर हित में नहीं है। इसका खामियाज़ा शायद जनता अपने वोट से भाजपा को भरने पर विवश कर दे।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

हाय पानी! बिगाड़ दी तुमने शहर की फ़िज़ा

एक फ़िल्म के गीत की पंक्तियाँ ‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा’ आज शहर के भगीरथपुरा काण्ड पर सटीक बैठ रहा है। इस पानी ने, जिसका रंग भी दूषित नहीं पर, इस शहर की फ़िज़ा बिगाड़ दी। कई अफ़सरों की सीआर बिगाड़ दी, यही नहीं कई नेताओं का पानी भी उतार दिया। बीते 8 दिनों से अपने सोशल मीडिया को भी अपडेट नहीं कर पा रहे, ऐसे नेताओं का रंग भी उतार दिया। और फिर भी अब तक नगर निगम का अमला इस बात की खोज ही कर रहा है कि आख़िर पाइपलाइन का लीकेज कहाँ से हुआ!

शहर इन्दौर की कुण्डली में न जाने कौन से राहु-केतु बैठ गए, जिनके कारण शहर बीते एक वर्ष से तो चैन की साँस तक नहीं ले पा रहा है। कभी एमवाय में चूहे नवजात बच्चों को कुतर देते हैं तो कभी कोई ट्रक आम जनता पर चढ़ जाता है। कहीं एक्सपायरी दवाएँ मरीज़ों की जान ले लेती हैं। कहीं बसों का अंधाधुंध चलना, कहीं सड़क दुर्घटनाओं में जाती जाने, कहीं मंत्री का मौन तो कहीं जनप्रतिनिधियों की चुप्पी। शहर सच में भगवान भरोसे ही हो गया। फिर अंततः इस ज़हरीले पानी पर शहर का गुस्सा अब तक फूट ही रहा है।
इस ज़हरीले पानी ने 20 से अधिक लोगों की जान ले ली और बेशर्म प्रशासन अब भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि आख़िर कितने लोग अपनी जान दे चुके। माननीय न्यायालय यदि फटकार नहीं लगाता तो शायद 18 लोग भी घोषित नहीं हो पाते, प्रशासन तो 4 पर ही अटका हुआ था।
शहर के कुछ क्षेत्रों का पानी ही दूषित नहीं हुआ, बल्कि शहर की राजनीति ही दूषित होकर अफ़सरशाही के भरोसे चल रही थी। ईश्वर यदि सद्बुद्धि नहीं देगा तो यकीनन यह पानी आगामी चुनाव में सत्तासीन दल के मंसूबे पर पानी फेर देगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

