हिंदी फ़िल्म के गीत की यह पंक्तियाँ ‘तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही, मुझको सज़ा दी प्यार की’, आज इन्दौर के भागीरथपुरा पर हूबहू ठीक बैठ रही है। पार्षद, महापौर, विधायक और सांसद तक को अपने मत का तोहफ़ा देकर जीत दिलवाने वाला क्षेत्र आज बिना किसी ग़लती के मौत की सज़ा पा रहा है तो निकलने वाली आह निश्चित रूप से पीड़ा का स्वर ही होगी।
बीता हुआ साल का आख़िरी सप्ताह शहर के दुर्भाग्य में शामिल हो गया, एक ऐसे अनजाने गुनाह की सज़ा के रूप में भागीरथपुरा के 200 से अधिक लोग अस्पताल में अपनी ज़िंदगी की भीख माँग रहे हैं और 10 से अधिक ज़िन्दगी तो मौत से इश्क़ कर बैठी और उसमें शामिल एक दुधमुंहा 5 महीने का बच्चा भी है, जिसकी माँ ने दूध में पानी इसलिए मिलाया था ताकि बच्चा दूध पचा सके। उस माँ को क्या पता था कि यह पानी ही ज़हर है। अनजाना गुनाह यह कि उन्होंने आँख बंद करके उस राजनैतिक दल को चुना, जिसके रहम ओ करम पर एक अधिकारी 20 साल से इसी शहर की पानी की व्यवस्था में संजीव रूप से तैनात है, एक अधिकारी शिकायतों की फ़ाइलें अपने पास महीनों से दबा कर बैठा, उस क्षेत्र का पार्षद भयावहता के बाद भी झूला झूलने कर फुरसत का समय काट रहा।
इस गंदे पानी ने शहर का पानी ही उतार दिया, प्रदेश सरकार नगर में आती है, मृतकों की जान की क़ीमत 2 लाख रुपए लगा कर निकल जाती है, पर कमाऊ अफ़सरों पर मुँह में दही जमा लेती है। नगर सरकार ‘घण्टा’ बजा रही है।
कभी चुल्लू भर पानी में डूब कर मरने का मुहावरा था, अब इन्दौर के लिए ‘चुल्लू भर भागीरथपुरा का पानी पिला दो’ यह मुहावरा गढ़ दिया। हुक्मरानों से क्या उम्मीद करेगी जनता, जो जनता को साफ़ पानी तक पीने के लिए नहीं दे सके।
किसी फ़िल्म का संवाद था कि ‘जनता तो मरने के लिए ही बनी है’ उसी संवाद को इन्दौर में सही साबित होता देख रहे हैं।
माफ़ी तो जनता को माँगनी चाहिए, जो अपने वोट से तोल दिया ऐसे लोगों को, जिनका पानी ही उतर गया।
शहर में 59 ऐसे अन्य स्थान भी हैं जो भागीरथपुरा बनने की कगार पर हैं, जहाँ के पानी के सेम्पल फैल हो चुके हैं। पर नगर सरकार जागे तब तो, अन्यथा वहाँ भी लोग मरेंगे, तब 2 लाख रुपए का नमक लगा कर इति श्री कर लेंगे।
ऐसे में कैलेंडर नव वर्ष की सूचना इन्दौर की चरमराती और दूषित होती व्यवस्थाओं ने दे दी। जनप्रतिनिधियों की थकी हुई जमात तो बारूद के ढेर पर बैठकर शहर को मौत का मंज़र परोस कर अपनी नींद सो रहे हैं। अब तो शहर के प्रभारी मंत्री को भी सुध लेने का भी नहीं कह सकते, पता नहीं किस तरह फिर शहर के अहित को बलवान कर दे। अब तो ईश्वर ही शेष है, जिनसे न्याय की उम्मीद है और वही एकमात्र सहारा भी है।
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर
