अटल जी की स्मृति को नगर निगम ने दिया स्थायी पता : अटल बिहारी मार्ग

देशभर में नाम परिवर्तन की बयार छाई हुई है, कहीं शहरों के नए नामकरण हो रहे हैं तो कहीं-कहीं गाँव, गली और मोहल्लों के नाम बदले जा रहे हैं। कहीं इमारतों के नाम तक बदल दिए, ऐसे में नगर निगम इंदौर ने पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को इंदौर में जीवटता से प्रस्तुत करते हुए महत्त्वपूर्ण आगरा-बॉम्बे मार्ग का नाम बदल कर अटल बिहारी मार्ग कर दिया है।
अटल जी की जन्मशताब्दी के सुअवसर पर इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपनी निष्ठा वाले राजनैतिक दल के पितृपुरुष व भारत के गौरवशाली प्रधानमंत्री के नाम पर एबी रोड़ का नाम परिवर्तन कर शहर को गौरव तो दिया ही, साथ में अपनी पार्टी के आकाओं की नज़र में भी एक बड़ा काम कर दिया है।
अब शहर के जिस मार्ग को अटल जी के नाम पर किया है, उसे शराबखोरी, पब और अन्य अवैधानिक गतिविधियों से भी मुक्त कर अटल जी को श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
श्रद्धेय अटल जी ने जिस सांस्कृतिक निष्ठा का जीवन पर्यन्त अनुपालन किया, उसे ध्यान में रखकर उस मार्ग की सद्गति भी निर्धारित की जाए। यदि उसी मार्ग पर कोई शराबी, चरसी, नशेड़ी पब से निकले और पुलिस की धरपकड़ में आया तो यही लिखा जाएगा कि अटल बिहारी मार्ग पर पकड़ाए नशेड़ी, यह भी नाम के साथ विरोधाभास और कलंकित कृत्य होगा। ऐसे में जनता तो चाहती है कि एबी रोड को पब कल्चर से मुक्ति दिलाई जाए, आपराधिक तत्त्वों की धरपकड़ कर कम से कम उस मार्ग की तमाम शराब दुकानों को हटवाया जाए, ताकि पूर्व प्रधानमंत्री के नाम की गरिमा अनुरूप कार्य हो। संस्कृति और साहित्य का केन्द्र भी उस मार्ग पर बन सकता है। महापौर भार्गव से इस दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर, मध्यप्रदेश

बुलेट युग में मेट्रो की समस्या से जूझता ‘इन्दौर’

भारतीय राजनीति में अपने स्वर्णिम इतिहास का बखान करता हुआ शहर, जिसने सत्ता को सदैव अपना सहयोग दिया, जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व से प्रदेश को गौरवान्वित किया, सत्ता को इतना बल दिया कि शायद ही कोई शहर दे पाए। वर्तमान में सत्ताधारी राजनैतिक दल को पूरे नौ विधायक, महापौर, सांसद, पार्षद सब चुनकर दिए पर वर्तमान के तमाम जनप्रतिनिधियों से शहर इन्दौर का विकास और समस्याएँ हल होने का नाम नहीं ले रहीं।
एक तरफ़ देश के विकास दर के आँकड़े क़दम-दर-क़दम बढ़ते जा रहे हैं, विकास की अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही हैं, वहीं इन्दौर का ग्राफ़ गिरता नज़र आने लगा। मेट्रो का स्वप्न उस युग में भी कमज़ोर दिखाई दे रहा है, जब दुनिया बुलेट ट्रेन की तरफ़ बढ़ चुकी है। अतिक्रमण, पार्किंग विहीन मेट्रो स्टेशन, शहर की यातायात समस्या, धूल-धुएँ की जद में आता इन्दौर, और फिर अंडरग्राउंड मेट्रो लाइन का संकट शहर के सामने मुँह बाहें खड़ा है।
जनप्रतिनिधि शहर में बढ़ रहे अपराध के लिए चिंतित नज़र नहीं आ रहे, फिर विकास का स्वप्न देखना शहर के लिए तो दूभर ही है।
हालात इतने बदतर होते जा रहे हैं कि अभी शहर का बाशिंदा शहर में नौकरी करना नहीं चाहता, या यूँ कहें कि शहर में नौकरियों का संकट सामने खड़ा हुआ है। ऐसे में युवा शहर छोड़कर अन्य शहरों की ओर पलायन कर रहा है।
मेट्रो तो चलने लगी पर किस मार्ग से, यह सबके सामने है। इसलिए अब जनता की पीड़ा को समझने के लिए जनप्रतिनिधियों को सामूहिक रूप से शहर की चिन्ता करनी चाहिए, क्योंकि इन्दौर ने सदैव सत्ता को सबलता प्रदान की है।
आज कमज़ोर विपक्ष और मनमानी सत्ता से शहर का भाग्य धूल धूसरित हो रहा है। चिंता इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि इन्दौर ने मध्य प्रदेश का आर्थिक भाग्य लिखा है, इन्दौर की विकास दर पर चिंता करके इस समास्याओं से इन्दौर को मुक्त कीजिए, अन्यथा जनता की नाराज़गी फिर मतदान में दिखने लगेगी।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

