शब्द की साधना और हिन्दी पत्रकारिता

शब्द की साधना और हिन्दी पत्रकारिता

◆डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

 

शब्द-शब्द मिलकर जब ध्येय को स्थापित करते हैं, शब्द-शब्द मिलकर जब राष्ट्र का निर्माण करते हैं, शब्द-शब्द मिलकर जब सत्ता का केंद्र और जन मानस का स्वर बनते हैं, शब्द-शब्द मिलकर जब व्यक्ति से व्यक्तित्व का रास्ता बनाते हैं, तब कहीं जाकर शब्द के साधकों की आत्मा के सौंदर्य का प्रतिबोध होता है।
लगभग दो शताब्दियों तक का सफ़र तय करने वाली हिन्दी पत्रकारिता, आज आपने गौरव से सुसज्जित भी है तो वहीं कालांतर में हुए बदलाव से अचंभित भी।

बंगाल की धरती पर 30 मई 1826 में पण्डित युगल किशोर शुक्ल जी ने ‘उद्दण्ड मार्तण्ड’ नामक पहले हिन्दी अख़बार का प्रकाशन कर हिन्दी पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास को लिखने वाले स्वर्ण अक्षर का टंकण किया था। निःसंदेह यह स्वर्ण अक्षर देश और दुनिया को यह अनूठी सीख भी दे गया कि भारत में अनेकता में एकता का चित्र हर जगह नज़र आ सकता है। बंगाली भाषी प्रदेश से हिन्दी पत्रकारिता की नींव का रखा जाना, इसी वृहद समन्वयक भारत की तस्वीर रही है।
इतिहास साक्षी है भारत के शब्द साधकों के श्रम का और उनके अवदान का, जिसने विश्व को पत्रकारिता के नए मानक और नए बिम्ब देकर नई दिशा भी प्रदान की है।
15-16वीं सदी में आरम्भ हुई पत्रकारिता का केंद्र रोम और यूरोप हुआ करता था, उस कालखण्ड में पत्रकारिता का उद्देश्य मनोरंजनभर से इतर कुछ नहीं था, बल्कि भारत में आरम्भ होने वाली हिन्दी पत्रकारिता ने मूल्य, मानवीयता, देश प्रेम और भारत की आज़ादी का उद्देश्य स्थापित कर विश्व को यह दिखा दिया कि हर पहलू में भारतीयता सदा से नवाचार और मूल्य आधारित मानकों की स्थापना में अव्वल है।

विश्व हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास इस बात का साक्षी है कि आज दो शताब्दी बीत जाने के बावजूद भी समय के पहिये ने धधकती आग ही लिखने का साहस किया, अवसाद और कोरोना के काल में सत्ता और राजनीति के अलावा जनमानस की आवाज़ को मुखर किया, लाशों के ढेर पर बन रही लोकतंत्र की इमारतों का विरोध किया, सकारात्मक ख़बरों का बीजारोपण करते हुए उसे अंकुरित करने का प्रयास किया, बच्चों की किलकारियों को सहेजा और आने वाली पीढ़ी के लिए नज़ीर बनने का प्रयास किया।

यह भी अटल सत्य है कि जिस तरह सर्प समय आने पर अपनी केचुली बदलता है, आदमी स्नान उपरांत कपड़े बदलता है, उसी तरह, पत्रकारिता ने भी समय के साथ कदमताल करते हुए अपने स्वरूप को लगातार बदला भी है, प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रॉनिक से रेडियो और वेब, वेब से मोबाइल पत्रकारिता इसके उदाहरण हैं। इस स्वरूप के बदलाव के मध्यकाल में कई बार मूल्यों और आदर्शों के साथ भी समझौते हुए हैं और निश्चित तौर पर आगत-अनागत का दोष भी हुआ है किन्तु इसके बावजूद भी कई तूफ़ानों को ख़ुद में समाहित करते हुए एक अजेय योद्धा की तरह हिन्दी पत्रकारिता अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है।
साहित्य का सहज सामंजस्य साहित्यग्राम में दिखा, हिन्दी का अभिजात्य हिन्दीग्राम से बन रहा है, यही भाषाई सौंदर्य और मूल्यों की स्थापना का शिखर कलश रखा जा रहा है ताकि भविष्य के नौनिहाल हिन्दी पत्रकारिता पर गर्व करें यानी उन्हें हिन्दी के पत्रकार होने का घमण्ड हो।
हिन्दी पत्रकारिता दिवस की अशेष शुभकामनाओं के साथ…..

जय हिन्दी!

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*
राष्ट्रीय अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान,
संपादक, ख़बर हलचल न्यूज़

www.arpanjain.com

 

ब्लॉगर पर ब्लॉग कैसे बनाएँ

ब्लॉगर पर ब्लॉग कैसे बनाएँ

■ *डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*

यदि आपने ब्लॉगिंग करने का निश्चय किया है तो निश्चित तौर पर आज के समय के अनुसार आपका सही निर्णय है।
निम्नलिखित प्रक्रिया और निर्देशों का पालन करते हुए आप ब्लॉग बना सकते हैं-

1. अपने वेब ब्राउज़र (क्रोम, ब्राउज़र) खोलें उसमें सबसे पहले www.blogger.com पर जाएँ।

2. ब्लॉग बनाने के लिए अपने Gmail account से sign up करें।

3. अब आपको दो option नज़र आते हैं Google+Profile और Blogger Profile किसी एक को चुनें और Profile set करें। इसके बाद Create Blog पर क्लिक करें।
उपरोक्त प्रक्रिया अपनाते ही आपको ब्लॉग दिखेगा, उसने विकल्प आएँगे जैसे-

*Title*

अपने blog का Title लिखें जैसे अगर आपके blog का address है। www.arpanjain.com है तो यहाँ पर arpan jain अथवा अर्पण जैन के आलेख। डॉ अर्पण का लेखन आदि लिखें।

*Address*
जैसे आप 204 अनु अपार्टमेंट 21/2 साकेत नगर में रहते हैं तो यह आपका भौतिक पता है, वैसे ही इंटरनेट की दुनिया में यूआरएल, वेबसाइट एड्रेस, ब्लॉग एड्रेस आपका पता होता है, जिसके माध्यम से आपके ब्लॉग को अथवा आपको गूगल पर खोजा जाता है।
अपने blog का address लिखें, यह वो एड्रेस है जिसे लोग Google में सर्च करके आपके blog तक पहुँचते हैं, जैसे www.asjainindia.blogspot.in अगर आपके द्वारा दिया गया address available होगा तो आपको “This Blog address is available” मैसेज दिखाई देगा।

*Theme*
आप अपने ब्लॉग की Theme किसी तरह की रखना चाहते हैं, उसे भी select करें जिसे आप बाद में भी बदल सकते हैं।

*Create Blog* पर क्लिक करते ही आपका blog बनकर तैयार हो चुका है।

आशा है आपको उपरोक्त प्रक्रिया समझ आ गई होगी, कहीं कोई समस्या आने पर जब आप कम्प्यूटर के सामने बैठे ब्लॉग बना रहे हो तो आप मुझे फ़ोन पर सम्पर्क कर सकते हैं, मेरा संपर्क सूत्र 09893877455 है।

 

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*
हिन्दीग्राम, इंदौर

राजनीति के अजातशत्रु का यूँ चला जाना…..खल गया साहब

राजनीति के अजातशत्रु का यूँ चला जाना…..खल गया साहब

*डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’*

 

विधि के विधान के आगे विधिविद की भी नहीं चली, कर्क रोग ने जब से जकड़ा वित्त और न्याय मंत्री का दायित्व भी कमजोर होता चला गया, लंबे समय से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते-करते आखिरकार अरुण जेटली जी ने अलविदा कह दिया।
वकील पिता महाराज किशन जेटली जी व माता रतन प्रभा जेटली जी की संतान के रूप में अरुण जेटली जी का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी विद्यालयी शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, नई दिल्ली से 1957-69 में पूर्ण की। उन्होंने अपनी 1973 में श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, नई दिल्ली से कॉमर्स में स्नातक की। फिर 1977 में दिल्ली विश्‍वविद्यालय के विधि संकाय से विधि की डिग्री प्राप्त की। छात्र के रूप में अपने कैरियर के दौरान, उन्होंने अकादमिक और पाठ्यक्रम के अतिरिक्त गतिविधियों दोनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के विभिन्न सम्मानों को प्राप्त किया हैं। वो 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे।
अरुण जेटली ने 24 मई 1982 को संगीता जेटली से विवाह किया। उनके दो बच्चे, पुत्र रोहन और पुत्री सोनाली हैं। आपके बच्चें भी अधिवक्ता के रूप में ही कार्य कर रहें हैं।
जेटली जी का राजनैतिक सफर तब चरम पर आने लगा जब साल 1991 से भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बनें। वह 1999 के आम चुनाव से पहले की अवधि के दौरान भाजपा के प्रवक्ता बन गए।
1999 में, भाजपा की वाजपेयी सरकार के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सत्ता में आने के बाद, उन्हें 13 अक्टूबर 1999 को सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया गया। उन्हें विनिवेश राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी नियुक्त किया गया। विश्व व्यापार संगठन के शासन के तहत विनिवेश की नीति को प्रभावी करने के लिए पहली बार एक नया मंत्रालय बनाया गया। उन्होंने 23 जुलाई 2000 को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में राम जेठमलानी के इस्तीफे के बाद कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाला।
मई 2004 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के साथ, जेटली एक महासचिव के रूप में भाजपा की सेवा करने के लिए वापस आ गए, और अपने कानूनी कैरियर में वापस आ गए।
मोदी युगीन सरकार में 26 मई 2014 को, जेटली को नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वित्त मंत्री के रूप में चुना गया (जिसमें उनके मंत्रिमंडल में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रक्षा मंत्री शामिल हैं।)
भारत के वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, सरकार ने 9 नवंबर, 2016 से भ्रष्टाचार, काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के इरादे से महात्मा गांधी श्रृंखला के 500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण किया।
इसके बाद अगले आर्थिक सुधार के रूप में 20 जून, 2017 को उन्होंने पुष्टि की कि जीएसटी रोलआउट अच्छी तरह से और सही मायने में ट्रैक पर है।
यानी नोटबन्दी और जीएसटी पर जेटली जी का पहनाया चोला ही देश में चला।