चीख़ती जनता, तड़पती ज़िन्दगी और शहर में मौत का ताण्डव

हिंदी फ़िल्म के गीत की यह पंक्तियाँ ‘तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही, मुझको सज़ा दी प्यार की’, आज इन्दौर के भागीरथपुरा पर हूबहू ठीक बैठ रही है। पार्षद, महापौर, विधायक और सांसद तक को अपने मत का तोहफ़ा देकर जीत दिलवाने वाला क्षेत्र आज बिना किसी ग़लती के मौत की सज़ा पा रहा है तो निकलने वाली आह निश्चित रूप से पीड़ा का स्वर ही होगी।
बीता हुआ साल का आख़िरी सप्ताह शहर के दुर्भाग्य में शामिल हो गया, एक ऐसे अनजाने गुनाह की सज़ा के रूप में भागीरथपुरा के 200 से अधिक लोग अस्पताल में अपनी ज़िंदगी की भीख माँग रहे हैं और 10 से अधिक ज़िन्दगी तो मौत से इश्क़ कर बैठी और उसमें शामिल एक दुधमुंहा 5 महीने का बच्चा भी है, जिसकी माँ ने दूध में पानी इसलिए मिलाया था ताकि बच्चा दूध पचा सके। उस माँ को क्या पता था कि यह पानी ही ज़हर है। अनजाना गुनाह यह कि उन्होंने आँख बंद करके उस राजनैतिक दल को चुना, जिसके रहम ओ करम पर एक अधिकारी 20 साल से इसी शहर की पानी की व्यवस्था में संजीव रूप से तैनात है, एक अधिकारी शिकायतों की फ़ाइलें अपने पास महीनों से दबा कर बैठा, उस क्षेत्र का पार्षद भयावहता के बाद भी झूला झूलने कर फुरसत का समय काट रहा।
इस गंदे पानी ने शहर का पानी ही उतार दिया, प्रदेश सरकार नगर में आती है, मृतकों की जान की क़ीमत 2 लाख रुपए लगा कर निकल जाती है, पर कमाऊ अफ़सरों पर मुँह में दही जमा लेती है। नगर सरकार ‘घण्टा’ बजा रही है।
कभी चुल्लू भर पानी में डूब कर मरने का मुहावरा था, अब इन्दौर के लिए ‘चुल्लू भर भागीरथपुरा का पानी पिला दो’ यह मुहावरा गढ़ दिया। हुक्मरानों से क्या उम्मीद करेगी जनता, जो जनता को साफ़ पानी तक पीने के लिए नहीं दे सके।
किसी फ़िल्म का संवाद था कि ‘जनता तो मरने के लिए ही बनी है’ उसी संवाद को इन्दौर में सही साबित होता देख रहे हैं।
माफ़ी तो जनता को माँगनी चाहिए, जो अपने वोट से तोल दिया ऐसे लोगों को, जिनका पानी ही उतर गया।
शहर में 59 ऐसे अन्य स्थान भी हैं जो भागीरथपुरा बनने की कगार पर हैं, जहाँ के पानी के सेम्पल फैल हो चुके हैं। पर नगर सरकार जागे तब तो, अन्यथा वहाँ भी लोग मरेंगे, तब 2 लाख रुपए का नमक लगा कर इति श्री कर लेंगे।
ऐसे में कैलेंडर नव वर्ष की सूचना इन्दौर की चरमराती और दूषित होती व्यवस्थाओं ने दे दी। जनप्रतिनिधियों की थकी हुई जमात तो बारूद के ढेर पर बैठकर शहर को मौत का मंज़र परोस कर अपनी नींद सो रहे हैं। अब तो शहर के प्रभारी मंत्री को भी सुध लेने का भी नहीं कह सकते, पता नहीं किस तरह फिर शहर के अहित को बलवान कर दे। अब तो ईश्वर ही शेष है, जिनसे न्याय की उम्मीद है और वही एकमात्र सहारा भी है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

अटल जी की स्मृति को नगर निगम ने दिया स्थायी पता : अटल बिहारी मार्ग

देशभर में नाम परिवर्तन की बयार छाई हुई है, कहीं शहरों के नए नामकरण हो रहे हैं तो कहीं-कहीं गाँव, गली और मोहल्लों के नाम बदले जा रहे हैं। कहीं इमारतों के नाम तक बदल दिए, ऐसे में नगर निगम इंदौर ने पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को इंदौर में जीवटता से प्रस्तुत करते हुए महत्त्वपूर्ण आगरा-बॉम्बे मार्ग का नाम बदल कर अटल बिहारी मार्ग कर दिया है।
अटल जी की जन्मशताब्दी के सुअवसर पर इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपनी निष्ठा वाले राजनैतिक दल के पितृपुरुष व भारत के गौरवशाली प्रधानमंत्री के नाम पर एबी रोड़ का नाम परिवर्तन कर शहर को गौरव तो दिया ही, साथ में अपनी पार्टी के आकाओं की नज़र में भी एक बड़ा काम कर दिया है।
अब शहर के जिस मार्ग को अटल जी के नाम पर किया है, उसे शराबखोरी, पब और अन्य अवैधानिक गतिविधियों से भी मुक्त कर अटल जी को श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
श्रद्धेय अटल जी ने जिस सांस्कृतिक निष्ठा का जीवन पर्यन्त अनुपालन किया, उसे ध्यान में रखकर उस मार्ग की सद्गति भी निर्धारित की जाए। यदि उसी मार्ग पर कोई शराबी, चरसी, नशेड़ी पब से निकले और पुलिस की धरपकड़ में आया तो यही लिखा जाएगा कि अटल बिहारी मार्ग पर पकड़ाए नशेड़ी, यह भी नाम के साथ विरोधाभास और कलंकित कृत्य होगा। ऐसे में जनता तो चाहती है कि एबी रोड को पब कल्चर से मुक्ति दिलाई जाए, आपराधिक तत्त्वों की धरपकड़ कर कम से कम उस मार्ग की तमाम शराब दुकानों को हटवाया जाए, ताकि पूर्व प्रधानमंत्री के नाम की गरिमा अनुरूप कार्य हो। संस्कृति और साहित्य का केन्द्र भी उस मार्ग पर बन सकता है। महापौर भार्गव से इस दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर, मध्यप्रदेश