शहर में फैल रहा ‘ई-रिक्शा’ से अव्यवस्थाओं का महाजाल

लापरवाह और बेपरवाह बनता जा रहा महानगर इन्दौर, इन दिनों ई-रिक्शा के कहर से भी अछूता नहीं है। जहाँ मर्ज़ी ई-रिक्शा रोकी और सवारी बैठाना-उतारना शुरू, जहाँ मर्ज़ी वहाँ पार्किंग। ऐसे में आलम यह है कि शहर की सुचारू बन रही यातायात व्यवस्थाओं में भी यह ई-रिक्शा मुसीबत बनती जा रही हैं।
बीते दिनों तो इन्दौर शहर में ई-रिक्शा की बैटरी फटने से दो लोगों की मौत हो गई। मामला विजय नगर क्षेत्र का है, जिसमें ई-रिक्शा की बैटरी फटने से झुलसी 60 वर्षीय रामकुंवर बाई पति नाथूसिंह के इलाज के दौरान बुधवार सुबह मौत हो गई। इसी हादसे में झुलसी उनकी बेटी पवित्रा की सोमवार को मौत हो गई थी। दोनों का एमवाय अस्पताल में इलाज चल रहा था। ई-रिक्शा चालक भी इस दुर्घटना में झुलसा है, जिसका इलाज चल रहा है। उसके ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला भी दर्ज कर लिया है।
ई-रिक्शा निश्चित रूप से सस्ते और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अच्छा माध्यम हो सकते हैं किन्तु अव्यवस्था और मनमानी के चलते हादसों के कारण भी बनते जा रहे हैं। ऐसे कई मामले हैं जिसमें ई-रिक्शा से यात्रियों की जान जोखिम में डालना, यातायात नियमों का उल्लंघन, और दुर्घटनाएँ शामिल हैं, जैसे कि एक ई-रिक्शा में बहुत ज़्यादा लोगों का बैठना, बैटरी फटने से आग लगना, और अन्य वाहनों से टक्कर। ये घटनाएँ लापरवाही, सुरक्षा नियमों की अनदेखी और कभी-कभी जानबूझकर ख़तरे पैदा करने का परिणाम हैं।
ये बेलगाम ई-रिक्शा संचालक यात्रियों की क्षमता से ज़्यादा लोगों को उसमें बैठा लेते हैं, और इससे यात्रियों की जान जोखिम में डाल देते हैं। ई-रिक्शा का अन्य वाहनों से टकराना और दुर्घटनाओं का कारण बनना भी शामिल है, जिसमें कई मौतें भी हुई हैं।
शहर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना है तो इन ई-रिक्शाओं को नियंत्रित और नियमानुसार संचालित करना होगा, भीड़ वाले क्षेत्र जैसे राजवाड़ा, रीगल, पलासिया चौराहा, मधुमिलन क्षेत्र, विजय नगर, रसोमा चौराहा सहित लालबाग चौराहा, महूनाका, अन्नपूर्णा क्षेत्र इत्यादि में इन ई-रिक्शाओं के कहर से यातायात व्यवस्था भी बिगड़ रही है और यात्रियों की जान का संकट भी खड़ा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा,
इन्दौर

पत्रकारों से क्यों छूट रहा पुस्तकालय या संदर्भ कक्ष?

