मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति

मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति

डॉ.अर्पण जैन अविचल

भारत के भाल से पढ़े जा रहें कसीदे, कमलनी के तेज पर प्रहार हो रहा है, समाजवाद से गायब समाज है, वामपंथी भी संस्कृति और धर्म के बीच का अन्तर भूल चुके हैं, न देश की चिन्ता है,न ही परिवेश की| धर्म और जातियों के जहर में मासूम चित्कारों के गर्म तवे पर राजनैतिक खिचड़ी पकाई जा रही है, शर्म करों सत्ता के धृतराष्ट्र, शर्म करों जनता के कंधों और भावनाओं का इस्तेमाल करने वालों, शर्म करों….

देश में विगत एक पखवाड़े में लगातार ३ मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म हुआ, कठुआ, उन्नाव और इंदौर |  सत्तामद में डूबे नेताओं ने उस पर भी राजनीति करना शुरू कर दी | एक और मोमबत्ती गेंग सक्रिय हो गई दूसरी और राजनेताओं का जुलूस और शक्ति प्रदर्शन |

कोई तंत्र को दोषी ठहरा रहा हैं तो कोई जागरूकता की कमी | असल मानों तो यह बलात्कार की घटनाएँ केवल और केवल मानवता की हार से ज़्यादा नहीं | मानवीय धर्म कमजोर पड़ चुका हैं, क्योंकि व्याभिचारी कितना भी गिर क्यों न जाए पर जब बात मासूम की आती है तो शायद वो भी थोड़ा तो मानवीय हो सकता है | परंतु ऐसा नहीं होना मतलब साफ तौर पर मानवीय पहलू में छिपी सांस्कृतिक अक्षुण्णता नस्ते-नाबूत हो चुकी हैं |

किस मानसिक अवसाद के चलते यह कुकृत्य हो रहे है, यह तो जानना कठिन है किंतु इतना तो हम समझ ही सकते है क़ि कहीं न कहीं मानव धर्म ख़तरे में हैं | कोई हिंदू का तो कोई मुस्लिम का बलात्कार बता रहा हैं, परंतु बलात्कार धर्म का नहीं बल्कि लड़की का होता है, जिसका धर्म मायने नहीं रखता, अस्मिता मायने रखती हैं |

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। इस प्रकार भारतभर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी इज़्ज़त गंवा देती हैं, लेकिन आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई बयां नहीं करती। बहुत सारे मामले ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट ही नहीं हो पाती।

प्रत्येक वर्ष बलात्कार के मामलों में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है। वर्ष 2011 में देशभर में बलात्कार के कुल 7,112 मामले सामने आए, जबकि 2010 में 5,484 मामले ही दर्ज हुए थे। आंकड़ों के हिसाब से एक वर्ष में बलात्कार के मामलों में 29.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

बलात्कार के मामलों में मध्यप्रदेश सबसे अव्वल रहा, जहां 1,262 मामले दर्ज हुए, जबकि दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश (1,088) और महाराष्ट्र (818) रहे। इन तीनों प्रदेशों के आंकड़े मिला दिए जाएं तो देश में दर्ज बलात्कार के कुल मामलों का 44.5 प्रतिशत इन्हीं तीनों राज्यों में दर्ज किया गया। यह आंकड़ा राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीबी के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। पिछले कुछ दिनों में ही दिल्ली में कार में बलात्कार के कई सनसनीखेज मामले दर्ज हुए। दूसरी ओर राजस्थान की राजधानी जयपुर भी बलात्कार के मामलों में देशभर में पांचवें नंबर पर है। दिल्ली, मुंबई, भोपाल और पुणे के बाद जयपुर का नंबर इस मामले में आता है।

2007 से 2011 की अवधि के दौरान अर्थात चार साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस मामले में दिल्ली नंबर वन रही। एनसीबी के आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी लगातार चौथे साल बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में साल 2011 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए, जबकि मुंबई में 218 मामले दर्ज हुए। रिपोर्ट के मुताबिक 2007 से 2008 के बीच 18 से 30 की उम्र के करीब 57,257 लोगों को गिरफ्तार किया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा यह आंकड़े सिर्फ महिला अत्याचार के आधार पर जारी किए गए हैं।

