भारतीयता के विस्तार का महत्त्वपूर्ण आधार है परिवार

डॉअर्पण जैन ‘अविचल

समाज की सक्रियता और राष्ट्र के निर्माण की प्राथमिक इकाई के तौर पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड में स्वीकार्य चेतना का नाम, सशक्तिकरण का एकाधिकार, सामंजस्य की भूमिका और समन्वय का अनूठा उदाहरण यदि सृष्टि पर कहीं है, तो वह परिवार है। देश, समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार के सशक्त होने से ही राष्ट्र की सशक्तता निर्धारित होती है। परिवार महज़ रिश्ते, नातेदारों, लोगों के रहने या समाज में स्वीकार्य की पहचान मात्र नहीं है, बल्कि यह परिवार रूपी वृक्ष सम्पूर्ण समवसरण में एकता, नेतृत्व, समन्वयता, साक्षात् जीवटता आदि का परिचायक भी है।
परिवार शब्द का प्रथम अक्षर ‘प’ प्रवाह का सूचक है, जिसमें शीर्ष नेतृत्व से अंतिम संतति तक विचारों, संवेदनाओं और भावनाओं का प्रवाह सम्मिलित है। द्वितीय अक्षर ‘र’ रक्षण का प्रतीक है यानी सदस्यों की सुरक्षा, रक्षा, छवि की रक्षा आदि शामिल है। तृतीय अक्षर ‘व’ व्यवस्था का संकेतक है, जिसमें सामंजस्य के साथ सुचारू संचलन हेतु व्यवस्था का निर्माण सम्मिलित है। इसी शब्द का चौथा अक्षर ‘र’ भी राह का संदेश देता है, मुखिया से लेकर संतान तक एक राह का अनुसरण करते हैं, जिसे अनुशासन की संज्ञा दी गई है।
किसी भी ग्राम, नगर, प्रान्त, समाज, राष्ट्र का निर्माण की जीवंतता का परिसूचक परिवार को माना जाता है। व्यक्ति यदि परिवार का संचालन, संयोजन, सम्मेलन, सहअनुगम और सांसारिक तत्व का निर्वहन बख़ूबी कर लेता है, उसमें रहना सीख लेता है, उसके अनुशासन और स्थायित्व को समझ लेता है, वही व्यक्ति देश व समाज के लिए हितकर और उद्देश्य अनुरूप लाभप्रद हो सकता है।
बिना परिवार के निर्वहन के समाज का कोई वजूद ही नहीं है। पौराणिक कथाओं के अनुसार द्रोण जब अपनी बदहाली के दौर से गुज़र रहे थे, तभी उनका पुत्र दूध हेतु नगर में तरस गया था, ऋषि संतानों ने उस अश्वत्थामा को चावल का आटा घोल कर दूध बताकर पिलाया और यह घटना द्रोण की आँखों के सामने हुई। तत्पश्चात द्रोण गाँव-गाँव गाय की भिक्षा माँगने लगे। एक राजा जो द्रोण के मित्र थे, उनसे भी इसी दौरान मदद माँगने गए। उन्होंने भी द्रोण का ख़ूब उपहास उड़ाया।
उस दौरान द्रोण का पुत्र अश्वत्थामा भी उन्हीं के साथ चल रहा था, जिसने यह दृश्य भी देखा। वो अपने अपमान का बदला भी लेना चाहते थे और कार्य पाना भी। जब द्रोण हस्तिनापुर पहुँचे तो महाराज ने उनकी व्यथा सुनी और राजपुत्रों को युद्ध, शस्त्र आदि की शिक्षा देने का काम द्रोण को सौंप दिया। कई वर्षों के बाद जब राजा ने सभी का कार्य देखा तो द्रोण को दक्षिणा में एक राज्य भेंट किया।