चौथा खम्बा

लिखने से अधिक पढ़ना चाहिए, यह सनातन सत्य है, जो हर लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति से कहा जाता है, पर क्या आज भी लोग लिखने से अधिक पढ़ने में विश्वास करते हैं? इस प्रश्न के उत्तर को खोजने पर खाली हाथ ही लौटना होगा। कारण साफ़ है, आपाधापी के दौर में पत्रकारिता के लोग अब केवल लिखने पर विवश हैं, भाषाई समृद्धता की ओर न तो पत्रकारिता संस्थान ध्यान देते हैं और न ही पत्रकार।

यही सच है कि मीडिया संस्थानों से पुस्तकालयों ने विदाई लेना शुरू कर दी है, कुछेक इक्का-दुक्का संस्थान ही शेष बचे हैं जहाँ निजी पुस्तकालय जीवित हैं। कुछ मीडिया संस्थानों में पुस्तकालय तो जीवित हैं पर वहाँ पत्रकारों के पास फुरसत नहीं है कि उस पुस्तकालय का कभी उपयोग कर लिया जाए। इन्दौर प्रेस क्लब में पूर्व अध्यक्ष अरविंद तिवारी ने प्रीतमलाल दुआ स्मृति संदर्भ एवं अध्ययन कक्ष का निर्माण करवाया, सैंकड़ों किताबें रखवाईं, वरिष्ठ लाइब्रेरियन एवं पत्रकार कमलेश सेन के माध्यम से दुरुस्तीकरण और संयोजन भी करवाया पर भाग्य अनुसार उस पुस्तकालय में 6 महीने में कुछ पाठक भी ऐसे नहीं आए, जो किसी किताब को पढ़ना चाहते हों अथवा उन्हें पढ़ने के लिए ऐसी किसी पुस्तक की आवश्यकता हो जो पुस्तकालय में नहीं हो और क्लब उसे ख़रीदकर बुलवा सके।
ऐसे कठिन दौर में भी पत्रकारों को अपनी पढ़ने-लिखने की आदत को फिर से जीवित रखना होगा। पहले के समय में जैसे संदर्भों का उपयोग/प्रयोग ख़बरों में किया जाता था, अब वह भी डायनासोर की भांति विलुप्त होता जा रहा है। संदर्भों का अध्ययन करना होगा, तभी हमारी लिखने की शक्ति बढ़ेगी, भाषाई और शाब्दिक संपदा में बढ़ोत्तरी होगी वरना एक दिन यह अच्छी भाषा भी विलुप्त हो जाएगी। इस समय पत्रकारिता के सामने भाषाई सौन्दर्य और हिन्दीनिष्ठ भाषा दो महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं, जो भाषाई अस्तित्व को बचा सकती हैं। ऐसे में यदि हमने पुस्तकालय नहीं बचाए तो पुस्तक संस्कृति मर जाएगी, फिर रोबोट ही लिखेंगे एआई या गूगल के सहारे तथ्यात्मक ख़बरें।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं लेखक, इंदौर