बलात्कार के मामले में भारत विश्व की ‘डर्टी कंट्री’ की श्रेणी में शामिल हो रहा हैं, तब हमारी सरकारों और जनता की चिंता और बड़ जानी चाहिए, क्योंकि भारत का नाम विश्व पटल पर संस्कार सिंचन में अव्वल रहा हैं किंतु वर्तमान के हालात तो हमें दैहिक शोषण और यौन शोषण में ‘विश्वगुरु’ का दर्जा दिलाने से बाज नहीं आ रहे हैं |

‘विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, ‘भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’ वहीं महिलाओं के विकास के लिए केंद्र (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) के अनुसार, ‘भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’

बलात्कार के मामलों की जांच में जुटे पुलिस अधिकारियों का मानना है कि ऐसे अधिकतर मामलों में आरोपी को पीड़िता के बारे में जानकारी होती है। यह एक सामाजिक समस्या है और ऐसे अपराधों पर नकेल कसने के लिए रणनीति बनाना असंभव है।

अधिकारियों की मानें तो इनमें से अधिकांश मामले बेहद तकनीकी होते हैं। अक्सर ऐसे अपराध दोस्तों या रिश्तेदारों द्वारा किए जाते हैं, जो पीड़िता को झूठे वादे कर बहलाते हैं, फिर गलत काम करते हैं। कई बार ऐसे अपराध अज्ञात लोग करते हैं और पुलिस की पहुंच से आसानी से बच निकलते हैं। हालांकि कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि इसमें पीड़िता की रजामंदी होती है। उसे इस बात के लिए रजामंद कर लिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया।

वर्तमान में बाल अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया ( पॉक्सो क़ानून) में बदलाव किया जिसमें १२ वर्ष के कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म करने पर फाँसी की सज़ा दी जाएगी| यह निर्णायक परिवर्तन आवश्यक है साथ ही समाज को भी इस तरह के आरोपी के परिवार का सामाजिक बहिष्कार भी करना चाहिए, ताकि दुष्कर्म करने जैसे घृणित कार्य करने के पहले व्यक्ति उसके परिवार की दुर्दशा से भी बाख़बर रहें |

हमारे राष्ट्र में यदि दुष्कर्म के मामलों में वृद्धि हो रही है तो देश के तमाम राजनैतिक दलों को मिलकर एक रूपरेखा बनानी चाहिए जिससे इस तरह की समस्या से देश को बचाए जा सके, और किस क़ानून और प्रावधान के तहत दुष्कर्मी को दंड दे सके ताकि भविष्य में कोई पुनरावृत्ति न कर सके, साथ ही देश के सभी धर्म गुरुओं को भी मानवीयता के गिरते स्तर पर चिंता जाहिर करते हुए उसे बचाने के प्रयास करना चाहिए, न की सड़कों पर निकल कर राजनीति |

हमारे राष्ट्र में चुनावी आक्षेप लगाना बहुत आसान हैं, जबकि यदि राष्ट्र की असमर ख़तरे में है तो हम सब की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है की सरकार के साथ मिल कर देश बचाएँ, मीडिया, राजनेता, समाजसेवी, आंदोलनकारी आदि सभीजन मिल कर इस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं, पर हमारे यहाँ सभी ज़िम्मेदारों को राजनीति करने से फुरसत मिले तब तो देश के बारे में सोचेंगे |

कठुआ, उन्नाव और इंदौर कांड पर भी सरे आम राजनीतिक प्रपंच किए गए, बयानबाजी, नारे-प्रदर्शन आदि आदि | किंतु समाधान की दिशा में किसी ने नहीं सोचा, न समाज ने, न ही समाज के ठेकेदारों ने| लिहाजा कुकृत्य होने से कोई रोक नहीं सकता, रोकना केवल मानवीयता के गिरते स्तर को है |

डॉ. अर्पण जैनअविचल

पत्रकार एवं स्तंभकार

संपर्क: ०७०६७४५५४५५

अणुडाक: arpan455@gmail.com

अंतरताना:www.arpanjain.com

[लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ पत्रकार होने के साथ-साथ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं| ]

 