द्रोण ने उस राज्य के आधे हिस्से का शासक अपने पुत्र अश्वत्थामा को बना दिया। अश्वत्थामा भी राजपुत्रों के साथ शिक्षा ग्रहण करता है, तो वह भी युद्ध नीति में पारंगत होता गया और अपने राज्य का सुसंचालन करने लगा। इस दौरान घटोत्कच ने युद्ध का आह्वान किया, राक्षक सेना को अकेले अश्वत्थामा ने ही खदेड़ दिया। सूर्य अस्त होते ही अश्वत्थामा ने युद्ध विराम करके उस क्षण घटोत्कच को युद्ध न करने की सलाह दी। जब ऋषियों ने अश्वत्थामा के शौर्य और साहस की ख़ूब बढ़ाई की, तब अश्वत्थामा ने इस बात को स्वीकार किया कि आज जो कुछ भी युद्ध कौशल सीख पाया हूँ, उसके पीछे कारण मेरा परिवार और मेरे पिता हैं। क्योंकि यदि मेरे पिता मेरे दूध पीने की चिंता न करते, तो हम उस राजा से भेंट भी नहीं करते, जिसने पिताजी का अपमान किया था, और अपमान नहीं होता तो सम्भवतः हम युद्ध क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं करते और न ही शौर्य प्रदर्शन का अवसर प्राप्त होता।
यही कड़वा सत्य है कि परिवार में प्रत्येक सदस्य का मान-अपमान, ख़ुशी-दुःख,  सफलता-असफलता- सभी स्थितियों में परिवार एक इकाई बनकर खड़ा रहता है। इसीलिए परिवार की स्वीकार्यता भी है।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में जिन पंच परिवर्तन की बात कर रहा है, उनमें से एक है ‘कुटुंब प्रबोधन’। विषय स्पष्ट है कि कुटुम्ब को सशक्त बनाने के लिए संघ को भी प्रबोधित करने का दायित्व अपने कंधे पर लेना पड़ा। क्योंकि जब कुटुम्ब मज़बूत होगा, तभी तो राष्ट्रधर्म निभाने के लिए रणबांकुरे निकलेंगे। समाज मज़बूत होगा, समाज से ग्राम, नगर, प्रान्त और फिर राष्ट्र मज़बूत होगा। अखिल विश्व की समस्त जागृत शक्तियाँ इस बात से सहमति जताती हैं कि पहले सशक्तता और सुदृढ़ता परिवार में आनी चाहिए।
राष्ट्र के स्तवन में सबलता बढ़ाने के लिए राष्ट्र नायकों के साथ राष्ट्र वासियों के भी अहम योगदान हैं, और इसी योगदान को अधिक सशक्त बनाने के लिए राष्ट्र जागरण के पुनीत कार्य के लिए, समरसता स्थापित करने के लिए प्रत्येक परिवार को सुव्यवस्थित और सशक्त बनाने की भी आवश्यकता है।
प्रेम तत्व की अधिकता और सामंजस्यतावादी विचारधारा ही ये तय करती है कि परिवार अच्छा है या बुरा। वर्तमान समय में जिस तरह से परिवारों का विघटन आरंभ हुआ है, यह भविष्य के लिए अच्छे संकेत भी नहीं हैं। आपसी सौहार्द, समन्वय और एकता ही परिवारों की प्रगति के कारक तत्व हैं। जिन परिवारों में यह गुण विद्यमान है, वहाँ कभी क्लेश , पीड़ा, असफलता प्रवेश ही नहीं करते। इसलिए परिवार को मज़बूत करना है तो सकारात्मक दृष्टि से गुणों का उपयोग और विघटनकारी तत्वों से दूरी आवश्यक है। अन्यथा ढाक के तीन पात।
डॉअर्पण जैन ‘अविचल
पत्रकार एवं लेखक
इंदौर, मध्यप्रदेश