पारंपरिक सराफ़ा बाज़ार बचाना शहर की ज़िम्मेदारी

वर्षों से शहर की पुरातन परम्पराएँ जीवित हैं, उसमें शहर की पहचान भी सम्मिलित है और शहर के खान-पान का ठियों का भी अपना महत्त्व है। उन्हीं पारंपरिक पहचान में शहर के सराफ़ा बाज़ार में रात में लगने वाला खाने-पीने का बाज़ार भी शामिल है। लगभग सौ वर्षों से अधिक समय से यह बाज़ार इस शहर में सजता है।
इंदौर के स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजन पूरे भारत में मशहूर हैं। यहाँ का सराफ़ा बाज़ार का स्‍ट्रीट फ़ूड मार्केट है। यहाँ घूमने आने वाले लोगों को हज़ारों तरह के अलग-अलग व्‍यंजनाें का स्‍वाद चखने का मौका मिलता है। अगर आप शाकाहारी हैं, तो आपके लिए तो यह मार्केट बहुत अच्‍छा है, क्‍योंकि यहाँ पर कुछ भी माँसाहारी नहीं मिलता। स्थानीय सराफ़ा व्यापारियों ने ही इस बाज़ार को प्रोत्साहित किया था, ताकि उनकी दुकानें अंधेरी रात में भी सुरक्षित रहें। किन्तु विगत कुछ सालों से इस बाज़ार में पारंपरिक स्वाद के अलावा विदेशी स्वाद चाइनीज़, इटालियन, मैक्सिकन खाद्य सामग्री की भरमार होने लग गई। साथ ही, कई विकृतियों ने घर करना शुरू कर दिया था। इसी को लेकर स्थानीय सराफ़ा व्यापारियों ने प्रशासन से शिकायतें कीं और परिणाम स्वरूप इस मार्केट से अब उन गैर पारंपरिक खाद्य पदार्थों का विक्रय प्रतिबंधित किया गया है।
बहरहाल, विषय यह भी है कि क्या इंदौर चाहता है कि हम ‘फ़ूड कैपिटल ऑफ़ मध्यप्रदेश’ का अपना तमगा खो दें या फिर अपने पुरातन स्वाद को समाप्त कर दें या फिर उन पारंपरिक व्यंजनों से आने वाली पीढ़ी को वंचित कर दें?
यदि इंदौर यह सब नहीं चाहता है तो फिर इंदौर को प्रशासन के इस निर्णय के साथ खड़ा होना होगा। हमें अपने पुरातन स्वाद को बचाना है तो तटस्थ होना ही होगा। हमें सराफ़ा में होने वाली उच्छंदताओं के विरुद्ध एकजुट होना पड़ेगा, खाद्य सामग्रियों के नाम पर परोसे जाने वाले कचरे का विरोध करके अपने इंदौर के पारंपरिक स्वाद को जीवित रखना होगा, तभी हम देशभर में व्याप्त हमारी पहचान बचा पाएँगे वरना एक दिन यह सब चाइनीज़, इटेलियन, मैक्सिकन और न जाने क्या उटपटांग की भेंट चढ़ जाएगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर

ट्रैफिक प्रहरी अभियान में शामिल होकर डॉ. अर्पण जैन ने जागरूकता में दिया योगदान

सड़क सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी, आदतें बदलने से होगा सुधार

इंदौर। ट्रैफिक पुलिस द्वारा संचालित “ट्रैफिक प्रहरी अभियान” लगातार शहर में सड़क सुरक्षा और यातायात में जनसहभागिता बढ़ाने का कार्य कर रहा है।
इसी कड़ी में डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’, अध्यक्ष-मातृभाषा उन्नयन संस्थान और सामाजिक कार्यकर्ता सौरव गौसर ने अभियान से जुड़कर अपनी सक्रिय सहभागिता दी। डॉ.जैन द्वारा यातायात पुलिस के साथ खड़े होकर वाहन चालकों को सड़क सुरक्षा, नियमों के पालन और जिम्मेदार ड्राइविंग के प्रति जागरूक किया गया। उन्होंने कहा कि “जिस तरह इंदौर ने स्वच्छता में देशभर में सिरमौर बनकर मिसाल कायम की है, उसी तरह यदि नागरिक ट्रैफिक नियमों का जिम्मेदारी से पालन करें, तो हम सभी की सहभागिता से इंदौर यातायात व्यवस्था में भी बेहतर बना सकते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि “अभियान में शामिल होकर मैं स्वयं अनुभव कर रहा हूँ कि यातायात संचालन कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन यदि इंदौरवासियों का सहयोग मिलेगा, तो सड़क हादसों में निश्चित रूप से कमी आएगी और शहर की यातायात व्यवस्था और भी सुगम व सुरक्षित बनेगी।”

