सावधान! अपने बच्चों को संभाले इन्दौर

ख़बर सुनना, पढ़ना और सोशल मीडिया पर वीडियो देखना पर इस बात को भूल न जाना कि इस समय शहर में दशहत का माहौल है और इस बीच अपने बच्चों की सुरक्षा बेहद आवश्यक है। शहर में दिन-प्रतिदिन बच्चों की चोरी की घटनाएँ बढ़ रही हैं, ऐसे में पुलिस अपना काम तो मुश्तैदी से कर ही रही है पर माता-पिता की एक ग़लती या लापरवाही भी घर के बच्चों के लिए भारी पढ़ सकती है।
निःसंदेह पिछले दो सप्ताह में कई ऐसी वारदातें हुई हैं, पुलिस का कहना तो साफ़ है कि ऐसी कोई गैंग के बारे में कोई सूचना नहीं मिली पर टुकड़े-टुकड़े में हुई कई घटनाओं में आसपास के कैमरे इस बात को क़ैद करने में सफल रहे कि कोई व्यक्ति, महिला या बुज़ुर्ग बच्चों को बहला-फुसला कर अपने साथ ले जा रहा है। कुछ जगह पर बच्चों के साथ कुछ महिलाओं को जनता ने पकड़ा है।
बीते दिनों राउ क्षेत्र में एक महिला को जनता ने बच्चा चोरी करके ले जाते हुए पकड़ा, जीत नगर, बिलावली का मामला भी सामने आया ही है, जिसमें महिला को रंगेहाथों बच्चा चोरी करके ले जाते हुए जनता ने पकड़ा। इसी तरह द्वारका पुरी क्षेत्र में भी बच्चे का अपहरण का मामला हुआ। ऐसा ही खजराना थाना क्षेत्र में भी एक वारदात हुई, बच्चा इन्दौर के पास के एक गाँव में प्राप्त हुआ। ऐसे कई प्रकरण लगातार सामने आ रहे हैं।
ऐसे में माँ-पिता के साथ-साथ मोहल्लेवासियों को भी सचेत रहना होगा, यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति मोहल्ले में, गली में नज़र आए तो तुरंत पूछताछ करें, संदेह करना ग़लत नहीं है। बच्चों को विद्यालय की गाड़ी तक ख़ुद छोड़ने-लेने जाएँ क्योंकि आपकी असावधानी और लापरवाही भी बच्चे के लिए घातक हो सकती है। ये बच्चा चोर गैंग लगातार कई शहरों में वारदातों को अंजाम दे रही है, न केवल इन्दौर बल्कि आसपास के गाँव दराज भी इससे अछूते नहीं हैं। बच्चियों को बेच देना और लड़कों से भीख मंगवाना, अपराध कराना यह सब काम करने में ये बच्चा चोर गैंग अव्वल है। इसलिए सावधानी और सतर्कता ही एकमात्र बचाव है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

कमज़ोर विपक्ष का शिकार इन्दौर की राजनीति

राजनीति में जितना महत्त्व सत्ता का होता है, उतना ही महत्त्व विपक्ष का भी माना जाता है। बल्कि विपक्ष का दायित्व अत्यधिक ही माना जाता है क्योंकि विपक्ष जनता का पक्षधर रहता है। विपक्ष जितना मज़बूत होगा, सत्ता पर उतना अंकुश भी बना रहेगा और जनहित के कार्यों को गति मिलेगी। किन्तु हालात ए इंदौर में विपक्ष की भूमिका बहुत कमज़ोर होती जा रही है। सत्तासीन राजनैतिक दल के 9 विधायक हैं, राज्यसभा और लोकसभा दोनों में इंदौर से सांसद हैं, महापौर भी सत्तासीन दल का है, राज्य सरकार में दो-दो मंत्री हैं और तो और अधिकतम पार्षद भी सत्तादल के हैं। बावजूद इसके शहर बदहाली के बुरे दौर से गुज़र रहा है।