लघुकथा- चुनौती

*चुनौती*
सुन निगोड़ी… रोज सुबह उठ कर कहा चली जाती है, रोज के काम करना ही नहीं चाहती,
घर के बर्तन, कपड़े, खाना बनाना ये सब कौन करेगा…? तेरी माँ???
नौकरी से ज्यादा जरुरी घर का काम भी है…

रमा की सास ने रमा को डाँटते हुए कहा.. इसी बीच रमा का पति आकर कहने लगा…

*’रमा इस बार मकान की किश्त तुम तुम्हारी तनख्वाह से चुका देना, मेरी तन्ख्वाह इस बार भी नहीं मिली है……😔’*

अब चुनौती रमा के लिए यह है कि सास के काम में हाथ बटाएं या नौकरी करके घर चलाएं…?

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*

हिन्दीग्राम, इंदौर

यादों में हमेशा रहेंगे सेठ साहब

यादों में हमेशा रहेंगे सेठ साहब

हाँ! याद है पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए पोस्टकार्ड अभियान हेतु सेठ साहब से मिलना, पूर्ण समर्थन करने से शुरु हुआ मिलना, जानना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को…।
शहर की जनता को राजवाड़ा वापस दिलवाने के संघर्ष से लेकर कई बड़े मुद्दे जिनमें स्ट्रीट लाईट की सौगात और यहाँ तक कि सुगनीदेवी जमीन का मामला सब जगह सफेद शेर की दहाड़ से शहर भलिभांति परिचित रहा |
कई दिनों के स्वास्थ्य संघर्ष के बाद सेठ साहब का शहर को अलविदा कहने से ज्यादा दुखदायी यकीनन एक आवाज का हमेशा के लिए चुप हो जाना और इंदौर के लिए लड़ने वाले शेर का चले जाना है ।
दैनिक इंदौर समाचार में लगातार मेरे आलेखों का प्रकाशित होना और पुन: मिलने पर सेठ साहब का पहचान जाना और लेखन के लिए आशीष देना सबकुछ अब चिर स्मृतियों में हमेशा के लिए अंकित हो गया। असमय काल के आगे शेर का नतमस्तक होकर विधि के विधान को स्वीकार कर हमें छोड़ जाना बहुत याद आएगा…सेठ साहब आप हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे…
अश्रुपूरित श्रृद्धांजलि सहित…

डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’
सम्पादक- खबर हलचल न्यूज,इंदौर

suresh seth indore samachar

झुलस रहा गणतंत्र, यह राष्ट्र धर्म नहीं

झुलस रहा गणतंत्र, यह राष्ट्र धर्म नहीं ===================================================== डॉ. अर्पण जैन अविचल

जहाँ हुए बलिदान प्रताप और जहाँ पृथ्वीराज का गौरव हो, जहाँ मेवाड़ धरा शोभित और जहाँ गण का तंत्र खड़ा हो, ऐसा देश अकेला भारत है, परन्तु वर्तमान में जो हालात विश्वपटल पर पहुँचाए जा रहे है वो भारत का असली चेहरा नहीं |

बलिदानों और शूरवीरों की धरा पर बच्चों पर हमले, राष्ट्र के इतिहास के नाम पर भविष्य पर पथराव ये राष्ट्र गौरव नहीं बल्कि राष्ट्र को बदनाम करने की सुपारी लेकर काम करने की नीयत ही प्रतीत होती है|

गणतंत्र दिवस पर इस बार इतिहास खुद को दोहराएगा। भारत ने 26 जनवरी 1950 को अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया था और उस समय दक्षिण पूर्व एशिया के दिग्गज नेता और इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो मुख्य अतिथि थे। आजादी के 68 साल बाद भारत ने एक बार फिर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदो को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित किया है।

                              हालांकि इस बार सिर्फ इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ही मुख्य अतिथि नहीं होंगे। भारत ने आसियान के नौ अन्य राष्ट्राध्यक्षों को भी इस ऐतिहासिक पल के लिए आमंत्रित किया है जो गणतंत्र दिवस की परेड में भारत की सैन्य क्षमता और सांस्कृतिक विविधता के गवाह बनेंगे। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान के 10 देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया है जो अपने आप में अप्रत्याशित है।