विपक्षियों के भी चहेते रहें जेटली राजनीति के अजातशत्रु रहें है। आज जब दिन के 12 बजकर 7 मिनट पर उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस लेकर जेटली युग को अलविदा कह दिया तब देश ने सही मायनों में एक कुशल रणनीतिकार और गंभीर नेतृत्व खो दिया। यह नुकसान न केवल भाजपा का रहा बल्कि राष्ट्र ने भी अच्छा विधिविद खोया है।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि सहित…

*डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’*
www.arpanjain.com

सवाल तो विधान का था…

सवाल तो विधान का था…
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■ डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’

हस्तिनापुर के अनुबंध और करार में बंधें गुरू द्रोणाचार्य ने जब वनवासी बालक और क्षेत्रीय काबिले के सरदार के पुत्र को धनुर्विद्या सीखाने से इंकार कर दिया तो वही वनवासी बलवान एकलव्य गुरु द्रोण की मूर्ति से धनुर्विद्या सीखने लगा और पारंगत होने पर उसी के जंगल में एक कुकुर का भोंकना भी वह न सह सका और शरों से उस कुकुर के मुँह को बंद कर दिया।
तभी गुरु द्रोणाचार्य और पाण्डव उसकी प्रशस्त धनुर्विद्या को खोजते-खोजते एकलव्य से जा मिले, गुरु ने संवाद के बाद जानने पर गुरुदक्षिणा में अंगूठा मांग लिया।
सवाल तो तब भी उठे, और तब भी जब गुरु द्रोण ने धनुर्विद्या सिखाने से इंकार किया ।
जबकि सच तो यह है कि अनुबंध और विधान नाम की कोई चीज होती है, इसको लेकर बुद्धिमान प्रश्न नहीं करते और उनके अतिरिक्त अन्य को आप समझा भी दोगे तो समझ नहीं आएगी, क्योंकि नीति विरुद्ध तो आप भी हो ही।
क्या एकलव्य का दोष नहीं था कि बिना गुरु द्रोण की आज्ञा के क्यों उसने उनकी मूर्ति बनाई?
सवाल तो यह भी उठा कि एकलव्य निरीह वनवासी था, तो महाशय कोई निरीह सीधा-साधा व्यक्ति धनुर्विद्या ही क्यों सीखेगा?
धनुर्विद्या वही सीखते है जिन्हें योद्धा बनना होता है, और कबिले के सरदार का बेटा यानी उस कबिले का अगला सरदार निरीह या मूर्ख नहीं हो सकता।
खैर प्रश्न यही था न कि ‘गुरु द्रोण ने एकलव्य को क्यों धनुर्विद्या नहीं सिखाई?’ और उसके उपरांत भी ‘अँगूठा क्यों दक्षिणा में मांग लिया?’
दोनों ही प्रश्नों का जवाब केवल एक ही था, वो है ‘अनुबंध या संविधान’ ।
हस्तिनापुर को दिए वचनों में धनुर्विद्या सिखाने का अनुबंध केवल हस्तिनापुर के राजपुत्रों से था, अतिरिक्त किसी को वो सिखा नहीं सकते थे और यही जब एकलव्य ने किया तो दुनिया वाले उनके बाद ये नहीं कहें कि गुरु द्रोणाचार्य वचन के पक्के या विधान के पक्के नहीं थे इसलिए अँगूठा दक्षिणा में मांगा।
इसके अतिरिक्त एक और बात कि गुरु द्रोण भी जानते थे कि कौन किस विद्या को प्राप्त करने का अधिकारी है , एक निरीह श्वान पर अपनी विद्या का प्रयोग करने वाला धैर्यवान योद्धा हो ही नहीं सकता।

अब बात विधान, संविधान और अनुबंध की करते है-
प्रत्येक जीवन में, संस्था में, ग्राम, नगर,प्रान्त और राष्ट्र में संचालन विधान और संविधान अनुरूप होता है।
संचालन की सुस्पष्टता उसमें निहित संवैधानिक शक्तियों के कारण होती है। नियमों से बंधा जीवन अलंकार होता है।
कोई व्यक्ति हठ कर सकता है, किन्तु संस्था, राज्य, राष्ट्र हठी नहीं हो सकतें ,यदि ऐसा होता है तो उस संस्था, राज्य और राष्ट्र की अवनति तय है।
उसके संचालन हेतु बनाए गए नियमों को मानना ही होता है, उदाहरण के लिए कोई अति बुद्धिमान व्यक्ति यह कहता है कि केवल उसके लिए नियम बदल दो तो यह न संस्थान, राज्य या राष्ट्र के लिए संभव है, क्योंकि ये संवैधानिक व्यवस्था से चलने वाला तंत्र है।
संस्थान या राष्ट्र किसी का घर नहीं जो आपके व्यक्तिगत के लिए नियमों को ताक में रख दें।
उसके उपरांत भी व्यक्तिगत मदद की जा सकती है, किन्तु संस्थागत नियमों का उलंघन करके एक परिपाठी न बनाने की इच्छा भी संवैधानिक कमेटी की होती है।
नियमों को तोड़ने की प्रगाढ़ता चाहने वाले शाख से टूट जाया करते है और उसके बाद खुद के वजूद तलाशते रहते है।
वैसे जो संस्थान या राष्ट्र में दोगला चरित्र निभाते है, इधर-उधर की करने में जीते है, केवल अपना सम्मान, मंच औऱ पैगाम चाहते है वो भी तो कहाँ टिक पाते है। उनके हाथ क्या आता है वो भी जग जाहिर है। वो दो ही कोढ़ी के होते है, इसमें कोई शक भी नहीं है। यदि नियमों से बंधे रहें तो लहरों से भी मोहब्बत मिलती है, वरना ज्वार बनकर लहरें ही डूबा देती है। इसलिए संविधान और विधान का मान आवश्यक है।

*– डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’*

हिन्दी योद्धा

हिन्दी योद्धा

रत्नगर्भा भारत की धरा पर सदा से ही माँ, मातृभाषा और मातृभूमि के प्रति व्यक्ति के कर्तव्यबोध का व्याकरण बना हुआ है। हमारे यहाँ का ताना-बाना ही संस्कार और संस्कृति के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वाहन का बना है। हमारे यहाँ धर्मग्रन्थ भी ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ के सिद्धांत का प्रवर्तन करते है। आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा है कि –

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।’

किन्तु वर्तमान में हमारी मातृभाषा जो हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा होना चाहिए वो हिन्दीभाषा दूषित राजनीती की शिकार होती जा रही है। सन १९६७ में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने से रोक कर राजभाषा बना दिया। साथ ही एक विदेशी भाषा अंग्रेजी की दास्ताँ को स्वीकार करते हुए उसे भी राजभाषा बना दिया गया।

फिर मत और आधिपत्य के साथ तुष्टिकरण की राजनीती ने अनुसूचियों के माध्यम से छल करके लगातार हिन्दी को अलग-थलग करके उसको तोड़ा भी जा रहा है और फिर हिन्दी के सम्पूर्ण स्वाभिमान पर कुठाराघात किया जा रहा है। हिन्दी भाषा पर आए इस संकट की घडी में  भारतीयता के नाते भारत के स्वाभिमानी स्वयंसेवक योद्धाओं की आवश्यकता है। भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को पुनर्स्थापित करने के लिए मातृभाषा उन्नयन संस्थान निरन्तर प्रयासरत है। डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’ और डॉ प्रीति सुराना के साथ आज संस्थान के प्रत्येक सारथी भारतेन्दु हरीशचंद और महात्मा गाँधी के सपनों को पूर्ण करने के लिए इस भारत की पावन भूमि पर कार्य करती है। हिन्दी के स्वाभिमान की स्थापना के आन्दोलन से देश के अंतिम व्यक्ति तक ले जाने और उन्हें जोड़ कर हिन्दी के प्रति निष्ठावान बनाने के संकल्प को पूर्ण करने के लिए जो भी भाई-बहन इस सेवा के लिए रोज 1 से 2 घंटा समय दे सकते हैं तथा इस कार्य को नौकरी या व्यवसाय के रूप में नही, बल्कि राष्ट्र सेवा, मातृभाषा सेवा, मातृभूमि सेवा समझकर सेवा भाव से करना चाहते हैं। हम ऐसे कर्मठ, पुरुषार्थी व संस्कारी, भाई-बहनों को ‘हिन्दी योद्धा’ बनने के लिए आमंत्रित करते है।