एआई के दौर में ज़रूरी है पत्रकारों की तकनीकी दक्षता

चौथा खम्बा

घटना हुई, पॉइंट बना, ब्रेकिंग हुई, इसी बीच वेबसाइट या सोशल मीडिया पर पूरा घटनाक्रम समाज के सामने आ गया, इस तकनीकी दौर में जो तत्परता सोशल मीडिया का उपयोगकर्ता दिखाता है, उससे कहीं अधिक तत्परता ज़िम्मेदार पत्रकार को भी रखनी होगी, अन्यथा उसकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी। और तत्परता के साथ-साथ ख़बरों की पुष्टि भी महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है।
ऐसे तकनीकी दौर में पत्रकारों को नए मीडिया के साथ क़दमताल करना भी आना चाहिए। तमाम अनुभवों के बाद भी जब तकनीक की बात आती है तो पत्रकार पिछड़ते जाते हैं। इस प्रयोजन के लिए पत्रकारों को नए ज़माने के टूल्स के साथ अपना नाता बनाना होगा।
जैसे-जैसे डिजिटल मीडिया अपना विस्तार कर रहा है, वैसे-वैसे पत्रकारों को भी सूचनाओं की पुष्टि, उनका प्रेषण और प्रकाशन भी त्वरित करने की आदत डालनी होगी।
देश के कई संस्थान अपने व्यय पर तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं, और व्यक्ति निजी रूप से भी तकनीक को सीख सकता है।
जैसे एआई और ग्रुक का प्रयोग, ईमेल तकनीक, वॉइस टाइपिंग और वीडियो एडिटिंग के साथ-साथ अब नए टूल्स भी सीखना अनिवार्य होगा। कैसे गूगल का उपयोग कर सकते है,? कैसे ख़बरों के वेरिफ़िकेशन की नई टेक्नीक का इस्तेमाल कर सकते हैं? इन सबके अतिरिक्त प्रत्येक पत्रकार को अब सोशल मीडिया मार्केटिंग और सर्च इंजिन ऑप्टिमाइज़ेशन की जानकारी होना भी ज़रूरी है। अपनी ख़बरों को कैसे वायरल करें? यूट्यूब पर कैसे ख़बरे प्रसारित होती हैं? इन विषयों पर भी गंभीरता के साथ प्रशिक्षित होना आवश्यक होगा।
आने वाले समय में मोबाइल जर्नलिस्म बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रहा है, ऐसे में हर पत्रकार को मोजो सीखना होगा ताकि अपना वजूद स्थापित रख सके, वरना नई तकनीक पुराने तरीकों को धूल धूसरित कर रही है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा, इंदौर

क्या बर्बाद यातायात व्यवस्था का हल है हेलमेट की अनिवार्यता?

शहर में पहले की तरह ही हल्ला मचाया जा रहा है कि सरकार हेलमेट न लगाने वालों को अब फिर से पेट्रोल देना बंद कर रही है। भारतीय नागरिक सुरक्षा अधिनियम 2023 का हवाला लेकर इन्दौरी सरकार ने आदेश कि आगामी 1 अगस्त 2025 से बिना हेलमेट लगाये दो पहिया वाहनों को पेट्रोल नहीं मिलेगा। पेट्रोल पंप की निगरानी की जाएगी, उम्मीद की जा रही है कि इस आदेश के बाद सड़क दुर्घनाएँ कम होंगी।
इस तरह के आदेश पहले भी इन्दौर में आ चुके हैं, कुछ ही दिनों में ऐसे आदेश की धज्जियाँ उड़नी शुरू हो जाती हैं, पहले भी जब यह आदेश आया तो पेट्रोल पंप के कैमरे की निगरानी से थोड़ा दूर खड़ा पम्प कर्मचारी हेलमेट मुहैय्या करवाता है, आप पेट्रोल भरवा कर दूसरी ओर से जैसे निकलेंगे, पम्प का ही दूसरा कर्मचारी आपसे वापस हेलमेट ले लेगा। अब इससे तो हेलमेट की अनिवार्यता की भी धज्जियाँ उड़ गईं और यह आदेश भी नाक़ामयाब हुआ।
इसी तरह, इन्दौर नगरीय सीमा में अस्त-व्यस्त यातायात के चलते सामान्य दो पहिया वाहनों की गति प्रायः 20 किमी से 40 किमी तक ही होती है, ऐसी मध्यम गति में वाहनों की टक्कर संभवतः कम या नगण्य होती है।
स्वच्छतम शहर की मुख्य समस्या सड़क दुर्घटना नहीं बल्कि बिगड़ा हुआ यातायात व्यवस्थाओं का ढर्रा, असुरक्षित सड़क मार्ग, आए दिन लगने वाला सड़क जाम, घटिया गुणवत्ता की सड़कें, जिनमें बारिश में तो कई गड्ढों ने अपना घर बना लिया, पुराने मार्ग पर अतिक्रमण, हॉकर ज़ोन की कमी है, पर नगर सरकार ने इस दिशा से ध्यान हटाने के लिए अपना रूख़ हेलमेट की ओर कर लिया। पिछली बार जब इसी तरह का आदेश लाया गया था, तब भी कोई ख़ास कारगर नहीं हुआ, कुछ ही दिनों में इस आदेश को वापस लिया गया। अब फिर इसे लाकर थोड़ी हेलमेट बनाने वाली कंपनियों को लाभ तो पहुँचाया जाएगा, पर धरातल पर फिर वही ढाक के तीन पात।
बात यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने की हो रही थी, पर नगर सरकार हेलमेट पर ही अटक गई, ऐसे में हिंदी की एक कहावत याद आती है- ‘आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास।’