बौद्धिक अपच केवल महाकुम्भ पर क्यों…?

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

अतिबौद्धिकता की बदहज़मी से पीड़ित होकर केवल महाकुम्भ पर शाब्दिक वमन करने वाली एक कूपमण्डूक जमात इस समय देश में बहुत चिंतित गैंग बन चुकी है। मस्तिष्क में हुई रासायनिक उथलपुथल से केवल उन्हें करोड़ों स्नान करने श्रद्धालु, कई वाहन जो जाम में फंसे हैं, या फिर रेलवे स्टेशनों पर संगम जाने को प्रतीक्षित भीड़ ही नज़र आ रही है, शेष विश्व में अन्य धर्मों में जो हुआ वह सबसे अच्छा है।
महाकुम्भ 2025 सनातन आस्था का सबसे बड़ा आयोजन माना जा रहा है। यक़ीनन भगदड़ भी हुई, जनहानि भी हुई, जाम भी लगा, स्टेशनों पर भीड़ भी जमा हुई और यहाँ तक कि अब भी रेलवे या अन्य साधनों से प्रयागराज आवागमन और रहना सरल, सहज और सस्ता नहीं है, बावजूद सनातनियों की आस्था पर कोई बैरिकेड नहीं लगा है। लगातार लाखों लोग प्रयागराज पहुँच रहे हैं, स्नान कर रहे हैं, और महाकुम्भ का भी आनंद ले रहे हैं।
छद्म अतिबौद्धिक लाल सलाम गैंग को केवल अव्यवस्था ही तो दिख रही है, जबकि उम्मीद से 10 गुना लोग पहुँच गए, उसके बाद भी भयानक अव्यवस्था जैसा तो कुछ नज़र नहीं आया।
उस बौद्धिक अजीर्ण से पीड़ित गैंग को हज यात्रा के दौरान मची हुई भगदड़ पर लिखने या बोलने पर मानो साँप सूंघ जाता है। शब्द इतने जम जाते हैं कि मानो आका के विरुद्ध बोलने पर गर्दन पर छुरी दिखती है।
याद करो साल 2015 में हज यात्रा के दौरान मची भगदड़ तो सबसे भयानक थी। इस भगदड़ में हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी। तब क्या मुँह में दही जम गया था?
साल 1990 में मक्का में हज के दौरान भगदड़ मच गई थी। दुष्परिणाम स्वरूप इस भगदड़ में क़रीब 1,400 लोगों की मौत हो गई थी। साल 2006 में भी हज के दौरान भगदड़ मच गई थी। इस भगदड़ में भी हज़ारों लोग बहत्तर हूरों से मिलने चले गए थे।
24 सितम्बर 2015 में तो मक्का के मीना में शैतान को पत्थर मारने के दौरान भगदड़ मच गई थी। इस भगदड़ में हज़ारों लोग बहत्तर हूरो से गले लग गए थे। तब यह (अति) बौद्धिक जमात कहाँ बिल में घुस गई थी!
आका के विरुद्ध एक शब्द न निकलना और सबसे सहिष्णु सनातनियों के लिए विधवा विलाप जारी रखना यह कौन-सी बीमारी है?
जब नाइजीरिया के उके में एक चर्च में भगदड़ हुई और सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई थी, वहीं, लागोस में एक धार्मिक समारोह में भी कई लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा ब्राज़ील और मैक्सिको में बड़े कैथोलिक जुलूसों में भीड़ प्रबंधन से जुड़ी समस्यायें देखी गयी हैं, जिसमें भगदड़ मचती रही है, तब यह रुदाली गैंग कहाँ बिलबिला रही थी?
आरोप-प्रत्यारोप के सभी मानक केवल सनातन धर्मावलंबियों पर और अन्य के समय होंठ सिल जाते हैं। कमाल का दोगलापन है इस बौद्धिकता के नाम पर हलकटपन से सनी गैंग में। जबकि यह हलकट गैंग अन्न तो भारत का खाती है किन्तु तनख्वाह विदेशों में बैठे आकाओं से पाती है। और भारतीयों के प्रति नमक हरामी का पूरा कार्य करके अपने आपको जँचाती है।
वाम के नाम पर काम परोसने वाली यही रुदाली गैंग के विरुद्ध अन्य धर्मों की तरह सनातनियों ने कोई सख़्त कार्यवाही नहीं की, इसी का लाभ उठाकर अपना मुँह सनातनियों की आस्था पर हमले करके चलाती है, अन्यथा नानी-दादी याद आ जाती अब तक तो।
ऐसी विषवमन गैंग का एक सूत्रीय कार्यक्रम केवल सनातन धर्मावलंबियों पर आकर इसलिए भी ठहर जाता है क्योंकि सनातन प्रशांत महासागर की तरह गहरा और उदार है। इस उदारता का नाहक फ़ायदा उठाने वालों के प्रति जिस दिन उदारता छोड़ दी, याद रखना लेने के देने पड़ जाएँगे।
अब आस्था के महोत्सव के समापन का दौर है, छुटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो अब तक का सबसे बड़ा महोत्सव सानंद समापनता की ओर अग्रेषित है। और अब नई तैयारी है सिंहस्थ 2028 की उज्जैन में। प्रशासन मुश्तैद तो है और प्रयागराज से सबक लेकर उज्जैन की व्यवस्थाओं को अधिक सुलभ बनाएगा। पर रुदाली गैंग तब भी आपदा में शाब्दिक वमन का कारण खोजेगी। वह अपना काम करेगी, सनातनी अपना काम करेंगे। अंततः सबक सिखाते हुए आस्था बलवान रहे, यही ध्येय है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
इन्दौर, मध्यप्रदेश

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सावधान! अपने बच्चों को संभाले इन्दौर