हिन्दी योद्धा का कर्तव्य:

  • आज हिन्दी को विश्वस्तर पर पहचान दिलाने के लिए हमें जुटकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना होगा,
  • हस्ताक्षर बदलो अभियान को अपने क्षेत्र में संचालित एवं प्रचारित करना होगा,
  • हिन्दी लेखन करने वाले साथियों को आय दिलवाने में मदद करनी होगी,
  • हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उसे बाजार मूलक भाषा बनानी होगी,
  • हिन्दी साहित्य को आमजन तक पहुँचाना होगा,
  • हिन्दी के प्रचार हेतु अपने क्षेत्र में हिन्दी प्रेमियों का समुच्चय बनाकर प्रतियोगीताएं, कार्यक्रम आदि का संचालन करना होगा।

हिन्दी योद्धा द्वारा किए जाने वाले आवश्यक कार्य:

  • हस्ताक्षर बदलो अभियान संचालित करना।
  • ‘शिक्षालय की ओर चले हिन्दीग्राम’ संचालित करना।
  • हिन्दी प्रशिक्षण शिविर आयोजित करना।
  • आदर्श हिन्दीग्राम बनाना और गतिविधियां संचालित करना।
  • संगणक योद्धा , संवाद सेतु, हिन्दी समर्थक जनमानस को जोड़ना।
  • जनसमर्थन अभियान को संचालित कर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु समर्थन प्राप्त करना।
  • हिन्दी व्याख्यानमाला, काव्य गोष्ठी, निबंध प्रतियोगिताएं, चित्रकला प्रतियोगिता, पुस्तक समीक्षा आदि आयोजित करना।
  • हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करना।
  • प्रत्येक हिन्दी योद्धा द्वारा संचालित समस्त कार्यों का विवरण अनिवार्यतः संस्थान की केंद्रीय मुख्यालय द्वारा प्रदत्त निश्चित प्रारूप में करना अनिवार्य है।

अन्य संगठनात्मक कार्य –

  • ग्राम-प्रखण्ड-तहसील-वार्ड समिति का निर्माण करना
  • आदर्श हिन्दी ग्राम निर्माण में सहयोग करना।
  • भाषाई स्वच्छता अभियान का विद्यालओं में सचालन करना।
  • समाचार संस्थाओं में समाचार के माध्यम से अभियान का प्रचार-प्रसार करना
  • समय-समय पर मुख्यालय द्वारा निर्देशित सेवाओं को पूर्ण प्रामाणिकता से निभाना।

नियमित स्वाध्याय करना 

स्वाध्यायाद्योगमासीत् योगात् स्वाध्यायमामनेत्।

योगस्वाध्याय सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।।

प्रत्येक हिन्दी योद्धा को दिन में एक बार कम से कम 1 घंटा नियमित स्वाध्याय करें। इससे आपके ज्ञान एवं प्रशिक्षण में नवीनता व दिव्यता निरन्तर बढ़ती रहेगी। प्रशिक्षण एवं स्वाध्याय हेतु हिन्दी के महनीय साहित्यकारों की पुस्तके, राजभाषा अधिनियम, अनुसूची, के साथ-साथ संस्थान द्वारा प्रदत्त साहित्य  अनिवार्य रूप से पढ़े। इन पुस्तकों के निरन्तर स्वाध्याय से आपके ज्ञान में अत्यन्त वृद्धि और आचरण में शुचिता पवित्रता व सात्विकता बनी रहगी।

हिन्दीग्राम सदस्यता अभियान

हिंदी प्रचार हेतु संस्थान एक साप्ताहिक अख़बार ‘हिन्दी ग्राम’ निकाल रहा है। इस अख़बार का मूल उद्देश्य ही सम्पूर्ण राष्ट्र में हिंदी प्रचार करने के साथ-साथ साहित्य और हिन्दी से जुड़ी गतिविधियों, आयोजनों आदि की सूचना प्रेषित करना, हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु आवश्यकत तत्वों को अख़बार में शामिल करके उसे प्रचारित करना है। संस्थान द्वारा संचालित एक साप्ताहिक अख़बार हिन्दी ग्राम की सदस्यता हेतु जागरूकता भी हिंदी योद्धा कर सकते है।

हिंदी योद्धा गाँव, नगर व प्रान्त में ‘हिन्दी ग्राम’ के सदस्य भी बना सकते है जिससे हम हिन्दी भाषा से जुड़े समाचार और साहित्यिक सामग्री को जन-जन तक पहुंचा सकें। साथ ही हिन्दी योद्धा बतौर हिन्दी पत्रकार भी अखबार के लिए कार्य कर सकते है।

हिन्दी योद्धा का व्यक्तित्व

व्यक्तित्व शब्द अपने आप में बहुत व्यापक अर्थ रखता है जो व्यक्ति के एक-एक कार्य-कलाप व आदत से निर्मित होता है। सामाजिक कार्यकर्त्ता का व्यक्तित्व प्रभावशाली दिव्य और हिन्दी भाषा की समझ रखने वाला और मन-वचन और कर्म से हिन्दी भाषा का समर्थक होना अति आवश्यक  है ताकि उसके व्यक्तित्व से समाज के लोग प्रेरणा लें और सदगुणों को धारण करके उसके जैसा बनने का प्रयास करें। अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के लिए हिन्दी योद्धा निम्न गुणों को धारण करने के लिए दृढ संकल्पित हो-

1-प्रभावशाली सम्बोधन- हिन्दी योद्धा की भाषा-शैली अत्याधिक मृदु होनी चाहिए। यदि आप प्रभावशाली संबोधन करेंगे तो लोगों में आपकी बात को सुनने में रूचि उत्पन्न होगी। किसी भी कार्यकर्त्ता या अन्य व्यक्ति को आदरणीय, श्रद्धामयी माताओं, पिता तुल्य बुजुर्गो, संतों आदि के लिए पूज्य, श्रद्धेय, आदरणीय भाईयो-बहनो आदि प्रयोग करना चाहिए।

2-विषय की सम्पूर्ण व प्रामाणिक जानकारी होना- क्योंकि हिन्दी योद्धा का मुख्य कार्य लोगों को हिन्दी भाषा से जोड़ना और उसके प्रति प्रेम उत्पन्न करके उसे राष्ट्रभाषा बनाने हेतु आंदोलित करना। अतः हिन्दी योद्धा को भाषा अधिनियम, हिन्दी आंदोलनों की जानकारी, साहित्यकारों से परिचय, महनीय हिन्दी सेवकों के बारे में अध्ययन, भाषा की मानकता और वर्तनी दोषों से मुक्ति के साथ ग्रन्थों का सामान्य परन्तु प्रामाणिक ज्ञान होना आवश्यक है। जिससे कि अपना आत्मविश्वास भी बना रहे और लोगों को हिन्दी भाषा का सही महत्व भी समझ में आ सके।

3-वक्ता व श्रोता का आत्मीय भाव सम्पर्क- किसी भी विषय को भावपूर्वक तरीके से रखें। लोगों के जीवन से विषय को सीधा जोड़कर उनके ह्रदय, मस्तिष्क व भावों से एकाकार होकर अपनी बात कहे। इससे श्रोता आत्मीयता का अनुभव करते हैं और आपके आत्मविश्वास में भी अभिवृद्धि होगी।

4-नेतृत्व– सामाजिक कार्यकर्ता में नेतृत्व का गुण होना आवश्यक है। एक हिन्दी योद्धा को जाति, मजहब आदि की श्रेष्ठता के अहंकार से मुक्त होकर समाज के विभिन्न वर्गों, जाति, मजहब, धर्म, सम्प्रदाय, के लोगों को एक साथ लेकर चलना चाहिए। कार्य की सफलता का श्रेय सभी को देते हुए असफलता या विरोधाभासों के बीच खुद आगे आकर समूह का नेतृत्व करने का सामर्थ्य होना चाहिए।

5-अनचाहे शब्दों से बचना- समूह में अपनी बात रखते हुए हमें अनचाहे शब्दों से बचने का प्रयास करना चाहिये। क्योंकि अनचाहे शब्दों को बार-बार दोहराने से समूह में आपके प्रति गंभीरता कम होती है। जैसे-कहने का मतलब, समझ गये न, जो है न , वाह, अरे, अबे, यार, ओके, अभद्र मजाक न करें आदि।

हिन्दी योद्धा बनने हेतु अनिवार्य अर्हताएँ

  • शिक्षा- कक्षा १० से अधिक पढ़ाई किए हुए हिन्दी प्रेमी
  • संगणक (कम्प्यूटर) पर कार्य करने का अनुभव।
  • सोशल मीडिया पर कार्य करना आता हो।
  • आयु – १८ वर्ष से अधिक