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
लेखक एवं पत्रकार
इन्दौर, मध्यप्रदेश

डॉ. अर्पण जैन को मिला विशिष्ट हिन्दी सेवी सम्मान 2025

भोपाल। लघुकथा दिवस के अवसर पर लघुकथा शोध केन्द्र समिति द्वारा भोपाल के हिन्दी भवन में शुक्रवार को लघुकथा पर्व 2025 का आयोजन किया गया। इस आयोजन में मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, हिन्दीयोद्धा डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ को हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए ‘विशिष्ट हिन्दी सेवी सम्मान 2025’ से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. देवेंद्र दीपक ने की व सारस्वत अतिथि नई दिल्ली से सुभाष नीरव, डॉ. उमेश कुमार सिंह, शोध केन्द्र निदेशक कान्ता रॉय एवं उपाध्यक्ष घनश्याम मैथिल रहे।

ज्ञात हो कि डॉ. अर्पण जैन हिन्दी सेवी हैं, जिन्होंने अब तक लगभग 30 लाख लोगों के हस्ताक्षर बदलवा दिए हैं। साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 का अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार और जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी एवं वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति द्वारा वर्ष 2023 का अक्षर सम्मान डॉ. अर्पण जैन को प्राप्त हुए हैं।

आयोजन में विभिन्न कृतिकारों एवं साहित्यकारों को भी सम्मानित किया गया।

हिन्दी के सम्मान में, हर भारतीय मैदान में जैसी अलख जगाने वाले का नाम डॉ जैन

कहानी:

अनथक हिन्दी योद्धा डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’ से खास भेंट

हिन्दी के सम्मान में, हर भारतीय मैदान में जैसी अलख जगाने वाले का नाम डॉ जैन

कहानी एक ऐसे व्यक्ति की जो हिन्दी भाषा को भारत में ही सम्मान स्वरुप राष्ट्रभाषा बनाने के लिए संघर्षरत है, जो संगणक विज्ञान अभियंता होने के बावजूद स्थापित पत्रकारिता की उसके बाद भी हिन्दी माँ के प्रति जवाबदेही से कार्य कर रहे है। एक ऐसा शख्स जो हिन्दी को भारत में रोजगार मूलक भाषा बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

 भारत माँ के स्वाभिमान पर जब-जब भी आँच आई है तब-तब धरा पर सपूतों का जन्म हुआ है, ऐसे ही सपूत का जन्म २९ अप्रैल १९८९ शनिवार को मध्यप्रदेश के सेंधवा में पिता सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा की कुक्षी से एक क्रांतिकारी पुत्र का जन्म हुआ जिनका नाम अर्पण रखा गया। अर्पण अपने माता-पिता के दो बच्चों में से सबसे बड़े हैं। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। उनके पिता सुरेश जैन गृह और सड़क निर्माण का कार्य करते है। आपके दादा बाबूलालजी एक राजनैतिक व्यक्तित्व रहे। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की छोटी-सी तहसील कुक्षी में पले बड़े, आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा फिर इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्धयालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही अर्पण जैन ने सॉफ्टवेयर व वेबसाईट का निर्माण शुरू कर दिया था। इसी दौरान सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी भी की। पिता के कारोबार में रूचि न होने और अपनी अलग दुनिया बनाने की इच्छाशक्ति ने अर्पण को तकनिकी योद्धा बनाया।