और इस गौरव क्षण में राष्ट्र जातिवाद के दावानल में जल रहा है, विरोध तो इतिहास के साथ हुई खिलवाड़ का होना था, परन्तु कहीं मासूम बच्चों की स्कूली बस पर पथराव तो कहीं बसें जलाई जा रही है | ये सब सोची समझी साजिश है हिन्द की अस्मिता को दाँव पर लगा कर वैश्विक मंच पर बदनाम करने की |

राष्ट्र आन्तरिक कलह की आग में झुलस रहा है,और झुलसा हुआ शरीर लेकर क्या हम गणतंत्र दिवस मनाएंगे ? आखिर शर्म तो तब आनी चाहिए थी जब देश के अंदर ही जयचंद जिन्दा हो |

राष्ट्रीय पर्व के समीप आते ही गर्व और शौर्य का परचम लहराने वाले राजपूतों के नाम पर करणी सेना बना कर शौर्य को बदनाम करने का बीड़ा उठाकर राष्ट्र को तोड़ा जा रहा है |खण्डित गणतंत्र क्या राष्ट्रधर्म का निर्वाह कर रहा है ??

धिक्कार है ऐसे शिखंडियों पर, जो राष्ट्र के गौरव और सम्मान को विश्व पटल पर लज्जित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हो |अब भी हमारी आजादी और गणतंत्र अधूरा है, क्योंकि अभी भी जयचंद जिन्दा है |

भामाशाह और प्रताप के वंशज ऐसा तो नहीं कर सकते, क्योंकि सुना है शेर पुष्प और मासूम घास नहीं खाता|

परन्तु दुर्भाग्य है इस देश का कि यहाँ चंद चांदी के सिक्को की खनक से माँ का चीर हरण भी सहर्ष देखा और खरीदा जा सकता है |करणी सेना द्वारा जो राष्ट्रीय पर्व के समिप ही राष्ट्र संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है, ये उनके जयचंद होने के प्रमाण से ज्यादा क्या होगा | भारत में जिस तरह से करणी सेना पद्मावत फिल्म के विरोध में राष्ट्र संपत्ति पर प्रहार कर रही हैं, ये लोकतंत्र या गणतंत्र नहीं बल्कि विरोध के तरीके से राष्ट्रीय नुकसान हैं |

बहरहाल देश को झुलसने से बचाने में अपना सर्वस्व अर्पण करें, वर्ना हम एक दिन बिखरा हुआ राष्ट्र और खण्ड-खण्ड विखंडित समाज ही बच्चों को विरासत में सौंप पाएंगे |

 डॉ. अर्पण जैन अविचल

पत्रकार एवं स्तंभकार

इंदौर, मध्यप्रदेश

07067455455

 

मैं जरुरत बनूंगा

हाँ !
प्यार की ठण्ड से *ठिठुरते* जज्बातों पर
मैं तुम्हारी तपन बनूंगा,

हाँ !
उम्मीद के स्याह आसमान में दीपक-सी
मैं तुम्हारे लिए रोशनी बनूंगा,

हाँ!
थामकर हाथ मेरा चलने की आदत है तुम्हें
मैं तुम्हारी लाठी बनूंगा,

हाँ !
तुम्हें जरुरत दवा की नहीं मेरे साथ की है,
मैं तुम्हारी जरुरत बनूंगा

हाँ!
स्वप्नों की सेज पर संबलता का साया,
मैं तुम्हारी हकिकत बनूंगा

हाँ!
गन्तव्य पर पथिक बन चलों तुम,
मैं तुम्हारी कोशिश बनूंगा,…

 

*डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’*

कविता-भारतीय

तारीखों के पटलने से साल बदल जाता है,
मौसम के पटलने से नव सृजन मना कर देखो,

हाँ !
तुम जो आज नया साल मना रहे हो,
गुलामी की जंजीरों से परे निकल कर देखो,

हाँ !
वही बेड़ियाँ जिसमें शताब्दियों की चारणता है,
कभी स्वाधीनता के समर का विज्ञान बनकर देखो,

हाँ !
वही कण जिसमें संस्कृति की महक आती हो,
तुम कभी अंग्रेजीयत की बू के पार निकलकर देखो,