वैसे तो विपक्षी दल के प्रदेश के मुखिया जीतू पटवारी भी इन्दौर से ही हैं परन्तु फिर भी शहर की चिंता न उन्हें कभी सताती है न उनके सिपहसलाहार शहर को याद रखते हैं। भागीरथपुरा दूषित जल काण्ड के दौरान भी पटवारी की चुप्पी और शहर अध्यक्ष चिन्टू चौकसे का कमज़ोर प्रहार भी शहर से विपक्ष की कमज़ोरी को बयाँ कर रहा था।
इस समय राजनीति का गिरता नैतिक स्तर भी जनता को भयाक्रांत कर रहा है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि ‘नेताओं और मंत्रियों को नैतिक स्तर की बड़ी चिंता है। यानी जीवन-स्तर चाहे रसलात को चला जाए, नैतिक स्तर हिमालय के शिखर पर चढ़ा रहना चाहिए।’
शिखर पर दिखना तो सब चाहते हैं पर शिखर के लायक कार्य करने में शहर के विपक्षी नेता फिसड्डी ही साबित हो रहे हैं। न शहर अध्यक्ष और न ही कांग्रेसी टीम कहीं मैदान पर जनता की बात करती नज़र आ रही है। कांग्रेसी प्रवक्ता टीवी और समाचारों में तो दिखना चाहते हैं पर वहीं जनता के साथ खड़े रहने में उनकी कोई रुचि नहीं दिखती। शहर के परिंदों की चिंता हो चाहे ग्रीन लंग्स के प्रति विपक्ष की चिंता इनके अतिरिक्त जनता के मुद्दों पर कहीं भी विपक्ष कोई मज़बूत भूमिका अदा नहीं कर पा रहा है। ऐसे में विपक्ष विहीन शहर सत्ता की मदमस्त गति के आगे पस्त और बेबस नज़र आ रहा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

पब्लिक ट्रांसपोर्ट बन सकता है एक बेहतर विकल्प

शहर अपने अल्हड़ और ज़िंदादिल मिज़ाज के लिए पूरे देशभर में पहचाना जाता है। देवी अहिल्या बाई ने जिस शहर इंदौर पर आधिपत्य किया, आज वही शहर अपनी आदतों से कमज़ोर भी होता नज़र आ रहा है। शहर के बाशिन्दों में अनुशासन के प्रति अपना रुझान नहीं दर्शाया, न केवल नागरिक अनुशासन बल्कि नागरिक कर्त्तव्यों में भी शहर पिछड़ रहा है। रोज़-रोज़ लगता सड़कों पर जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और सड़क सुरक्षा नियमों की रोज़ अनदेखी सैंकड़ों मौत को दावत देती है। ऐसे में पब्लिक ट्रांसपोर्ट एक बेहतर विकल्प के रूप में शहर को गति दे सकता है।
यही नहीं, शहर के लोग भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट के उपभोग के मामले में फिसड्डी ही हैं। यहाँ जितनी जनसंख्या है, उससे अधिक वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन वाहनों को रखने से स्टेटस सिम्बल खड़ा होता है, बल्कि शहरीकरण की सबसे बड़ी समस्या भी इन्हीं वाहनों से उत्पन्न हो रही है।
मेट्रों की धीमी गति के पहले बीआरटीएस और सिटी बस सेवाओं के उपयोग में इन्दौरी अव्वल नहीं रहे। व्यक्तिगत गाड़ी का उपयोग करने से समय और सुरक्षा के साथ-साथ शहर में पार्किंग की भी समस्या खड़ी होती है। ऐसे में सरकारों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए, छोटे-छोटे क्षेत्र तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा पहुँचे, यह जवाबदारी सरकारों की भी है। नागरिकों को इस बात की चिंता होनी चाहिए कि शहर में ज़्यादातर सड़क दुर्घनाओं के चलते पब्लिक ट्रांसपोर्ट, सिटी बस, नगर सेवा जैसे विकल्पों के प्रयोग किए जाएँ।
थोड़ी दूरी पर जाने के लिए वाहन की बजाए पैदल गमन करना चाहिए। इस हेतु शहर की सामाजिक संस्थाओं को भी जागरुकता अभियान चलाकर नागरिकों को जागरुक करना होगा। क्योंकि आज शहर की हालत यातायात के मामले में बेहद खस्ता हो रही है, आम ज़िन्दगी सड़कों पर सुरक्षित नहीं है। यह इन्दौर के नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है कि अपने शहर को सुरक्षित बनाने में सहभागी बनें।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