ख़बर सुनना, पढ़ना और सोशल मीडिया पर वीडियो देखना पर इस बात को भूल न जाना कि इस समय शहर में दशहत का माहौल है और इस बीच अपने बच्चों की सुरक्षा बेहद आवश्यक है। शहर में दिन-प्रतिदिन बच्चों की चोरी की घटनाएँ बढ़ रही हैं, ऐसे में पुलिस अपना काम तो मुश्तैदी से कर ही रही है पर माता-पिता की एक ग़लती या लापरवाही भी घर के बच्चों के लिए भारी पढ़ सकती है।
निःसंदेह पिछले दो सप्ताह में कई ऐसी वारदातें हुई हैं, पुलिस का कहना तो साफ़ है कि ऐसी कोई गैंग के बारे में कोई सूचना नहीं मिली पर टुकड़े-टुकड़े में हुई कई घटनाओं में आसपास के कैमरे इस बात को क़ैद करने में सफल रहे कि कोई व्यक्ति, महिला या बुज़ुर्ग बच्चों को बहला-फुसला कर अपने साथ ले जा रहा है। कुछ जगह पर बच्चों के साथ कुछ महिलाओं को जनता ने पकड़ा है।
बीते दिनों राउ क्षेत्र में एक महिला को जनता ने बच्चा चोरी करके ले जाते हुए पकड़ा, जीत नगर, बिलावली का मामला भी सामने आया ही है, जिसमें महिला को रंगेहाथों बच्चा चोरी करके ले जाते हुए जनता ने पकड़ा। इसी तरह द्वारका पुरी क्षेत्र में भी बच्चे का अपहरण का मामला हुआ। ऐसा ही खजराना थाना क्षेत्र में भी एक वारदात हुई, बच्चा इन्दौर के पास के एक गाँव में प्राप्त हुआ। ऐसे कई प्रकरण लगातार सामने आ रहे हैं।
ऐसे में माँ-पिता के साथ-साथ मोहल्लेवासियों को भी सचेत रहना होगा, यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति मोहल्ले में, गली में नज़र आए तो तुरंत पूछताछ करें, संदेह करना ग़लत नहीं है। बच्चों को विद्यालय की गाड़ी तक ख़ुद छोड़ने-लेने जाएँ क्योंकि आपकी असावधानी और लापरवाही भी बच्चे के लिए घातक हो सकती है। ये बच्चा चोर गैंग लगातार कई शहरों में वारदातों को अंजाम दे रही है, न केवल इन्दौर बल्कि आसपास के गाँव दराज भी इससे अछूते नहीं हैं। बच्चियों को बेच देना और लड़कों से भीख मंगवाना, अपराध कराना यह सब काम करने में ये बच्चा चोर गैंग अव्वल है। इसलिए सावधानी और सतर्कता ही एकमात्र बचाव है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

कमज़ोर विपक्ष का शिकार इन्दौर की राजनीति

राजनीति में जितना महत्त्व सत्ता का होता है, उतना ही महत्त्व विपक्ष का भी माना जाता है। बल्कि विपक्ष का दायित्व अत्यधिक ही माना जाता है क्योंकि विपक्ष जनता का पक्षधर रहता है। विपक्ष जितना मज़बूत होगा, सत्ता पर उतना अंकुश भी बना रहेगा और जनहित के कार्यों को गति मिलेगी। किन्तु हालात ए इंदौर में विपक्ष की भूमिका बहुत कमज़ोर होती जा रही है। सत्तासीन राजनैतिक दल के 9 विधायक हैं, राज्यसभा और लोकसभा दोनों में इंदौर से सांसद हैं, महापौर भी सत्तासीन दल का है, राज्य सरकार में दो-दो मंत्री हैं और तो और अधिकतम पार्षद भी सत्तादल के हैं। बावजूद इसके शहर बदहाली के बुरे दौर से गुज़र रहा है।