कभी जी कर देखो हिन्दी का हिन्दुस्तान ,
भारतभूमि के जागृत प्राण बन कर देखो,

हाँ !
वही प्राण जिसकी शिराओं में लहू दौड़ता हो राष्ट्रप्रेम का,
कभी अभिनंदन के अर्पण की शान बन कर देखो,

बस अब तो जाग जाओ योद्धा समर के,
माँ भारती के गौरव का गान बनकर देखो….
*माँ भारती के गौरव का गान बनकर देखो….*

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*
हिन्दीग्राम, इंदौर

 

स्वास्थ्य समस्या- जिम्मेदार कौन

 

हमारे धर्म शास्त्रों में मानव शरीर को सबसे बड़ा साधन माना गया है | कहा भी गया है कि
*शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम*– यानी यह शरीर ही सारे अच्छे कार्यों का साधन है | सारे अच्छे कार्य इस शरीर के द्वारा ही किये जाते हैं|
जब शरीर स्वस्थ रहेगा तो मन और दिमाग तंदरुस्ती से लबरेज होकर उत्साहित रहेंगे | परन्तु आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में मनुष्य अपने स्वास्थ्य को लेकर लापरवाह होते जा रहे है| यही लापरवाही जीवन की बड़ी कठीनाईयों को आमंत्रण दे रही है | आज के दौर में स्वस्थ्य रहना ही सबसे बड़ी चुनौती है | हमारे धर्मग्रंथो में तो यह भी लिखा है कि –
*को रुक् , को रुक् , को रुक् ?* *हितभुक् , मितभुक् , ऋतभुक् ।*

अर्थात ‘कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है ?
हितकर भोजन करने वाला , कम खाने वाला, ईमानदारी का अन्न खाने वाला ही स्वस्थ्य है |

“आप क्या खा रहे हैं स्वास्थ्य का संबंध केवल इससे नहीं है बल्कि आप क्या सोच रहे हैं और क्या कह रहे हैं स्वास्थ्य का संबंध इससे भी है।” आम तौर पर एक व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से फिट होने पर अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लेना कहा जाता है। हालांकि स्वास्थ्य का महत्व इससे अधिक है। स्वास्थ्य की आधुनिक परिभाषा में कई अन्य पहलुओं को शामिल किया गया है जिनके लिए स्वस्थ जीवन का आनंद लेना बरकरार रखा जाना चाहिए।

*स्वास्थ्य की परिभाषा कैसे विकसित हुई?*

शुरुआत में स्वास्थ्य का मतलब केवल शरीर को अच्छी तरह से कार्य करने की क्षमता होता था। इसको केवल शारीरिक दिक्कत या बीमारी के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता था। 1948 में यह कहा गया था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने किसी व्यक्ति की संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति को स्वास्थ्य में शामिल किया है न कि केवल बीमारी का अभाव। हालांकि यह परिभाषा कुछ लोगों द्वारा स्वीकार कर ली गई थी लेकिन फिर इसकी काफी हद तक आलोचना की गई थी। यह कहा गया था कि स्वास्थ्य की यह परिभाषा बेहद व्यापक थी और इस तरह इसे सही नहीं माना गया। इसे लंबे समय के लिए अव्यवहारिक मानकर खारिज कर दिया गया था। 1980 में स्वास्थ्य की एक नई अवधारणा लाई गई। इसके तहत स्वास्थ्य को एक संसाधन के रूप में माना गया है और यह सिर्फ एक स्थिति नहीं है।

आज एक व्यक्ति को तब स्वस्थ माना जाता है जब वह अच्छा शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद ले रहा है।

*स्वास्थ्य को बनाए रखने का महत्व*

अच्छा स्वास्थ्य जीवन में विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए आधार बनता है। यहां बताया गया है कि यह कैसे मदद करता है:

*पारिवारिक जीवन:* कोई व्यक्ति जो शारीरिक रूप से अयोग्य है वह अपने परिवार की देखभाल नहीं कर सकता है। इसी तरह कोई व्यक्ति मानसिक तनाव का सामना कर रहा है और अपनी भावनाओं को संभालने में अक्षम है तो वह परिवार के साथ अच्छे रिश्तों का निर्माण और उनको बढ़ावा नहीं दे सकता है।