आवश्यक सत्यापित प्रमाणपत्रः- संस्थान से जुड़ने पर हिन्दी योद्धा को अपना आधारकार्ड या मतदान परिचय पत्र की छायाप्रति जमा करानी होगी उसके साथ पासपोर्ट साइज फोटो और शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की फोटो कॉपी हिन्दी योद्धा प्रकल्प में जमा करनी होगी।

भारतीय पत्रकारिता में इंदौर शहर का योगदान

भारतीय पत्रकारिता में इंदौर शहर का योगदान

डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’

जब धरती के गहन, गंभीर और रत्नगर्भा होने के प्रमाण को सत्यापित किया जाएगा और उसमें जब भी मालवा या कहें इंदौर का जिक्र आएगा निश्चित तौर पर यह शहर अपने सौंदर्य और ज्ञान के तेज से बखूबी स्वयं को साबित करेगा। हिंदी या कहें अन्य भाषाओँ में इंदौर के पत्रकार और साहित्यकारों का एक अलग ही स्थान है। जिस शहर को मध्यप्रांत की पत्रकारिता का केंद्र या कहें नर्सरी ही कहा जाता हो वह शहर का बाशिंदा होना भी अपने आप में गर्वित होने का कारक है।

देश में स्वच्छता में तीसरी बार प्रथम पायदान पर रहना जिस तरह से गौरवान्वित करने का कारण है तो वही यहाँ के पत्रकारों को भी अपने पूर्वजों या समकालीन पत्रकारों के कारण गौरव की अनुभूति होती है। नईदुनिया जैसे अख़बार ने इस शहर को समाचारों की निष्पक्षता और भाषा की शुद्धता का पाठ पढ़ाया तो वही इंदौर से प्रकाशित वीणा साहित्यिक पत्रकारिता के अपने 75 वर्ष पूर्ण करके एक कीर्तिमान रच रही है। यहाँ वेब पत्रकारिता के प्रथम पोर्टल ‘वेबदुनिया’ ने देश को एक दिशा दी है और साथ ही नवाचार का सन्देश भी। फिल्म, खेल, और साहित्य पत्रकारिता का क्षेत्र भी इंदौर से रोशन रहा है। इंदौर का भारतीय पत्रकारिता में योगदान शहर को ताउम्र अमर कर गया है। जब-जब भी भारतीय पत्रकारिता की बात होगी या इतिहास लिखा जाएगा तब-तब बिना इंदौर के विवरण के वह अधूरा ही माना जाएगा। इंदौर की पत्रकारिता जिन सितारों से रोशन है उनके योगदान का जिक्र करना भी गौरव का महोत्सव मनाना है। इसी सन्दर्भ में कई मूर्धन्य पत्रकार, संपादक है जिनका वर्णन आवश्यक है जैसे –

राहुल बारपुते:  बाबा के नाम से मशहूर शख्सियत राहुल बारपुते जी का योगदान हिंदी पत्रकारिता में अखंड है। हिंदी पत्रकारिता में शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा जिसने राहुल बारपुते का नाम नहीं सुना होगा। पत्रकारिता के युग निर्माता बारपुते जी एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे दिग्गजों को तराशा है।  बाबा के नाम से मशहुर बारपुतेजी ने नईदुनिया रूपी वटवृक्ष के नीचे धूनी रमाते हुए पत्रकारिता जगत को रत्नों से लाद दिया। यह संस्था कब अखबार से विश्वविद्यालय बन गया और बाबा कुलपति बनगए ये उन्होंने भी पता नहीं चला। लोग नईदुनिया पत्रकारिता सीखने आते और बाबा से सीखकर अन्य अखबारों को समृद्ध करने चले जाते। राहुल बारपुते हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा हैं। उनके संपादकत्व में इंदौर की ‘ नईदुनिया ‘ हिंदी पत्रकारिता की ऐसी नर्सरी बनी, जिसकी जड़ें भाषाई और सामाजिक सरोकारों से ऊर्जा पाती थीं।

राजेंद्र माथुर: स्वतंत्र भारत में हिन्दी पत्रकारिता को स्थापित करने वाले स्तम्भ के रूप में राजेन्द्र माथुर जी का नाम अग्रणी है जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दी और पत्रकारिता के लिये समर्पित कर दिया। आपका जन्म 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश के धार जिले की बदनावर तहसील में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा धार, मंदसौर एवं उज्जैन में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे इंदौर आए जहां उन्होंने अपने पत्रकार जीवन के महत्वपूर्ण समय को जिया। इंदौर के पास बदनावर में जन्में और इंदौर को कर्मस्थली बना कर मालवा अंचल के इस प्रतिभावान पत्रकार ने यह प्रमाणित कर दिया कि ऊंचाई प्राप्त करने के लिये महानगर में पैदा होना आवश्यक नहीं है। इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया से अपनी पत्रकारिता यात्रा आरंभ करने वाले श्री माथुर हिन्दी राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स के सम्पादक बने। आरंभ से अपनी आखिरी सांस तक ठेठ हिन्दी पत्रकार का चोला पहने रहे।

प्रभाष जोशी: हिन्दी पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक आदरणीय प्रभाष जोशी जी का जन्म  इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा में हुआ था। उनके परिवार में उनकी पत्नी उषा, माँ लीलाबाई, दो बेटे संदीप और सोपान तथा एक बेटी पुत्री सोनल है। उनके पुत्र सोपान जोशी, डाउन टू अर्थ नामक पर्यावरण विषयक अंग्रेजी पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक हैं। प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे, जो गाँव, शहर, जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था थे। वे राजनीति तथा क्रिकेट पत्रकारिता के विशेषज्ञ भी माने जाते थे। दिल का दौरा पड़ने के कारण गुरुवार, ५ नवम्बर २००९ मध्यरात्रि के आसपास गाजियाबाद की वसुंधरा कॉलोनी स्थित उनके निवास पर उनकी मृत्यु हो गई।

डॉ प्रभाकर माचवे:  आपका जन्म तो ग्वालियर में हुआ किन्तु शिक्षा इंदौर में और आगरा में हुई। इन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. एवं साहित्य वाचस्पति की उपाधियां प्राप्त कीं। ये मजदूर संघ, आकाशवाणी, साहित्य आकदमी, भारतीय भाषा परिषद् आदि से सम्बध्द रहे। देश और विदेश में अध्यापन किया। इनके कविता-संग्रह हैं : ‘स्वप्न भंग, ‘अनुक्षण, ‘तेल की पकौडियां तथा ‘विश्वकर्मा आदि। इन्होंने उपन्यास, निबंध, समालोचना, अनुवाद आदि मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी में 100 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा उ.प्र. हिन्दी संस्थान का सम्मान प्राप्त हुआ है। भारतीय साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता को भी सुशोभित करने में आपका नाम गौरव से लिया जाता है।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक: भारत के सुप्रसिद्ध लेखक, पत्रकार और हिंदी सेवी होने के साथ-साथ एक स्वप्न दृष्टा के रूप में वैदिक जी प्रतिष्ठित है। हिन्दी को भारत और वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।

अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।

वेद प्रताप वैदिक का जन्म 30 दिसम्बर 1944 को इंदौर में हुआ। वे सदैव प्रथम श्रेणी के छात्र रहे। दर्शन और राजनीति उनके मुख्य विषय थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी करने के पश्चात् कुछ समय दिल्ली में राजनीति शास्त्र का अध्यापन भी किया।उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। इसके पूर्व वे नवभारत टाइम्स में सम्पादक भी रहे। उस समय नवभारत टाइम्स सर्वाधिक पढा जाने वाले हिन्दी अखबार था। इस समय वे भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा मातृभाषा उन्नयन संस्थान के संरक्षक भी हैं।

विमल झांझरी: बा साहब व नरेश के नाम से प्रसिद्द १ नवंबर 1924 को इंदौर में जन्में विमल झांझरी जी इंदौर की पत्रकारिता का अभिन्न अंग है जिन्होंने देश भर में विभिन्न भाषाओँ में पत्रकारिता कर के इंदौर को सदा ही मान दिलवाया है। आपकी शिक्षा-दीक्षा 1941 में मेट्रिक (त्रिलोकचन्द जैन हाईस्कूल से, इंदौर) 1944 में बी. काम. (आगरा विश्वविद्यालय से)1946 में एल. एल. बी.(आगरा विश्वविद्यालय से) से हुई है।  सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सहभागी होने के साथ साथ आपने पत्रकारिता शुरू की, तथा पहला संस्थान टाइम्स आफ इंडिया था , वर्ष 2001 तक टाइम्स आफ इंडिया में सेवाएँ दी। अँग्रेज़ी , हिन्दी, मराठी, गुजराती भाषाओं में आपने पत्रकारिता कर्म का निर्वहन किया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दो वर्ष भूमिगत रहकर ‘प्रजामंडल पत्रिका ‘ का संपादन भी किया। लगभग ६० वर्ष से अधिक की पत्रकारिता के काल में आपने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय सहभागिता की, होलकर राजशाही को ख़त्म करवाने में महती भूमिका अदा की, रतलाम- खंडवा-अकोला रेल लाइन में गेज कंवर्जन  की योजना मंजूर करवाई, महू- इंदौर का टर्मिनल स्टेशन अथक प्रयासों का परिणाम है, इंदौर में माल गोदाम पर छोटा रेलवे स्टेशन बनवाने में आपकी भूमिका सराहनीय रही, इसी के साथ ‘नरेश’ के नाम से आपकी लेखनी ब्रिटिश इंडिया के अख़बारों में भी प्रचलित रही।