वैसे तो विपक्षी दल के प्रदेश के मुखिया जीतू पटवारी भी इन्दौर से ही हैं परन्तु फिर भी शहर की चिंता न उन्हें कभी सताती है न उनके सिपहसलाहार शहर को याद रखते हैं। भागीरथपुरा दूषित जल काण्ड के दौरान भी पटवारी की चुप्पी और शहर अध्यक्ष चिन्टू चौकसे का कमज़ोर प्रहार भी शहर से विपक्ष की कमज़ोरी को बयाँ कर रहा था।
इस समय राजनीति का गिरता नैतिक स्तर भी जनता को भयाक्रांत कर रहा है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि ‘नेताओं और मंत्रियों को नैतिक स्तर की बड़ी चिंता है। यानी जीवन-स्तर चाहे रसलात को चला जाए, नैतिक स्तर हिमालय के शिखर पर चढ़ा रहना चाहिए।’
शिखर पर दिखना तो सब चाहते हैं पर शिखर के लायक कार्य करने में शहर के विपक्षी नेता फिसड्डी ही साबित हो रहे हैं। न शहर अध्यक्ष और न ही कांग्रेसी टीम कहीं मैदान पर जनता की बात करती नज़र आ रही है। कांग्रेसी प्रवक्ता टीवी और समाचारों में तो दिखना चाहते हैं पर वहीं जनता के साथ खड़े रहने में उनकी कोई रुचि नहीं दिखती। शहर के परिंदों की चिंता हो चाहे ग्रीन लंग्स के प्रति विपक्ष की चिंता इनके अतिरिक्त जनता के मुद्दों पर कहीं भी विपक्ष कोई मज़बूत भूमिका अदा नहीं कर पा रहा है। ऐसे में विपक्ष विहीन शहर सत्ता की मदमस्त गति के आगे पस्त और बेबस नज़र आ रहा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

पब्लिक ट्रांसपोर्ट बन सकता है एक बेहतर विकल्प

शहर अपने अल्हड़ और ज़िंदादिल मिज़ाज के लिए पूरे देशभर में पहचाना जाता है। देवी अहिल्या बाई ने जिस शहर इंदौर पर आधिपत्य किया, आज वही शहर अपनी आदतों से कमज़ोर भी होता नज़र आ रहा है। शहर के बाशिन्दों में अनुशासन के प्रति अपना रुझान नहीं दर्शाया, न केवल नागरिक अनुशासन बल्कि नागरिक कर्त्तव्यों में भी शहर पिछड़ रहा है। रोज़-रोज़ लगता सड़कों पर जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और सड़क सुरक्षा नियमों की रोज़ अनदेखी सैंकड़ों मौत को दावत देती है। ऐसे में पब्लिक ट्रांसपोर्ट एक बेहतर विकल्प के रूप में शहर को गति दे सकता है।
यही नहीं, शहर के लोग भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट के उपभोग के मामले में फिसड्डी ही हैं। यहाँ जितनी जनसंख्या है, उससे अधिक वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन वाहनों को रखने से स्टेटस सिम्बल खड़ा होता है, बल्कि शहरीकरण की सबसे बड़ी समस्या भी इन्हीं वाहनों से उत्पन्न हो रही है।
मेट्रों की धीमी गति के पहले बीआरटीएस और सिटी बस सेवाओं के उपयोग में इन्दौरी अव्वल नहीं रहे। व्यक्तिगत गाड़ी का उपयोग करने से समय और सुरक्षा के साथ-साथ शहर में पार्किंग की भी समस्या खड़ी होती है। ऐसे में सरकारों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए, छोटे-छोटे क्षेत्र तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा पहुँचे, यह जवाबदारी सरकारों की भी है। नागरिकों को इस बात की चिंता होनी चाहिए कि शहर में ज़्यादातर सड़क दुर्घनाओं के चलते पब्लिक ट्रांसपोर्ट, सिटी बस, नगर सेवा जैसे विकल्पों के प्रयोग किए जाएँ।
थोड़ी दूरी पर जाने के लिए वाहन की बजाए पैदल गमन करना चाहिए। इस हेतु शहर की सामाजिक संस्थाओं को भी जागरुकता अभियान चलाकर नागरिकों को जागरुक करना होगा। क्योंकि आज शहर की हालत यातायात के मामले में बेहद खस्ता हो रही है, आम ज़िन्दगी सड़कों पर सुरक्षित नहीं है। यह इन्दौर के नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है कि अपने शहर को सुरक्षित बनाने में सहभागी बनें।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

डर्टी पॉलिटिक्स का शिकार हो रहा ‘इन्दौर’

स्वच्छता की पहचान बना इन्दौर अब डर्टी पॉलिटिक्स की चपेट में है। राजनीतिक खेल, आरोप और साज़िशें कैसे शहर को नुकसान पहुँचा रही हैं-जानिए पूरा सच।