*कार्य:* यह कहना बिल्कुल सही है कि एक शारीरिक रूप से अयोग्य व्यक्ति ठीक से काम नहीं कर सकता। कुशलतापूर्वक काम करने के लिए अच्छा मानसिक स्वास्थ्य बहुत आवश्यक है। काम पर पकड़ बनाने के लिए अच्छे सामाजिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद लेना चाहिए।

*अध्ययन:* ख़राब शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी अध्ययन में एक बाधा है। अच्छी तरह से अध्ययन करने के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अलावा अच्छा संज्ञानात्मक स्वास्थ्य बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

एक सर्वे के अनुसार तो वर्तमान में होने वाली बीमारीयों में 78 प्रतिशत से ज्यादा बीमारीयाँ हमारी जीवनशैली की अनियमितताओं और गड़बड़ीयों के कारण ही होती है |
इसलिए यह भी कटु सत्य है कि मानव की लापरवाही ही उसके रोगी होने की मूल कारक है |
अष्टावक्र में लिखा भी गया है कि *बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का जो चेहरा रहता है, वह प्रकृति की देन है, तीस वर्ष की आयु का चेहरा जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन पचास वर्ष की आयु का चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है।*

और व्यक्ति की अपनी कमाई से तात्पर्य उसके स्वास्थ्य के प्रति परवाह और जिम्मेदारी ही है |
हमें अपनी जीवनशैली में नियमितता का विशेष ध्यान रखना होगा, अन्यथा रोग को निमंत्रण हम स्वयं ही देंगे | एक अंग्रेजी डाक्टर थॉमस फुल्लर अपनी किताब में लिखते है कि *’जब तक रुग्णता का सामना नहीं करना पड़ता; तब तक स्वास्थ्य का महत्व समझ में नहीं आता है।’*

*स्वास्थ्य को सुधारने की तकनीक*

स्वास्थ्य का सुधार करने में सहायता करने के लिए यहां कुछ सरल तकनीकें दी गई हैं:

*स्वस्थ आहार योजना का पालन करें*

अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने की ओर पहला कदम विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध आहार होना है। आपके आहार में विशेष रूप से ताजे फल और हरी पत्तेदार सब्जियां शामिल होनी चाहिए। इसके अलावा दालें, अंडे और डेयरी उत्पाद भी हैं जो आपके समग्र विकास और अनाज में मदद करती हैं जो पूरे दिन चलने के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं।

*उचित विश्राम करें*

अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करने और काम करने के लिए ऊर्जा बनाए रखना आवश्यक है। इसके लिए 8 घंटों के लिए सोना ज़रूरी है। किसी भी मामले में आपको अपनी नींद पर समझौता नहीं करना चाहिए। नींद की कमी आपको सुस्त बना देती है और आपको शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान करती है।

*व्यायाम*

आपको अपने पसंद के किसी भी शारीरिक व्यायाम में शामिल होने के लिए अपने दैनिक कार्यक्रम से कम से कम आधे घंटे का समय निकालना चाहिए। आप तेज़ चलना, जॉगिंग, तैराकी, साइकिल चलाना, योग या अपनी पसंद कोई भी अन्य व्यायाम का प्रयास कर सकते हैं। यह आपको शारीरिक रूप से फिट रखता है और अपने दिमाग को आराम देने का एक शानदार तरीका भी है।

*दिमागी खेल खेलें*

जैसा कि आप के लिए शारीरिक व्यायाम में शामिल होना महत्वपूर्ण है आपके लिए दिमागी खेल खेलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ये आपके संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

*ध्यान लगाना*

ध्यान आपके मन को शांत करने और आत्मनिरीक्षण करने का एक शानदार तरीका है। यह आपको एक उच्च स्थिति में ले जाता है और आपके विचारों को और अधिक स्पष्टता देता है।

*सकारात्मक लोगों के साथ रहें*

सकारात्मक लोगों के साथ रहना आवश्यक है। उन लोगों के साथ रहें जिनके साथ आप स्वस्थ और सार्थक चर्चाओं में शामिल हो सकते हैं तथा जो आपको निराश करने की बजाए आपको बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। यह आपके भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