डर्टी पॉलिटिक्स का शिकार हो रहा ‘इन्दौर’

स्वच्छता की पहचान बना इन्दौर अब डर्टी पॉलिटिक्स की चपेट में है। राजनीतिक खेल, आरोप और साज़िशें कैसे शहर को नुकसान पहुँचा रही हैं-जानिए पूरा सच।

राज की नीति और नीति का राज दोनों के बीच होती अहम की टक्कर कभी लोकतंत्र के लिए लाभदायक नहीं होती। यही मलाल अब प्रदेश की आर्थिक राजधानी और कई मुख्यमंत्रियों के सपनों के शहर इन्दौर को भी हो रहा है। यहाँ राजनीति की टकसाल से अब व्यक्तिगत अहम को बल देते नेताओं ने शहर को अफ़सरशाही की प्रयोगशाला में बदल दिया। और अफ़सर अब मनमर्ज़ी से इस शहर की तासीर को समझे बगैर बग़ैर अपने प्रयोगों से रोज़ सूली पर चढ़ाने में लगे हैं।
अंदरखाने की ख़बर तो यह है कि सत्ताधारी दल के नेताओं और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच की अनबन भी अब खुल कर सामने आ रही है। और इस मनभेद का फ़ायदा वो उठा रहे हैं, जो इन्दौर के कभी अपने नहीं रहे।
बीते दिनों शहर में दूषित और ज़हरीले पानी की सप्लाई से भागीरथपुरा क्षेत्र में पीने का पानी भी दूषित हो गया और 20 से अधिक लोगों की जान चली गईं। मामला राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया, और देशभर में सबसे स्वच्छ शहर की साख पर पलीता लगना शुरू हो गया। काबीना मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की भद्द पिटना शुरू हो गई। मौके की नज़ाकत को समझकर मुख्यमंत्री ने इन्दौर से नियत दूरी रखना शुरू कर दिया। यह दूरी राजनीति प्रेरित और घटना के बाद अपने व्यक्तिगत अहम की तुष्टि को बल देने वाली साबित होने लगी। इसी बीच गणतंत्र दिवस पर झंडावन्दन के लिए मंत्रियों को जिलों के प्रभार दिए, उसमें भी कैलाश विजयवर्गीय को कहीं का प्रभार न देकर यह दिखाया गया कि कहीं कुछ ठीक तो नहीं हैं। इसी के तुरन्त बाद मंत्री विजयवर्गीय ने एक पत्र जारी कर निकटतम मित्र के परिवार में गमी का बहाना बनाकर 8 दिन का अवकाश, सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना दी।
आख़िरकार मंत्री और मुख्यमंत्री के बीच की अनबन अब सार्वजनिक होने लगी है। और इस डर्टी पॉलिटिक्स का खामियाज़ा शहर इन्दौर भुगत रहा है। शहर के फ़ैसलों में मुख्यमंत्री कार्यालय के रोकटोक अब जनता को दिखाई देने लग गई। पार्टी के भीतर की यह अनबन अब शहर की अव्यवस्था में बदल रही है, जो किसी भी तरह इन्दौर हित में नहीं है। इसका खामियाज़ा शायद जनता अपने वोट से भाजपा को भरने पर विवश कर दे।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

हाय पानी! बिगाड़ दी तुमने शहर की फ़िज़ा

एक फ़िल्म के गीत की पंक्तियाँ ‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा’ आज शहर के भगीरथपुरा काण्ड पर सटीक बैठ रहा है। इस पानी ने, जिसका रंग भी दूषित नहीं पर, इस शहर की फ़िज़ा बिगाड़ दी। कई अफ़सरों की सीआर बिगाड़ दी, यही नहीं कई नेताओं का पानी भी उतार दिया। बीते 8 दिनों से अपने सोशल मीडिया को भी अपडेट नहीं कर पा रहे, ऐसे नेताओं का रंग भी उतार दिया। और फिर भी अब तक नगर निगम का अमला इस बात की खोज ही कर रहा है कि आख़िर पाइपलाइन का लीकेज कहाँ से हुआ!