राज की नीति और नीति का राज दोनों के बीच होती अहम की टक्कर कभी लोकतंत्र के लिए लाभदायक नहीं होती। यही मलाल अब प्रदेश की आर्थिक राजधानी और कई मुख्यमंत्रियों के सपनों के शहर इन्दौर को भी हो रहा है। यहाँ राजनीति की टकसाल से अब व्यक्तिगत अहम को बल देते नेताओं ने शहर को अफ़सरशाही की प्रयोगशाला में बदल दिया। और अफ़सर अब मनमर्ज़ी से इस शहर की तासीर को समझे बगैर बग़ैर अपने प्रयोगों से रोज़ सूली पर चढ़ाने में लगे हैं।
अंदरखाने की ख़बर तो यह है कि सत्ताधारी दल के नेताओं और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच की अनबन भी अब खुल कर सामने आ रही है। और इस मनभेद का फ़ायदा वो उठा रहे हैं, जो इन्दौर के कभी अपने नहीं रहे।
बीते दिनों शहर में दूषित और ज़हरीले पानी की सप्लाई से भागीरथपुरा क्षेत्र में पीने का पानी भी दूषित हो गया और 20 से अधिक लोगों की जान चली गईं। मामला राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया, और देशभर में सबसे स्वच्छ शहर की साख पर पलीता लगना शुरू हो गया। काबीना मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की भद्द पिटना शुरू हो गई। मौके की नज़ाकत को समझकर मुख्यमंत्री ने इन्दौर से नियत दूरी रखना शुरू कर दिया। यह दूरी राजनीति प्रेरित और घटना के बाद अपने व्यक्तिगत अहम की तुष्टि को बल देने वाली साबित होने लगी। इसी बीच गणतंत्र दिवस पर झंडावन्दन के लिए मंत्रियों को जिलों के प्रभार दिए, उसमें भी कैलाश विजयवर्गीय को कहीं का प्रभार न देकर यह दिखाया गया कि कहीं कुछ ठीक तो नहीं हैं। इसी के तुरन्त बाद मंत्री विजयवर्गीय ने एक पत्र जारी कर निकटतम मित्र के परिवार में गमी का बहाना बनाकर 8 दिन का अवकाश, सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना दी।
आख़िरकार मंत्री और मुख्यमंत्री के बीच की अनबन अब सार्वजनिक होने लगी है। और इस डर्टी पॉलिटिक्स का खामियाज़ा शहर इन्दौर भुगत रहा है। शहर के फ़ैसलों में मुख्यमंत्री कार्यालय के रोकटोक अब जनता को दिखाई देने लग गई। पार्टी के भीतर की यह अनबन अब शहर की अव्यवस्था में बदल रही है, जो किसी भी तरह इन्दौर हित में नहीं है। इसका खामियाज़ा शायद जनता अपने वोट से भाजपा को भरने पर विवश कर दे।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

हाय पानी! बिगाड़ दी तुमने शहर की फ़िज़ा

एक फ़िल्म के गीत की पंक्तियाँ ‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा’ आज शहर के भगीरथपुरा काण्ड पर सटीक बैठ रहा है। इस पानी ने, जिसका रंग भी दूषित नहीं पर, इस शहर की फ़िज़ा बिगाड़ दी। कई अफ़सरों की सीआर बिगाड़ दी, यही नहीं कई नेताओं का पानी भी उतार दिया। बीते 8 दिनों से अपने सोशल मीडिया को भी अपडेट नहीं कर पा रहे, ऐसे नेताओं का रंग भी उतार दिया। और फिर भी अब तक नगर निगम का अमला इस बात की खोज ही कर रहा है कि आख़िर पाइपलाइन का लीकेज कहाँ से हुआ!

शहर इन्दौर की कुण्डली में न जाने कौन से राहु-केतु बैठ गए, जिनके कारण शहर बीते एक वर्ष से तो चैन की साँस तक नहीं ले पा रहा है। कभी एमवाय में चूहे नवजात बच्चों को कुतर देते हैं तो कभी कोई ट्रक आम जनता पर चढ़ जाता है। कहीं एक्सपायरी दवाएँ मरीज़ों की जान ले लेती हैं। कहीं बसों का अंधाधुंध चलना, कहीं सड़क दुर्घटनाओं में जाती जाने, कहीं मंत्री का मौन तो कहीं जनप्रतिनिधियों की चुप्पी। शहर सच में भगवान भरोसे ही हो गया। फिर अंततः इस ज़हरीले पानी पर शहर का गुस्सा अब तक फूट ही रहा है।
इस ज़हरीले पानी ने 20 से अधिक लोगों की जान ले ली और बेशर्म प्रशासन अब भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि आख़िर कितने लोग अपनी जान दे चुके। माननीय न्यायालय यदि फटकार नहीं लगाता तो शायद 18 लोग भी घोषित नहीं हो पाते, प्रशासन तो 4 पर ही अटका हुआ था।
शहर के कुछ क्षेत्रों का पानी ही दूषित नहीं हुआ, बल्कि शहर की राजनीति ही दूषित होकर अफ़सरशाही के भरोसे चल रही थी। ईश्वर यदि सद्बुद्धि नहीं देगा तो यकीनन यह पानी आगामी चुनाव में सत्तासीन दल के मंसूबे पर पानी फेर देगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