शरद जोशी: आपका जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में २१ मई १९३१ को हुआ। कुछ समय तक यह सरकारी नौकरी में रहे, फिर इन्होंने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया। इंदौर में नईदुनिया से स्तम्भकार के रूप में शुरुआत करते हुए आपने बतौर पत्रकार स्वयं को स्थापित भी किया। आरम्भ में कुछ कहानियाँ लिखीं, फिर पूरी तरह व्यंग्य-लेखन ही करने लगे। इन्होंने व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। हिन्दी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने प्रमुख व्यंग्यकारों में शरद जोशी भी एक हैं। इनकी रचनाओं में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण मिलता है। इसी के चलते इंदौर को देश के नक़्शे पर आदरणीय शरद जोशी जी ने गौरवान्वित किया।

श्रवण गर्ग: जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुडकर अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआ़त करने वाले हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार,लेखक और संपादक श्री श्रवण गर्ग जी ने सम्पादकीय प्रभाग को उन्नत बनाने में अहम् भूमिका निभाई है। ४ मई १९४७ को जन्मे श्रवण गर्ग ने देश में हिंदी पत्रकारिता का परचम लहराया है। आपका परिवार राजस्थान से आकर इंदौर में बस गया था और इंदौर में वे वेद प्रताप वैदिक जी के पड़ोसी थे। शुरुआती पढ़ाई इंदौर में करने के बाद श्रवण गर्ग ने इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया, उसके बाद ग्रेजुएशन किया। दिल्ली जाने के बाद भारतीय विद्या भवन से उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और अंग्रेजी पत्रकारिता के कोर्स भी किए और फिर नई दुनिया इंदौर में सम्पादकीय विभाग में कार्य करने लगे। नई दुनिया में रहते हुए उनका चयन इंग्लैंड के थॉमसन फाउंडेशन में तीन महीने के एक पाठ्यक्रम के लिए हुआ।

आलोक मेहता: 07 सितम्बर 1952 ई॰ को उज्जैन (म॰प्र॰) में जन्में आलोक मेहता जी ने एम॰ए॰ आधुनिक इतिहास की डिग्री विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से ली। हिन्दी के पत्रकार पत्रकार होने के साथ ख्यात संपादक भी है। आपने नईदुनिया ,नवभारत टाइम्स पटना, हिंदुस्तान. आउटलुक पत्रिका, नई दुनिया, दिनमान, दैनिक हिन्दुस्तान आदि में सेवायें दी तथा  आपको भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 आदि पुरस्कार भी प्राप्त हुए। आपकी भाषा सहज, सरल सादगी पूर्ण साहित्यिक खड़ीबोली हिन्दी है तथा यथार्थ परक, सरस, वर्णनात्मक, विचारात्मक, चित्रात्मक शैली है।

डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी : 23 जुलाई 1955 को बुरहानपुर, मध्यप्रदेश में जन्में। वहां से इंदौर जिले की महू तहसील के गांव नेऊ गुराड़िया (महू-पातालपानी के बीच) में बचपन बीता । चौथी कक्षा में महू के माहेश्वरी विद्यालय में भर्ती। फिर शासकीय माध्यमिक और हायर सेकेण्डरी स्कूल में। महू के शासकीय कॉलेज से बी.कॉम, फिर एम.कॉम। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से टॉ रेंक पर मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री प्राप्त की। पंचायत और समाज सेवा विभाग में धार में अप अंकेक्षक की नौकरी की उसके बाद फिर श्री राजेन्द्र माथुर के मार्गदर्शन में नईदुनिया में प्रशिक्षु उपसंपादक के तौर पर पत्रकारिता में  शुरुआत की। मुंबई में दि टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उप संपादक के तौर पर भी कार्य किया उसी बाद नवभारत टाइम्स में स्थानांतरित हो गए। देश की पत्रकारिता के मिजाज को बखूबी समझकर टिपण्णी रचने वाले ध्येय पुरुष के रूप में डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी जी कार्यरत है। कई मूर्धन्य सम्पादकों के साथ कार्य करना और इंटरनेटयुगीन वेबदुनिया के आरम्भ और स्थापित करने के लिए भी हिंदुस्तानी जी जाने जाते है।

दीपक चौरसिया: टीवी पत्रकारिता का चर्चित चेहरा दीपक चौरसिया जी का जन्म इंदौर,मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने नयी दिल्ली के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन से पत्रकारिता में डिप्लोमा की डिग्री ली। शिक्षा प्राप्त करने के बाद दीपक आज तक में चले गए। २००३ में उन्होंने सहायक संपादक के तौर पर डीडी न्यूज़ में काम करना शुरुआत किया। जुलाई 2004 में वे आजतक वापस आ गए। आज तक टीवी टुडे नेटवर्क का मुख्य न्यूज़ चैनल है। उन्होंने बाद में स्टार न्यूज़ में शामिल हुए जो बाद में ABP न्यूज़ हो गया। दीपक ने जनवरी २०१३ में मुख्य संपादक के तौर पर इंडिया न्यूज़ में शामिल हुए।

सईद अंसारी: सईद अंसारी भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय एंकर्स में से एक हैं। सईद को लाइव एंकरिंग में दक्षता हासिल है। सईद उन गिने-चुने एंकर्स में से हैं जो राजनीति, खेल, व्यापार सभी तरह की खबरों को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश करते हैं। खबरों की संवेदनशीलता को लेकर सईद की गंभीरता दर्शकों को खबर से जोड़ती है। वहीं एक जुझारू पत्रकार के तौर पर भी इनकी पहचान है। फील्ड रिपोर्टिंग हो या एंकरिंग या फिर डेस्क वर्क, हर जगह इन्होंने अपना परचम लहराया है।

सईद अंसारी को देशभर की कई संस्थाओं ने प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार प्रदान किए हैं। सईद को ENBA का सर्वश्रेष्ठ एंकर अवॉर्ड, BCS रत्न बेस्ट एंकर अवॉर्ड, नारद पुरस्कार जैसे तमाम अवॉर्ड मिल चुके हैं। सईद के नाम एक ऐसा कारनामा भी है जो आजतक कोई भी एंकर नहीं कर पाया, सईद ने लगातार 18 घंटे बिना ब्रेक के लाइव एंकरिंग कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है, जिसे लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है।

सईद अंसारी रेडियो जॉकी रहे हैं, उन्होंने सैकड़ों डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाईं। लिखने-पढ़ने के शौकीन सईद साहित्य प्रेमी हैं। इंडिया टुडे पत्रिका और देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सईद के लेख छपते रहते हैं। सईद की विशेषता पुस्तक समीक्षा करना है। कई सौ पुस्तकों की सईद अंसारी समीक्षा कर चुके हैं और यह सिलसिला लगातार जारी है। देशभर के विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थाओं, विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सईद अंसारी को मीडिया विशेषज्ञ और वक्ता के रूप में आमंत्रित किया जाता है। सईद ने मास कम्यूनिकेशन में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के अलावा पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है. सईद ने मास मीडिया और क्रिएटिव राइटिंग में भी दो साल का डिप्लोमा किया है।

 

डॉ अर्पण जैन ‘अविचल

पत्रकार एवं स्तंभकार

संपर्क: 09406653005

अणुडाकarpan455@gmail.com

अंतरताना:www.arpanjain.com

[लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान,भाषा समन्वयआदि का संचालन कर रहे हैं ] 

वह बिनती लोहा…. इंदौर के पथ पर

वह बीनती लोहा…. इंदौर के पथ पर

डॉ अर्पण  जैन ‘अविचल’

भरी दुपहरी में सूर्य के ताप को सहती, जिसके तन पर कपड़े भी मजबूरी ने फाड़ रखे हो, चेहरे की झुर्रियाँ उम्र की ढलान की ओर साफ तौर पर इशारा कर रही है, जिम्मेदारियों का बोझ उठाते-उठाते थके हुए कंधे जो पति के आवश्यकता के समय साथ छोड़ कर गौलोक की शरण लेना जता रहे हो, गंदी, मैली-कुचैली साड़ी केवल इसलिए पहनी हो क्योंकि एक ही साड़ी का अन्य विकल्प घर में नहीं होना है, बालों की लटों में जमी धूल समय के साधन और अपने गुरु ‘कर्म’ की व्यवस्था की सूचक बन रही हो, जो यह बताती है कि हर पल जिसका धूल से ही वास्ता है, पर सिर ढका होने से समाज की उन व्यवस्थाओं का भी निर्वाहन माना जा रहा है जिसमें पुरुष के सामने उघाड़े सिर न जाने की रवायत शामिल है। परंपराओं और समाज के तयशुदा खाकों में बंधी यह एक तस्वीर ही नहीं बल्कि कई सपनों और हकीकत के बीच की एक रेखा बनाती समग्र को अपने अंदर समेट कर इंदौर की जमीन पर महाराष्ट्र से आकर अपनी जमीन तलाश में अपनी उम्र गुजार देने का नाम है कमला बाई…..।