एक मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले किसी भी शख्स का सपना क्या होता है? यही न कि एक अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद मोटी रकम वाली सम्मानजनक नौकरी मिल जाए। लेकिन अर्पण अपनी इस 9 से 5 वाली और मोटे वेतन वाली नौकरी से संतुष्ट नहीं थे। एक दिन उन्होंने अपने सुविधा क्षेत्र से बाहर निकलने का फैसला किया और अपना खुद का उद्यम शुरू किया। सपने बड़े होने के कारण स्वयं की कंपनी बनाने का ख्वाब पूरा करने में अर्पण जुटे तो सही परन्तु दो माह बिना नौकरी के भी घर पर ही भविष्य की रणनीति बनाने के दौरान सभी बचत ख़त्म कर चुके अर्पण के जेब में मात्र १५० रुपये ही बचे थे। मात्र १५० रुपये लेकर ११ जनवरी २०१० को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत हुई, अर्पण ने फॉरेन ट्रेड में एमबीए किया, तथा पत्रकारिता के शौक के चलते एम.जे. की पढाई भी की है। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’  पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। समाचारों की दुनिया ही उनकी असली दुनिया थी, जिसके लिए उन्होंने सॉफ्टवेयर के व्यापार के साथ ही खबर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की और इसे भारत की सबसे तेज वेब चैनल कंपनियों में से एक बना दिया। सेंस टेक्नॉलजीस और खबर हलचल न्यूज भारत के लगभग 29 राज्यों में २०० से ज़्यादा लोगो के दल के साथ कार्यरत पंजीकृत कंपनी है।

इसी दौरान पत्रकारिता के उन्नयन हेतु कई पत्रकारिता संगठन में कार्य किया जैसे श्रमजीवी पत्रकार परिषद में बतौर महासचिव, इंदौर प्रेस क्लब, सेव जर्नलिस्म संस्थान के सदस्य आदि। इसके बाद पत्रकार संचार परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला। आप राष्ट्रीय मानव अधिकार परिषद महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे।

वर्ष २०१५ में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। विवाह उपरांत भी तन्मयता से पत्रकारिता और भाषा के सौंदर्य को स्थापित करने के लिए श्री जैन सतत संघर्षरत रहे। आपने अपनी कविताओं, आलेखों के माध्यम से भी समाज की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा हैं और आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता के आधार आंचलिक पत्रकारिता और समाज के लिए ज़्यादा लिखा हैं।

अर्पण ने व्यापार के दूसरे क्षेत्रों में भी उत्कृष्ट सफलताएँ प्राप्त की हैं। पत्रकारिता से अपने गहरे सरोकार को दर्शाते हुए उन्होंने भारत के पत्रकारों के लिए पहली सोशल नेटवर्किंग साइट ‘इंडियनरिपोर्टर्स.कॉम (www.IndianReporters.com)’ बनाई, जिसके फलस्वरूप पंजाब, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे भारत के सभी राज्यों के पत्रकार जुड़े हुए हैं। जैन ने कई संस्थाओं के साथ जुड़ कर पत्रकारिता के क्षेत्र में भी और अन्य सामाजिक कार्यों और जनहितार्थ आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है।

समाचारों की दुनिया से जुड़े होने के कारण अर्पण का हिन्दी प्रेम प्रगाड़ होता चला गया, इसी के चलते वर्ष २०१६ में अर्पण ने मातृभाषा.कॉम की शुरुआत की और फिर तब से लेकर आज तक हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रतिबद्ध होकर कार्यरत रहे। इस दौरान भारत के विभिन्न राज्यों में हिन्दी भाषा के महत्व को स्थापित करने के लिए यात्राएँ की, जनमानस को हिन्दी से जोड़ा, और मातृभाषा उन्नयन संस्थान और हिन्दी ग्राम की स्थापना की। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सतत प्रयासरत है, इसी प्रकल्प में योगगुरु और पतंजलि योगपीठ के सूत्रधार स्वामी रामदेव जी का आशीर्वाद मिला। वर्तमान में हिन्दी के गौरव की स्थापना हेतु व हिन्दी भाषा को राजभाषा से राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्षरत डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ भारतभर में इकाइयों का गठन करके आंदोलन का सूत्रपात कर रहे हैं, और वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी है और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. वेद प्रताप वैदिक के संरक्षण में संस्थान देश भर में हस्ताक्षर बदलो अभियान संचालित कर रही हैं। हिन्दी योद्धा, संगणक योद्धा और संवाद सेतु के माध्यम से सम्पूर्ण भारत में हिन्दी का प्रचार प्रयास कर रहे है।