चीख़ती जनता, तड़पती ज़िन्दगी और शहर में मौत का ताण्डव

हिंदी फ़िल्म के गीत की यह पंक्तियाँ ‘तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही, मुझको सज़ा दी प्यार की’, आज इन्दौर के भागीरथपुरा पर हूबहू ठीक बैठ रही है। पार्षद, महापौर, विधायक और सांसद तक को अपने मत का तोहफ़ा देकर जीत दिलवाने वाला क्षेत्र आज बिना किसी ग़लती के मौत की सज़ा पा रहा है तो निकलने वाली आह निश्चित रूप से पीड़ा का स्वर ही होगी।
बीता हुआ साल का आख़िरी सप्ताह शहर के दुर्भाग्य में शामिल हो गया, एक ऐसे अनजाने गुनाह की सज़ा के रूप में भागीरथपुरा के 200 से अधिक लोग अस्पताल में अपनी ज़िंदगी की भीख माँग रहे हैं और 10 से अधिक ज़िन्दगी तो मौत से इश्क़ कर बैठी और उसमें शामिल एक दुधमुंहा 5 महीने का बच्चा भी है, जिसकी माँ ने दूध में पानी इसलिए मिलाया था ताकि बच्चा दूध पचा सके। उस माँ को क्या पता था कि यह पानी ही ज़हर है। अनजाना गुनाह यह कि उन्होंने आँख बंद करके उस राजनैतिक दल को चुना, जिसके रहम ओ करम पर एक अधिकारी 20 साल से इसी शहर की पानी की व्यवस्था में संजीव रूप से तैनात है, एक अधिकारी शिकायतों की फ़ाइलें अपने पास महीनों से दबा कर बैठा, उस क्षेत्र का पार्षद भयावहता के बाद भी झूला झूलने कर फुरसत का समय काट रहा।
इस गंदे पानी ने शहर का पानी ही उतार दिया, प्रदेश सरकार नगर में आती है, मृतकों की जान की क़ीमत 2 लाख रुपए लगा कर निकल जाती है, पर कमाऊ अफ़सरों पर मुँह में दही जमा लेती है। नगर सरकार ‘घण्टा’ बजा रही है।
कभी चुल्लू भर पानी में डूब कर मरने का मुहावरा था, अब इन्दौर के लिए ‘चुल्लू भर भागीरथपुरा का पानी पिला दो’ यह मुहावरा गढ़ दिया। हुक्मरानों से क्या उम्मीद करेगी जनता, जो जनता को साफ़ पानी तक पीने के लिए नहीं दे सके।
किसी फ़िल्म का संवाद था कि ‘जनता तो मरने के लिए ही बनी है’ उसी संवाद को इन्दौर में सही साबित होता देख रहे हैं।
माफ़ी तो जनता को माँगनी चाहिए, जो अपने वोट से तोल दिया ऐसे लोगों को, जिनका पानी ही उतर गया।
शहर में 59 ऐसे अन्य स्थान भी हैं जो भागीरथपुरा बनने की कगार पर हैं, जहाँ के पानी के सेम्पल फैल हो चुके हैं। पर नगर सरकार जागे तब तो, अन्यथा वहाँ भी लोग मरेंगे, तब 2 लाख रुपए का नमक लगा कर इति श्री कर लेंगे।
ऐसे में कैलेंडर नव वर्ष की सूचना इन्दौर की चरमराती और दूषित होती व्यवस्थाओं ने दे दी। जनप्रतिनिधियों की थकी हुई जमात तो बारूद के ढेर पर बैठकर शहर को मौत का मंज़र परोस कर अपनी नींद सो रहे हैं। अब तो शहर के प्रभारी मंत्री को भी सुध लेने का भी नहीं कह सकते, पता नहीं किस तरह फिर शहर के अहित को बलवान कर दे। अब तो ईश्वर ही शेष है, जिनसे न्याय की उम्मीद है और वही एकमात्र सहारा भी है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