*रूटीन चेक-अप कराते रहें*

वार्षिक स्वास्थ्य जांच कराना एक अच्छा विचार है। सावधानी हमेशा इलाज से बेहतर है। इसलिए यदि आप अपनी वार्षिक रिपोर्ट में किसी भी तरह की कमी या किसी भी तरह के मुद्दे को देखते हैं तो आपको तुरंत मेडिकल सहायता प्राप्त करनी चाहिए और इससे पहले कि यह बढ़े इसे ठीक कर लेना चाहिए।इन्ही सब कारकों के साथ सब स्वस्थ रहें, मस्त रहें |

  • *डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’*&

कविता-धुंध

सुनो!
ये मौसम है ठण्ड और *धुंध* का,
पर तुम ज्यादा संभलना इससे,
क्योंकि इस मौसम में नमी
और साथ-साथ आलस होता है,
और यह मौसम सपनों पर भी
धुंध की परते चढ़ा देता है ।
और अभी सपनों को धुंध से बचाना होगा,
वरना हम बिखर से जाएंगे,

हाँ !
इसके लिए तुम मेहनत वाली
आग के सिरहाने ही रहना…
तपन से कोई धुंध ज्यादा
टिक नहीं पाएंगी…
और धुंध का न टिकना मतलब
लक्ष्य का ओझल न होना ही है,

हाँ!
तुम हौसला रखना उड़ान का,
बाकि अासमान छूने का जज्बा हम साथ लेकर चल रहे है ।
और हम दोनों मिलकर जीवन के कोहरे के पार,
अपने हिस्से का सूरज भी ले आएंगे…
हाँ! अपने हिस्से का आसमान भी ‘अवि’

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*

लघुकथा- मंचों की कवयित्री

संस्कृति मंचों की एक उम्दा कवियत्री है । सप्ताह में 4 से अधिक कवि सम्मेलनों में रचना पाठ करना ही संस्कृति की पहचान थी ।
पुरुषप्रधान समाज होने के कारण कई बार संस्कृति का सामना फूहड़ कवियों और श्रोताओं से भी होता था ।
इसी बीच एक गाँव में हुए कवि सम्मेलन में संचालक द्वारा संस्कृति की रचना को लेकर भद्दी और अश्लील फब्तियाँ मंच से कस दी ।
संस्कृति ने आव देखा ना ताव, मंच से ही संचालक के शब्दों का कड़ी *प्रतिक्रिया* दी और दो टूक शब्दों में संचालक कवि की लू उतार दी ।
उस संचालक को आयोजकों ने भी खूब लताड़ा और मंच से उतार दिया । शर्मिंदगी के मारे उस संचालक को काव्य जगत से भागना ही पड़ा ।
आज संस्कृति के प्रतिक्रियावादी रवैये से कई स्त्रीयों का लाभ हुआ जो मंच के गौरव के कारण यह सब सह जाती थी ।
यदि समाज में रहना है तो हर गलत कथ्य या आचरण का प्रतिकार करना आना चाहिए, वर्ना प्रतिकार न करना चलन का हिस्सा बन जाता है । और इससे कई लोग प्रभावित होते है ।

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*
हिन्दीग्राम, इंदौर

कविता- वसुंधरा

सौम्य सुधा सब पक्ष हमारा,
जीवन का अगणित श्रृंगार |
सबकुछ सहकर कुछ ना बोले,
वहीं माँ है हमारी तारणहार ||

तंतु की विवेचना भी सहती,
न निकले कभी अश्रु की धार |
अहम के टकराव में रहती,
धरती माँ है हमारी पालनहार ||

निश्चल मन, निर्मल स्वअंग है,
सबसे ही करती वो भी प्यार |
कभी न करती फेर किसी में
वहीं धरा है हमारी चिंतनहार ||

न जाति न रंग भेद है उसमें
सबका उस पर है अधिकार |
मौन स्वीकृति सबको देती
‘अवि’ वसुंधरा है पुरणहार ||

अर्पण जैन ‘अविचल
इंदौर (.प्र.)