शहर इन्दौर की कुण्डली में न जाने कौन से राहु-केतु बैठ गए, जिनके कारण शहर बीते एक वर्ष से तो चैन की साँस तक नहीं ले पा रहा है। कभी एमवाय में चूहे नवजात बच्चों को कुतर देते हैं तो कभी कोई ट्रक आम जनता पर चढ़ जाता है। कहीं एक्सपायरी दवाएँ मरीज़ों की जान ले लेती हैं। कहीं बसों का अंधाधुंध चलना, कहीं सड़क दुर्घटनाओं में जाती जाने, कहीं मंत्री का मौन तो कहीं जनप्रतिनिधियों की चुप्पी। शहर सच में भगवान भरोसे ही हो गया। फिर अंततः इस ज़हरीले पानी पर शहर का गुस्सा अब तक फूट ही रहा है।
इस ज़हरीले पानी ने 20 से अधिक लोगों की जान ले ली और बेशर्म प्रशासन अब भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि आख़िर कितने लोग अपनी जान दे चुके। माननीय न्यायालय यदि फटकार नहीं लगाता तो शायद 18 लोग भी घोषित नहीं हो पाते, प्रशासन तो 4 पर ही अटका हुआ था।
शहर के कुछ क्षेत्रों का पानी ही दूषित नहीं हुआ, बल्कि शहर की राजनीति ही दूषित होकर अफ़सरशाही के भरोसे चल रही थी। ईश्वर यदि सद्बुद्धि नहीं देगा तो यकीनन यह पानी आगामी चुनाव में सत्तासीन दल के मंसूबे पर पानी फेर देगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

चीख़ती जनता, तड़पती ज़िन्दगी और शहर में मौत का ताण्डव

हिंदी फ़िल्म के गीत की यह पंक्तियाँ ‘तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही, मुझको सज़ा दी प्यार की’, आज इन्दौर के भागीरथपुरा पर हूबहू ठीक बैठ रही है। पार्षद, महापौर, विधायक और सांसद तक को अपने मत का तोहफ़ा देकर जीत दिलवाने वाला क्षेत्र आज बिना किसी ग़लती के मौत की सज़ा पा रहा है तो निकलने वाली आह निश्चित रूप से पीड़ा का स्वर ही होगी।
बीता हुआ साल का आख़िरी सप्ताह शहर के दुर्भाग्य में शामिल हो गया, एक ऐसे अनजाने गुनाह की सज़ा के रूप में भागीरथपुरा के 200 से अधिक लोग अस्पताल में अपनी ज़िंदगी की भीख माँग रहे हैं और 10 से अधिक ज़िन्दगी तो मौत से इश्क़ कर बैठी और उसमें शामिल एक दुधमुंहा 5 महीने का बच्चा भी है, जिसकी माँ ने दूध में पानी इसलिए मिलाया था ताकि बच्चा दूध पचा सके। उस माँ को क्या पता था कि यह पानी ही ज़हर है। अनजाना गुनाह यह कि उन्होंने आँख बंद करके उस राजनैतिक दल को चुना, जिसके रहम ओ करम पर एक अधिकारी 20 साल से इसी शहर की पानी की व्यवस्था में संजीव रूप से तैनात है, एक अधिकारी शिकायतों की फ़ाइलें अपने पास महीनों से दबा कर बैठा, उस क्षेत्र का पार्षद भयावहता के बाद भी झूला झूलने कर फुरसत का समय काट रहा।
इस गंदे पानी ने शहर का पानी ही उतार दिया, प्रदेश सरकार नगर में आती है, मृतकों की जान की क़ीमत 2 लाख रुपए लगा कर निकल जाती है, पर कमाऊ अफ़सरों पर मुँह में दही जमा लेती है। नगर सरकार ‘घण्टा’ बजा रही है।
कभी चुल्लू भर पानी में डूब कर मरने का मुहावरा था, अब इन्दौर के लिए ‘चुल्लू भर भागीरथपुरा का पानी पिला दो’ यह मुहावरा गढ़ दिया। हुक्मरानों से क्या उम्मीद करेगी जनता, जो जनता को साफ़ पानी तक पीने के लिए नहीं दे सके।
किसी फ़िल्म का संवाद था कि ‘जनता तो मरने के लिए ही बनी है’ उसी संवाद को इन्दौर में सही साबित होता देख रहे हैं।
माफ़ी तो जनता को माँगनी चाहिए, जो अपने वोट से तोल दिया ऐसे लोगों को, जिनका पानी ही उतर गया।
शहर में 59 ऐसे अन्य स्थान भी हैं जो भागीरथपुरा बनने की कगार पर हैं, जहाँ के पानी के सेम्पल फैल हो चुके हैं। पर नगर सरकार जागे तब तो, अन्यथा वहाँ भी लोग मरेंगे, तब 2 लाख रुपए का नमक लगा कर इति श्री कर लेंगे।
ऐसे में कैलेंडर नव वर्ष की सूचना इन्दौर की चरमराती और दूषित होती व्यवस्थाओं ने दे दी। जनप्रतिनिधियों की थकी हुई जमात तो बारूद के ढेर पर बैठकर शहर को मौत का मंज़र परोस कर अपनी नींद सो रहे हैं। अब तो शहर के प्रभारी मंत्री को भी सुध लेने का भी नहीं कह सकते, पता नहीं किस तरह फिर शहर के अहित को बलवान कर दे। अब तो ईश्वर ही शेष है, जिनसे न्याय की उम्मीद है और वही एकमात्र सहारा भी है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