बात करने से पहले तो हिचकिचाती पर फिर कमला बाई बताती है कि वे मूलत: महाराष्ट्र के बुलढाना के पास की रहने वाली है और लगभग 82 वर्ष उम्र बताती है। सालों पहले पति और परिवार के साथ इंदूर (जिसे आज हम इंदौर के नाम से जानते है) की तरफ आई कमला बाई मालवी और मराठी सभ्यता का अनूठा मिश्रण बनकर अपनी बची हुई जिन्दगी को अलहदा मस्तानेपन के साथ जी रही है। न केवल जी रही है बल्कि व्यवस्थाओं के खिलाफ खड़ी अट्टालिका है।

इंदौर के ग्वालटोली इलाके के गैरेजों पर कचरे में एक बड़े चुम्बक के सहारे लोहा बीन कर उस कबाड़ को बेच कर लगभग 70-80 रु प्रतिदिन कमाकर अपना खाना चौका चला लेती है कमला बाई । वह चुम्बक भी कमलाबाई के संघर्ष का गवाह भी है, और देखा जाये तो वही चुम्बक ही संतान की भांति कमलाबाई के जीवन निर्वहन का सहारा भी है।
लगभग 70-80 रुपयें में दोनों समय केवल खुद का भोजन बना कर एक झोपड़े में गुजारा करने के बाद भी ‘भीख मांगना’ जैसी अघोषित ‘व्यवस्था’ का सहारा न लेने वाली कमलाबाई अपने आप में स्वालंबन और स्वाभिमानी होने का अदम्य परिचय है। समाज की निर्वासित व्यवस्थाओं के बीच अधर में लटकती शक्ति की आभा जिसके ह्रदय में इन व्यवस्थाओं के प्रति धधकता शोला तो है पर महलों में बैठ समर भवानी देखने वालों के मुँह पर तमाचा भी है।

मार…. मार… इसका अपराध है कचरा बीनना

इसी बीच इंदौर की सामंतवादी व्यवस्था के रहनुमा जो शहर की व्यवस्था में लगे कर्मचारी न हो कर स्वयं को शहर का राजा मानते हो, उन्होंने चिमनबाग में कचरा बीनने वालों को पकड़ा और थप्पड़ भी मारे,
अहो! क्या यह इंदौर है जहाँ अपनी खीज या नाकामी को छुपाने के लिए निहत्थे और निरीह लोगों पर अपना शक्ति प्रदर्शन किया जाता हो?
ये टिड्डीदल किस समाज का निर्माण कर रहा है? ये भी नहीं जानते कि जिस ‘मार…. मार……’ का नभभेदी जयकारा लगा रहे हो, उसके लिए पहले व्यवस्थाओं का निर्माण तो किया होता। वाह रे निखट्टुओं, किस बुते पर जवान मर्द बनने कर दम्भ भरते हो। इन टिड्डीदलों के खिलाफ हुँकार भी भरना होगा और फिर इनके विरुद्ध तो गौरा जैसे योद्धाओं के कबंध भी लड़ जाएंगे।
अपनी नाकामियों को कचरा बीनने वाले, बच्चों, बुजुर्गो, निरीह लोगो पर हाथ उठा कर बल प्रयोग कर रहे हो? औकात है तो शहर के बड़े गुण्डों कम राजनेताओं के मोहल्ले में भी जा कर कुछ बोल कर भी दिखाओं, वह हो रही कानून की धुनाई पर आवाज तो उठाओ, अपना अधिकारीपना थोड़ा तो दिखाओ.. तब तो देखे तुम्हारी मर्दानगी…

डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’

पत्रकार एवं स्तंभकार

संपर्क०७०६७४५५४५५

अणुडाकarpan455@gmail.com

अंतरताना:www.arpanjain.com

[लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान,भाषासमन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं ]

 

सूतक लग चुका है… सनद रहें

सूतक लग चुका है…. सनद रहें

–डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’

चुनावी मौसम खुमार पर आया, शहर के व्यस्ततम क्षेत्र राजवाड़े से माँ अहिल्या की प्रतिमा पर पहले बम के संदेह में जाँच करवाने के बाद भाजपा के मुखिया अमित शाह ने अपने चुनावी अभियान के तहत सड़क मार्ग से जनसंपर्क अभियान का प्रारंभ कर दिया ।
व्यवस्था में खुमार आया ही था कि खबरें चलने लगी… चुनाव की तारीख घोषित और आज से सूतक यानि आचार संहिता लागू…
सूतक के घोषित होते ही हल्ला बोल शुरु हो गया… वैसे भी 250 से 300 रुपये की मजदूरी वाले झण्डे उठाने के लिए लाए तो गए… पर यकीनन सामने कमजोर विपक्ष होने से सब गौण या कहें मौन हो गया।
भीड़ तन्त्र भी टिकट मांगने वालों का शक्ति प्रदर्शन ही रहा… न जाने क्यों राजनीति की दिशा में धनकुबेरों का कब्जा हो गया…
हालांकि रैली तो होमी दाजी के समय भी हुई थी… और राजवाड़े के विक्रेताओं का भी अपना दौर रहा… भला हो इंदौरी सफेद शेर का वर्ना तब ही राजवाड़े की रजिस्ट्री हो जाती… और हाथ मलते भिया…
बहरहाल हम तो बात कर रहें है सूतक यानी आचार की शासकीय संहिता की… विचार जहाँ तमाशाबीन है और शुचिता का गला घोटा जा चुका है…
शाम ढलते ही श्रीनगर कांकड़ में लगे बैनर हटाए जाने लगे… वैसे मामला तो आपसी विवाद का था पर रंग तो सूतक का चड़ा दिया…
खैर…. सूतक के राजवंश को मौका मिल गया अपनी दादागिरी दिखाने का…. और दिखाएं भी क्यों नहीं… जब जनप्रतिनिधि किसी को जानते ही नहीं और अपनी नाकामी को छुपाने के लिए शहर में नया आया बताने से भी गुरेज कहाँ करते है… और अपने गंदे धन्धे पर गला भी कर्मचारी का फँसा देते है और पिसती तो बैचारी जनता ही है….
सूतक की महामाया का दौर है, सूतक के नाम पर पूर्व में करवाएं गए कार्यों का भुगतान भी लंबित हो सकता है और अटक सकती है तनख्वाह भी…. क्योंकि अपने ही बादशाह और अपने वजीर है…
नज़र तो केवल जनता ही नहीं आती… भोजन, भण्डारे, यात्रा, सामग्री वितरण सब बंद कर दो भिया…. वर्ना सूतक तो ठहरा सूतक……

कमजोर विपक्ष का फायदा मिलेगा, पर फिर भी एक अदद दरकार रहेगी शुचिता की… वर्ना भिया तो ठहरे सनकी… न जाने कब निर्दलीय को जीता दे…

*सूतक के मजे लीजिए… दे दनादन दे…..*
*सूतक तो लग गया है… सनद रहें….*

*डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’*
खबर हलचल न्यूज, इंदौर
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मातृभाषा.कॉम | matrubhashaa.com के बारे में

मातृभाषा.कॉम | matrubhashaa.com

मातृभाषा.कॉम के बारे में

मातृभाषा.कॉम

मातृभाषा.कॉम हिन्दी के प्रचार और प्रसार हेतु एक अंतरताना (वेबसाइट) है जिसका उद्देश्य है हिन्दी के नवोदित और स्थापित रचनाकारों की रचनाओं को सहेज कर लोगों तक ऑनलाइन उपलब्ध कराना, जिससे हिंदी के प्रचार के साथ-साथ रचनाकारों के लेखन से जनसामान्य परिचित हो सके। पटल पर लगभग १२०० से ज़्यादा रचनाकारों की ५००० से ज्यादा रचनाएँ उपलब्ध हैं। अंतरताने पर उपलब्ध समस्त लेखन यूनिकोड में होने से मातृभाषा.कॉम पर उपलब्ध सामग्री को बिना किसी विशेष सॉफ्टवेयर/फ़ॉन्ट के पढ़ा जा सकता है। इस वेबसाइट का सबसे विशिष्ट पहलू ये है कि यह अंतरताना हिन्दी साहित्य के अंकरूपण के साथ-साथ हिन्दी भाषा के विस्तार हेतु भी प्रयासरत है। मातृभाषा.कॉम वेबसाइट को अधिक से अधिक फैलाने के लिए, संस्थान द्वारा नई तकनीक का उपयोग करके डेस्कटॉप और लैपटॉप कंप्यूटर के साथ साथ टैबलेट और मोबाइल फ़ोन पर एप्स के माध्यम से साहित्य उपलब्ध कराया जा रहा है।