डॉ अर्पण जैन अविचल का ध्येय वाक्य है ‘हिन्दी के सम्मान में, हर भारतीय मैदान में’ इसी को सम्पूर्ण राष्ट्र का समर्थन मिल रहा है। डॉ जैन ‘एक घंटा राष्ट्र को, एक घंटा देह को और एक घंटा हिन्दी को’ जैसा आव्हान भी जनता से कर रहे है, जिसे भरपूर समर्थन मिल रहा है।

डॉ अर्पण जैन अविचल कहते है कि ‘हिन्दी भाषा भारत की सांस्कृतिक अखंडता को मजबूत करने में अग्रणी कारक है, हिन्दी के माध्यम से ही भारत के संस्कार बचे है क्योंकि हमारे राष्ट्र में संस्कार देने दादी-नानी की कहानियां महनीय भूमिका अदा करती है, ऐसे में दादी-नानी की कहानियों की भाषा हिन्दी है, इसलिए हिन्दी युग के निर्माण हेतु हिन्दी का संरक्षण और प्रचार-प्रसार आवश्यक है। तभी भारत के संस्कार बचेंगे और भारत बचेगा वर्ना गुलामी की स्थिति बनेगी।’

हिन्दी भाषा को प्रचारित एवं प्रसारित करने के उद्देश्य से ग्राम, नगर प्रान्त में श्री जैन व्याख्यान, परिचर्चा , गोष्ठियां आदि करते है, जनमानस को हिन्दी का महत्व समझाते हुए उसके राष्ट्रभाषा बनने के कारण बताते है और जनजागृति लाते है। वर्तमान में डॉ अर्पण जैन व मातृभाषा उन्नयन संस्थान की प्रेरणा से  लगभग ४ लाख से अधिक लोगों में प्रामाणिक रूप से अपने हस्ताक्षर हिन्दी में करना प्रारंभ कर दिए है। डॉ अर्पण जैन के हिन्दी आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा डॉ प्रीति सुराना है जिन्हे डॉ जैन अपना प्रेरणा पुंज बताते है। इन्ही के साथ उनके अभिन्न मित्र और उप सैनानी कमलेश कमल जी भी है जो हिन्दी जे मानकीकरण पर कार्य कर रहे है और देश भर में कमल की कलम के माध्यम से हिन्दी को शुद्ध करने की दिशा में प्रयासरत है।

डॉ जैन से जब भी पूछों कि जीवन जीने का उद्देश्य क्या है, तब उनका एक ही जवाब होता है ‘हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में हमारा योगदान दर्शक का नहीं बल्कि कार्यकर्ता का हो, हमें तमाशा देखने वाला न समझा जाए, जब भी याद किया जाए तब ये कहा जाए कि ये लोग घरों में बैठे नहीं थे, इन्होने काम किया है।’

जिन लोगो से आप प्रेरणा पाते है उनकी सूची में शामिल है- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, बाबा नागार्जुन, रामधारी सिंह दिनकर, बाबू विष्णु पाराडकर, गणेशचंद्र विद्धयार्थी, प. दीनदयाल उपाध्याय ( एकात्मवाद के कारण), डॉ. अबुल पॅकिर जेनुलआबदीन अब्दुल कलाम, राजेंद्र माथुर (रज्जु बाबू), राहुल बारपुते, स्वदेशी प्रवर्तक राजीव दीक्षित, धीरू भाई अंबानी( रिलायंस), वारेन बफ़ेट(बर्कले हैथशायर), स्टीव जॉब्स (एपल), डॉ. प्रीति सुराना (अंतरा शब्दशक्ति)।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा ही नहीं वरन जनभाषा बनाना जिसका मूल ध्येय हो ऐसी शख्सियत समाज में सदैव अपने कार्यों से समाज को प्रेरित करती है। और इस जीवन के होने के उद्देश्य को पूरा भी।