अटल जी की स्मृति को नगर निगम ने दिया स्थायी पता : अटल बिहारी मार्ग

देशभर में नाम परिवर्तन की बयार छाई हुई है, कहीं शहरों के नए नामकरण हो रहे हैं तो कहीं-कहीं गाँव, गली और मोहल्लों के नाम बदले जा रहे हैं। कहीं इमारतों के नाम तक बदल दिए, ऐसे में नगर निगम इंदौर ने पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को इंदौर में जीवटता से प्रस्तुत करते हुए महत्त्वपूर्ण आगरा-बॉम्बे मार्ग का नाम बदल कर अटल बिहारी मार्ग कर दिया है।
अटल जी की जन्मशताब्दी के सुअवसर पर इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपनी निष्ठा वाले राजनैतिक दल के पितृपुरुष व भारत के गौरवशाली प्रधानमंत्री के नाम पर एबी रोड़ का नाम परिवर्तन कर शहर को गौरव तो दिया ही, साथ में अपनी पार्टी के आकाओं की नज़र में भी एक बड़ा काम कर दिया है।
अब शहर के जिस मार्ग को अटल जी के नाम पर किया है, उसे शराबखोरी, पब और अन्य अवैधानिक गतिविधियों से भी मुक्त कर अटल जी को श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
श्रद्धेय अटल जी ने जिस सांस्कृतिक निष्ठा का जीवन पर्यन्त अनुपालन किया, उसे ध्यान में रखकर उस मार्ग की सद्गति भी निर्धारित की जाए। यदि उसी मार्ग पर कोई शराबी, चरसी, नशेड़ी पब से निकले और पुलिस की धरपकड़ में आया तो यही लिखा जाएगा कि अटल बिहारी मार्ग पर पकड़ाए नशेड़ी, यह भी नाम के साथ विरोधाभास और कलंकित कृत्य होगा। ऐसे में जनता तो चाहती है कि एबी रोड को पब कल्चर से मुक्ति दिलाई जाए, आपराधिक तत्त्वों की धरपकड़ कर कम से कम उस मार्ग की तमाम शराब दुकानों को हटवाया जाए, ताकि पूर्व प्रधानमंत्री के नाम की गरिमा अनुरूप कार्य हो। संस्कृति और साहित्य का केन्द्र भी उस मार्ग पर बन सकता है। महापौर भार्गव से इस दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर, मध्यप्रदेश