इतिहास व विकास

मातृभाषा.कॉम की स्थापना ११ नवम्बर २०१६ को डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ द्वारा की गई थी। अंतरताने को तैयार करने और स्थापित करने के पीछे डॉ जैन का एक मात्र यही उद्देश्य रहा कि हिन्दी साहित्य जगत से जनता को सुगमता से जोड़ते हुए भाषा के प्रचार -प्रसार हेतु एक प्रकल्प स्थापित करना जिसमें हिन्दी के नवोदित एवं स्थापित रचनाकारों को मंच उपलब्ध करवाने के साथ-साथ हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने का लक्ष्य निहित है। भारत में मातृभाषा हिन्दी के रचनाकारों की बहुत लंबी सूची है, किन्तु समस्या यह है कि उन रचनाओं को सहेजकर एक ही स्थान पर पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने में असफलता मिलती है। इस दिशा में ‘मातृभाषा.कॉम‘ ने पहल की है,इस पटल के माध्यम से हिन्दी के प्राथमिक ककहरा से लेकर अन्य विधाओं का परिचय करवाते हुए साहित्य को समृद्ध बनाना है। स्वयं सेवा के माध्यम से सम्पादकीय विभाग बनाया गया जो नवांकुर और स्थापित रचनाकारों का सृजन पाठकों तक पहुंचा रहा है। अंतरजाल की सह संस्थापिका डॉ प्रीति सुराना है जो साहित्य प्रकल्प का संचालन करती है।

३१ दिसंबर २०१६ तक पटल के प्रारंभिक दौर में ५० रचनाकार जुड़ें। इसके बाद पटल के माध्यम से हिंदी में हस्ताक्षर करने के बारे में जागरूकता शुरू की गई, जिसे ‘हस्ताक्षर बदलों अभियान’ नाम दिया गया। स्थापना का एक वर्ष पूरा होते-होते मातृभाषा.कॉम में ८०० से अधिक रचनाकारओं की २५०० से ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित हुई है।

मातृभाषा.कॉम पर हिन्दी साहित्य की विधाओं जैसे साहित्य, काव्यभाषा, आलोचना, संस्मरण, यात्रा, लघुकथा, उपन्यास, व्यंग्य, पुस्तक समीक्षा, साक्षात्कार, हायकू आदि के साथ-साथ वैश्विक चिंतन, राष्ट्रीय एवं समसामयिक मुद्दों पर टिप्पणियाँ, अर्थ, फिल्म, विधि, खेल, स्वास्थ्य,धर्म-दर्शन, मीडिया,आधी आबादी आदि विषयों पर भी सामग्री संयोजित है।

वर्तमान में अंतरजाल पर १२०० से अधिक रचनाकारों का लेखन उपलब्ध है जिसमें भारत के प्रसिद्द रचनाकारों जैसे डॉ.वेद प्रताप वैदिक, डॉ.दिविक रमेश, राजकुमार कुम्भज, प्रभु जोशी जी, डॉ.प्रकाश हिन्दुस्तानी, डॉ मोहसिन खान, मधुदीप गुप्ता, सहित भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव, फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा सहित कई नाम हैं। और भारत के २९ राज्यों के रचनाकार जुड़े है। इसी कारण से मातृभाषा.कॉम वर्तमान में संचालित समस्त अन्तरतानों में सर्वाधिक प्रचलित और सुव्यवस्थित स्रोतो में से एक है।

मातृभाषा.कॉम‘ का उद्देश्य

  1. ‘मातृभाषा.कॉम’ काउद्देश्यहिंदी साहित्य को विश्व के हर कोने में सुलभ कराना है जिससे विश्व भर में फैले हिंदी प्रेमी अपनी सुविधानुसार इसका रसास्वादन और अध्ययन कर सकें।
  2. हमाराउद्देश्य होगा कि विश्व के हर कोने में हिंदी साहित्य की रचना में संलग्न लेखकों को एक मंच पर लाया जा सके जहाँ वे अपने अनुभवों और रचना प्रतिभा का आदान प्रदान कर सकें और इस प्रकार हिंदी के विकास में सहायक बनें।
  3. हिंदीसाहित्य की लोकप्रियता को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना तथा नए लेखकों की रचनाएँ प्रकाशित कर के उन्हें प्रोत्साहित करना।

मातृभाषा.कॉम की विकास यात्रा

  1. ११नवम्बर २०१६ को आरम्भ हुआ मातृभाषा.कॉम ।
  2. ३१ दिसंबर २०१६ तक ५० रचनाकार जुड़ें ।
  3. २१ फरवरी २०१७ को अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया ।
  4. हिंदीमें हस्ताक्षर करने हेतु आंदोलन का आरम्भ किया ।
  5. ३१ मार्च २०१७ तक १०० से अधिक रचनाकारों को पटल से जोड़ा ।
  6. १४ सितम्बर २०१७ को हिंदी दिवस के दिन हस्ताक्षर हस्ताक्षर बदलो अभियान से १ लाख लोग जुड़े
  7. तब तक २ लाख पाठक मातृभाषा.कॉम से जुड़े ।
  8. २७ अगस्त २०१७ को अंतरा शब्दशक्ति और मातृभाषा.कॉम की सहकार्यता आरम्भ हुई
  9. २८ सितम्बर २०१७ को मातृभाषा.कॉम द्वारा काव्य गोष्ठी आयोजित की गई।
  10. २९ नवम्बर २०१७ को कश्मीर में हस्ताक्षर बदलों अभियान का आरम्भ हुआ ।
  11. ७ दिसम्बर २०१७ को हिन्दीग्राम की नींव रखी गई।
  12. २० दिसंबर २०१७ को हिन्दीग्राम और मातृभाषा.कॉम को योगगुरु स्वामी रामदेव जी का आशीष प्राप्त  हुआ।
  13. १३ जनवरी २०१८ को विश्व पुस्तक मेला-दिल्ली में मातृभाषा.कॉम की सहभागिता रही ।
  14. ३ फरवरी २०१८ को डॉ वेद प्रताप वैदिक के मुख्य आतिथ्य में इंदौर में अंतरा शब्दशक्ति सम्मान  २०१८ आयोजित हुआ जिसमे मातृभाषा.कॉम के प्रथम काव्य संग्रह मातृभाषा.कॉम का विमोचन हुआ।
  15. ८ मार्च २०१८ को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में महिलाओं पर केंद्रित पुस्तक अंतरा  शब्दशक्ति प्रकाशन और वुमन आवाज के सहयोग से विमोचित हुई।
  16. ३१ मई २०१८ को अंतरा शब्दशक्ति प्रकाशन और मातृभाषा के साझा प्रयासों से काव्य संध्या  आयोजित की गई और ४६ किताबों का विमोचन हुआ।
  17. ४ सितम्बर २०१८ को ६६ किताबों का विमोचन और ५५ महिलाओं का सम्मान  किया गया।
  18. पांचलाख से अधिक पाठकों और १२०० से अधिक रचनाकारों का स्नेह मातृभाषा.कॉम को मिला।

उल्लेखनीय गतिविधियाँ/ उपलब्धियाँ/ प्रतिभागिता:

मातृभाषा.कॉम के द्वारा हिंदी रचनाकारों को मंच देने के उद्देश्य से ‘मातृभाषा.कॉम’ साझा संग्रह भी निकाला गया था साथ ही समय समय पर काव्य गोष्ठियां , परिचर्चा भी आयोजित की जाती है। इसी अंतरजाल के माध्यम से लगभग ३ लाख से अधिक लोगों ने प्रतिज्ञा पत्र देकर  हिन्दी में हस्ताक्षर करने की प्रतिज्ञा ली है। वार्षिक रुप से यह संस्था हिन्दी रचनाकारों को प्रोत्साहन स्वरुप सम्मानित भी करती हैं।

पता: एस- २०७, नवीन भवन, इंदौर प्रेस क्लब परिसर,  महात्मा गाँधी मार्ग, इंदौर (म.प्र.) ४५२००१

अणुडाक: matrubhashaa@gmail.com  संपर्क: +91-9406653005 | 9009465259 | 7067455455

वेबसाइट / ब्लॉग: www.matrubhashaa.com

सूचनास्रोत:

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%A8_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8

http://copnews.in/?tag=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%A8-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8

https://www.bhaskar.com/mp/dhamnod/news/MP-MAT-latest-dhamnod-news-022002-1304368-NOR.html

https://www.punjabkesari.in/aapki-kalam-se/news/hindi-anti-shivraj-government-758550

https://www.jagran.com/bihar/supaul-educational-activities-17542240.html

https://www.bhaskar.com/rajasthan/jaipur/news/RAJ-JAI-HMU-MAT-latest-jaipur-news-025002-1063079-NOR.html