अटल जी की स्मृति को नगर निगम ने दिया स्थायी पता : अटल बिहारी मार्ग

देशभर में नाम परिवर्तन की बयार छाई हुई है, कहीं शहरों के नए नामकरण हो रहे हैं तो कहीं-कहीं गाँव, गली और मोहल्लों के नाम बदले जा रहे हैं। कहीं इमारतों के नाम तक बदल दिए, ऐसे में नगर निगम इंदौर ने पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को इंदौर में जीवटता से प्रस्तुत करते हुए महत्त्वपूर्ण आगरा-बॉम्बे मार्ग का नाम बदल कर अटल बिहारी मार्ग कर दिया है।
अटल जी की जन्मशताब्दी के सुअवसर पर इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपनी निष्ठा वाले राजनैतिक दल के पितृपुरुष व भारत के गौरवशाली प्रधानमंत्री के नाम पर एबी रोड़ का नाम परिवर्तन कर शहर को गौरव तो दिया ही, साथ में अपनी पार्टी के आकाओं की नज़र में भी एक बड़ा काम कर दिया है।
अब शहर के जिस मार्ग को अटल जी के नाम पर किया है, उसे शराबखोरी, पब और अन्य अवैधानिक गतिविधियों से भी मुक्त कर अटल जी को श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
श्रद्धेय अटल जी ने जिस सांस्कृतिक निष्ठा का जीवन पर्यन्त अनुपालन किया, उसे ध्यान में रखकर उस मार्ग की सद्गति भी निर्धारित की जाए। यदि उसी मार्ग पर कोई शराबी, चरसी, नशेड़ी पब से निकले और पुलिस की धरपकड़ में आया तो यही लिखा जाएगा कि अटल बिहारी मार्ग पर पकड़ाए नशेड़ी, यह भी नाम के साथ विरोधाभास और कलंकित कृत्य होगा। ऐसे में जनता तो चाहती है कि एबी रोड को पब कल्चर से मुक्ति दिलाई जाए, आपराधिक तत्त्वों की धरपकड़ कर कम से कम उस मार्ग की तमाम शराब दुकानों को हटवाया जाए, ताकि पूर्व प्रधानमंत्री के नाम की गरिमा अनुरूप कार्य हो। संस्कृति और साहित्य का केन्द्र भी उस मार्ग पर बन सकता है। महापौर भार्गव से इस दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर, मध्यप्रदेश

लघुकथा- वायरल बुआ

लघुकथा

वायरल बुआ

“अरे! मुझे बता ये किसकी फ़ोटो सोशल मीडिया पर है?” रॉबिन ने इंटरनेट पर अपने दोस्त सनी को अपने फ़ोन में एक फ़ोटो देखकर कहा।

सन्नी ने कहा- “भाई होगी कोई, पर देख तो कॉफ़ी हाउस में बैठकर खुलेआम अपने बॉयफ्रेंड के साथ मस्ती कर रही है लड़की…।”
रॉबिन गौर से तस्वीर देखने के बाद एकदम चुप था, कुछ बोला नहीं।

“भाई! तू क्यों चुप हो गया इसे देखकर? तू भी देख, नया फ़ोटो है”, सन्नी ने कहा।

“चल छोड़ न सन्नी, हमें क्या…पर किसने अपलोड की होगी यार!”
सन्नी तपाक से बोल गया, “अरे वायरल बम है भाई…. इस समय ट्रेंडिंग हो रही है….. वायरल लड़की है।”

“नहीं भाई! यह फ़ोन हैक करके भी तो किसी की शरारत हो सकती है।”
(रॉबिन बोलते-बोलते चुप हो गया)

सन्नी ने कहा, “अरे यार रॉबिन, बिना फ़ोन से फ़ोटो खींचे कैसे कोई निकाल सकता है! खींचते वक्त तो इनकी बुद्धि होगी ही ना!”
एक लम्बा मौन पसर रहा था रॉबिन और सन्नी के बीच। रॉबिन रुआँसा हो गया।
सन्नी ने धीरे से कहा, “तू जानता है क्या इसे…? नहीं न ! फिर क्यों इतना टेंशन ले रहा है।”

रॉबिन चुपचाप वहाँ से चल दिया, जाते-जाते उसके दिमाग़ में एक ही चीज़ घूम रह थी, ‘सीकर वाली बुआ…. बहुत वायरल हो गई।’

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’