लघुकथा- वायरल बुआ

लघुकथा

वायरल बुआ

“अरे! मुझे बता ये किसकी फ़ोटो सोशल मीडिया पर है?” रॉबिन ने इंटरनेट पर अपने दोस्त सनी को अपने फ़ोन में एक फ़ोटो देखकर कहा।

सन्नी ने कहा- “भाई होगी कोई, पर देख तो कॉफ़ी हाउस में बैठकर खुलेआम अपने बॉयफ्रेंड के साथ मस्ती कर रही है लड़की…।”
रॉबिन गौर से तस्वीर देखने के बाद एकदम चुप था, कुछ बोला नहीं।

“भाई! तू क्यों चुप हो गया इसे देखकर? तू भी देख, नया फ़ोटो है”, सन्नी ने कहा।

“चल छोड़ न सन्नी, हमें क्या…पर किसने अपलोड की होगी यार!”
सन्नी तपाक से बोल गया, “अरे वायरल बम है भाई…. इस समय ट्रेंडिंग हो रही है….. वायरल लड़की है।”

“नहीं भाई! यह फ़ोन हैक करके भी तो किसी की शरारत हो सकती है।”
(रॉबिन बोलते-बोलते चुप हो गया)

सन्नी ने कहा, “अरे यार रॉबिन, बिना फ़ोन से फ़ोटो खींचे कैसे कोई निकाल सकता है! खींचते वक्त तो इनकी बुद्धि होगी ही ना!”
एक लम्बा मौन पसर रहा था रॉबिन और सन्नी के बीच। रॉबिन रुआँसा हो गया।
सन्नी ने धीरे से कहा, “तू जानता है क्या इसे…? नहीं न ! फिर क्यों इतना टेंशन ले रहा है।”

रॉबिन चुपचाप वहाँ से चल दिया, जाते-जाते उसके दिमाग़ में एक ही चीज़ घूम रह थी, ‘सीकर वाली बुआ…. बहुत वायरल हो गई।’

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

बुलेट युग में मेट्रो की समस्या से जूझता ‘इन्दौर’

भारतीय राजनीति में अपने स्वर्णिम इतिहास का बखान करता हुआ शहर, जिसने सत्ता को सदैव अपना सहयोग दिया, जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व से प्रदेश को गौरवान्वित किया, सत्ता को इतना बल दिया कि शायद ही कोई शहर दे पाए। वर्तमान में सत्ताधारी राजनैतिक दल को पूरे नौ विधायक, महापौर, सांसद, पार्षद सब चुनकर दिए पर वर्तमान के तमाम जनप्रतिनिधियों से शहर इन्दौर का विकास और समस्याएँ हल होने का नाम नहीं ले रहीं।
एक तरफ़ देश के विकास दर के आँकड़े क़दम-दर-क़दम बढ़ते जा रहे हैं, विकास की अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही हैं, वहीं इन्दौर का ग्राफ़ गिरता नज़र आने लगा। मेट्रो का स्वप्न उस युग में भी कमज़ोर दिखाई दे रहा है, जब दुनिया बुलेट ट्रेन की तरफ़ बढ़ चुकी है। अतिक्रमण, पार्किंग विहीन मेट्रो स्टेशन, शहर की यातायात समस्या, धूल-धुएँ की जद में आता इन्दौर, और फिर अंडरग्राउंड मेट्रो लाइन का संकट शहर के सामने मुँह बाहें खड़ा है।
जनप्रतिनिधि शहर में बढ़ रहे अपराध के लिए चिंतित नज़र नहीं आ रहे, फिर विकास का स्वप्न देखना शहर के लिए तो दूभर ही है।
हालात इतने बदतर होते जा रहे हैं कि अभी शहर का बाशिंदा शहर में नौकरी करना नहीं चाहता, या यूँ कहें कि शहर में नौकरियों का संकट सामने खड़ा हुआ है। ऐसे में युवा शहर छोड़कर अन्य शहरों की ओर पलायन कर रहा है।
मेट्रो तो चलने लगी पर किस मार्ग से, यह सबके सामने है। इसलिए अब जनता की पीड़ा को समझने के लिए जनप्रतिनिधियों को सामूहिक रूप से शहर की चिन्ता करनी चाहिए, क्योंकि इन्दौर ने सदैव सत्ता को सबलता प्रदान की है।
आज कमज़ोर विपक्ष और मनमानी सत्ता से शहर का भाग्य धूल धूसरित हो रहा है। चिंता इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि इन्दौर ने मध्य प्रदेश का आर्थिक भाग्य लिखा है, इन्दौर की विकास दर पर चिंता करके इस समास्याओं से इन्दौर को मुक्त कीजिए, अन्यथा जनता की नाराज़गी फिर मतदान में दिखने लगेगी।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