स्तरहीन कवि सम्मेलनों से हो रहा हिन्दी की गरिमा पर आघात

स्तरहीन कवि सम्मेलनों से हो रहा हिन्दी की गरिमा पर आघात

डॉ. अर्पण जैन अविचल

कवि सम्मेलनों का समृद्धशाली इतिहास लगभग सन १९२० माना जाता हैं । वो भी जन सामान्य को काव्य गरिमा के आलोक से जोड़ कर देशप्रेम प्रस्तावित करना| चूँकि उस दौर में भारत में जन समूह के एकत्रीकरण के लिए बहाने काम ही हुआ करते थे, जिसमें लोग सहजता से आएं और वहां क्रांति का स्वर फूंका जा सके|  उसके बाद कवि सम्मेलन भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग बन गए। उस मुद्दे के बाद कवि  सम्मेलनों में नौ रसों को शामिल करने की कवायद शुरू हुई| भारत में स्वाधीनता के बाद से ८० के दशक के आरम्भिक दिनों तक कवि सम्मेलनों का ‘स्वर्णिम काल’ कहा जा सकता है। ८० के दशक के उत्तरार्ध से ९० के दशक के अंत तक भारत का युवा बेरोज़गारी जैसी कई समस्याओं में उलझा रहा। इसका प्रभाव कवि-सम्मेलनों पर भी हुआ और भारत का युवा वर्ग इस कला से दूर होता गया। मनोरंजन के नए उपकरण जैसे टेलीविज़न और बाद में इंटरनेट ने सर्कस, जादू के शो और नाटक की ही तरह कवि सम्मेलनों पर भी भारी प्रभाव डाला। कवि सम्मेलन संख्या और गुणवत्ता, दोनों ही दृष्टि से कमज़ोर होते चले गए। श्रोताओं की संख्या में भी भारी गिरावट आई। इसका मुख्य कारण यह था कि विभिन्न समस्याओं से घिरे युवा दोबारा कवि-सम्मेलन की ओर नहीं लौटे। साथ ही उन दिनों भीड़ में जमने वाले उत्कृष्ट कवियों की कमी थी। लेकिन नई सहस्त्राब्दी के आरम्भ होते ही इंटरनेटयुगिन युवा पीढ़ी, जो कि अपना अधिकांश समय इंटरनेट पर गुज़ार देती हैं वह कवि सम्मेलन को पसन्द करने लगी। इसी युग में काव्य को कई कवियों ने सहजता और सरलता से आम जनमानस की भाषा में लिखकर काव्य किताबों से निकल कर मंचो पर सजने लगा |

२००४ से लेकर २०१० तक का काल हिन्दी कवि सम्मेलन का दूसरा स्वर्णिम काल भी कहा जा सकता है। श्रोताओं की तेज़ी से बढती हुई संख्या, गुणवत्ता वाले कवियों का आगमन और सबसे बढ़के, युवाओं का इस कला से वापस जुड़ना इस बात की पुष्टि करता है। पारम्परिक रूप से कवि सम्मेलन सामाजिक कार्यक्रमों, सरकारी कार्यक्रमों, निजी कार्यक्रमों और गिने चुने कार्पोरेट उत्सवों तक सीमित थे। लेकिन इक्कईसवीं शताब्दी के आरम्भ में शैक्षिक संस्थाओं में इसकी बढती संख्या प्रभावित करने वाली है। जिन शैक्षिक संस्थाओं में कवि-सम्मेलन होते हैं, उनमें आई आई टी, आई आई एम, एन आई टी, विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन और अन्य संस्थान शामिल हैं। उपरोक्त सूचनाएं इस बात की तरफ़ इशारा करती है, कि कवि सम्मेलनों का रूप बदल रहा, परन्तु इसी दौर में साहित्यिक शुचिता का वो हश्र भी हुआ की भारत की संस्कृति में एक हवा बाजारवादी और विज्ञापनवादी संस्कृति की भी घुस गई जिसने स्ट्रीक को भोग्य समझा और उसी के साथ चुहल करने को साहित्य का नाम देकर काव्य से परिवारों को तोड़ दिया |इसी दौर में डॉ उर्मिलेश ने लिखा हैं

तुम अगर कवि हो तो मेरा ये निवेदन सुन लो,

खोल कर कान जरा वक्त की धड़कन सुन लो,

तुम और न ये श्रृंगार न लिखो गीतों

तुम न अब प्यार या श्रृंगार लिखो गीतों

वक्त की मांग हैं अंगार लिखों गीतों में

सिर्फ कुंठाओं की अभिव्यक्ति नहीं है कविता

काम क्रीड़ाओं की आसक्ति नहीं है कविता

कविता हर देश की तस्वीर हुआ करती हैं

निहत्थे लोगो की शमशीर हुआ करती हैं…

तुम भी शमशीर या तलवार लिखों गीतों में

वक्त की मांग हैं अंगार लिखों गीतों में

इसी कविता में डॉ. उर्मिलेश कहते हैं कि जवानी को नपुंसक न बनाओं कवियों.. आखिर क्यों आवश्यकता आन पड़ी इस पंक्तियों को लिखने की ?  जरूर मंचों से वाग्देवी की पुत्रियों द्वारा पड़े श्रृंगार पर छींटाकशी ने उनके भी ह्रदय को विदारित किया ही होगा, इसीलिए उन्होंने श्रृंगार विहीन मंच की बात कही होगी, क्योंकि डॉ उर्मिलेश कोई कमजर्फ तो नहीं थे, बल्कि उस दौर के नायक रहें हैं। पहले उसके बोलो पर ग़ज़लों की बहर कही जा सकती थी, अब उन्ही बोलों की इशारा माना जाने लगा है और न जाने क्यों सीमाएं लांघी जाने लगी है। कवि सम्मेलनों के स्तरहीन होने पर अब सूरज को भी युगधर्म सीखने का समय है| कवि कुमार विश्वास की कविता की पंक्तियाँ यही कहती है कि-

तम शाश्वत है, रात अमर है, गिरवी पड़े उजाले बोले,

सूरज को युगधर्म सिखाते, अंधियारों के पाले बोले

चीर-हरण पर मौन साधते,प्रखर मुखों के ताले बोले

बधिरों के हित  रचें युग ऋचा, वाणी के रखवाले बोले

नितांत आवश्यक प्रश्न हैं कि वर्तमान में कवि सम्मेलनों के स्तरहीन होने पर वाणी के रखवाले क्यों खामोश है ? और सबसे पहले तो ये हो क्यों रहा हैं ? उपभोक्तावादी कविसम्मेलनों में लगातार आयोजक और संयोजक मिलकर कविता को धनपशुओं की रखैल बनाने पर आमद हो रहे हैं|वर्तमान में हिन्दी कवि सम्मेलनों में स्तरहीनता होने के पीछे कवि, संयोजक और आयोजको के साथ-साथ हिन्दी के पाठक और श्रोता भी जिम्मेदार हैं| क्योंकि आप ही यदि विरोध नहीं करेंगे तो प्रतिध्वनियों के कोलाहल पर ध्वनियों का मौन हो जाना ही स्वीकृति देने सामान हैं | यहाँ चुप्पी, चीखों का हल नहीं हैं|  स्त्री को भोग्या मानना और उसका उपहास उड़ाने के बाद भी द्विअर्थी संवादों के बहाने सम्पूर्ण नारी जाती को कटघरे में खड़ा करने में जिम्मेदार कुछ एक कवियत्रियाँ भी हैं जो सस्ती लोकप्रिय और ज्यादा काम पाने की लालसा में सरस्वती के मंच को वैश्यालय बनाने से बाज नहीं आ रही हैं |

हिन्दी  भाषा के रचनाकार इतने अभागे नहीं है कि अपने घर की बहन-बेटियों को आयोजकों और संयोजकों को परोसकर अपना घर चलाए , फिर क्यों वे आशा करते है भारत की बेटियों से कि वो स्वयं को परोसे और फिर कवि सम्मलेन से रोजगार और प्रसिद्धि पाएं | मंचों पर शब्दबाणों से कविता के साथ-साथ स्त्री का भी चीर-हरण होता हैं, और सभा में बैठे धृतराष्ट्र मुँह फाड़ -फाड़ कर ठिठोली करते हुए असंख्य दुःशासनों के हौसलों को बढ़ा रहें हैं, इस तरह से तो हिन्दी कवि सम्मेलनों और मुजरों में फर्क ही कहा रह जाएगा |

पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला
घेर ले छाया अमा बन
आज कंजलअश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन

निश्चित तौर पर आ. महादेवी वर्मा जी की कविता की प्रथम पंक्ति में ही समाधान के संग्रह को समाहित कर लिया गया है, इस समस्या का सीधा-सा समाधान हैं, या तो ऐसे कवि सम्मेलनों का बहिष्कार हो जहाँ द्विअर्थी संवादों के सहारे कविता के नाम पर फुहड़ता परोसी जा रही हो, या फिर उसी मंच पर फूहड़ या अभद्र होने वाले दुस्शासन हों तमाचा रसीद किया जाए, क्योंकि आपके भी घर में माँ-बेटी होती है और यदि कोई कवियत्री फुहड़ता परोसने में सहभागी बन रही हो तो हाथ-पकड़ कर मंच से उतरा जाए, क्योंकि मंच सरस्वती का मंदिर है, नगरवधुओं का घर नहीं| यदि देश के ५-१० कवि सम्मेलनों में भी ऐसा हो गया तो निश्चित तौर पर अन्य दलालों को शिक्षा मिल जाएगी| हिन्दी के श्रोताओं को जागना होगा यदि  हम न जागे तो हिन्दी के मंचों से ही हिन्दी की दुर्दशा का स्वर्णिम अध्याय लिखा जाएगा |

डॉ. अर्पण जैनअविचल

पत्रकार एवं स्तंभकार

संपर्क: ०७०६७४५५४५५

अणुडाक: arpan455@gmail.com

अंतरताना:www.arpanjain.com

[ लेखक डॉ. अर्पण जैनअविचलमातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं| ]