शहर में फैल रहा ‘ई-रिक्शा’ से अव्यवस्थाओं का महाजाल

लापरवाह और बेपरवाह बनता जा रहा महानगर इन्दौर, इन दिनों ई-रिक्शा के कहर से भी अछूता नहीं है। जहाँ मर्ज़ी ई-रिक्शा रोकी और सवारी बैठाना-उतारना शुरू, जहाँ मर्ज़ी वहाँ पार्किंग। ऐसे में आलम यह है कि शहर की सुचारू बन रही यातायात व्यवस्थाओं में भी यह ई-रिक्शा मुसीबत बनती जा रही हैं।
बीते दिनों तो इन्दौर शहर में ई-रिक्शा की बैटरी फटने से दो लोगों की मौत हो गई। मामला विजय नगर क्षेत्र का है, जिसमें ई-रिक्शा की बैटरी फटने से झुलसी 60 वर्षीय रामकुंवर बाई पति नाथूसिंह के इलाज के दौरान बुधवार सुबह मौत हो गई। इसी हादसे में झुलसी उनकी बेटी पवित्रा की सोमवार को मौत हो गई थी। दोनों का एमवाय अस्पताल में इलाज चल रहा था। ई-रिक्शा चालक भी इस दुर्घटना में झुलसा है, जिसका इलाज चल रहा है। उसके ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला भी दर्ज कर लिया है।
ई-रिक्शा निश्चित रूप से सस्ते और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अच्छा माध्यम हो सकते हैं किन्तु अव्यवस्था और मनमानी के चलते हादसों के कारण भी बनते जा रहे हैं। ऐसे कई मामले हैं जिसमें ई-रिक्शा से यात्रियों की जान जोखिम में डालना, यातायात नियमों का उल्लंघन, और दुर्घटनाएँ शामिल हैं, जैसे कि एक ई-रिक्शा में बहुत ज़्यादा लोगों का बैठना, बैटरी फटने से आग लगना, और अन्य वाहनों से टक्कर। ये घटनाएँ लापरवाही, सुरक्षा नियमों की अनदेखी और कभी-कभी जानबूझकर ख़तरे पैदा करने का परिणाम हैं।
ये बेलगाम ई-रिक्शा संचालक यात्रियों की क्षमता से ज़्यादा लोगों को उसमें बैठा लेते हैं, और इससे यात्रियों की जान जोखिम में डाल देते हैं। ई-रिक्शा का अन्य वाहनों से टकराना और दुर्घटनाओं का कारण बनना भी शामिल है, जिसमें कई मौतें भी हुई हैं।
शहर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना है तो इन ई-रिक्शाओं को नियंत्रित और नियमानुसार संचालित करना होगा, भीड़ वाले क्षेत्र जैसे राजवाड़ा, रीगल, पलासिया चौराहा, मधुमिलन क्षेत्र, विजय नगर, रसोमा चौराहा सहित लालबाग चौराहा, महूनाका, अन्नपूर्णा क्षेत्र इत्यादि में इन ई-रिक्शाओं के कहर से यातायात व्यवस्था भी बिगड़ रही है और यात्रियों की जान का संकट भी खड़ा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा,
इन्दौर