लघुकथा- वायरल बुआ

लघुकथा

वायरल बुआ

“अरे! मुझे बता ये किसकी फ़ोटो सोशल मीडिया पर है?” रॉबिन ने इंटरनेट पर अपने दोस्त सनी को अपने फ़ोन में एक फ़ोटो देखकर कहा।

सन्नी ने कहा- “भाई होगी कोई, पर देख तो कॉफ़ी हाउस में बैठकर खुलेआम अपने बॉयफ्रेंड के साथ मस्ती कर रही है लड़की…।”
रॉबिन गौर से तस्वीर देखने के बाद एकदम चुप था, कुछ बोला नहीं।

“भाई! तू क्यों चुप हो गया इसे देखकर? तू भी देख, नया फ़ोटो है”, सन्नी ने कहा।

“चल छोड़ न सन्नी, हमें क्या…पर किसने अपलोड की होगी यार!”
सन्नी तपाक से बोल गया, “अरे वायरल बम है भाई…. इस समय ट्रेंडिंग हो रही है….. वायरल लड़की है।”

“नहीं भाई! यह फ़ोन हैक करके भी तो किसी की शरारत हो सकती है।”
(रॉबिन बोलते-बोलते चुप हो गया)

सन्नी ने कहा, “अरे यार रॉबिन, बिना फ़ोन से फ़ोटो खींचे कैसे कोई निकाल सकता है! खींचते वक्त तो इनकी बुद्धि होगी ही ना!”
एक लम्बा मौन पसर रहा था रॉबिन और सन्नी के बीच। रॉबिन रुआँसा हो गया।
सन्नी ने धीरे से कहा, “तू जानता है क्या इसे…? नहीं न ! फिर क्यों इतना टेंशन ले रहा है।”

रॉबिन चुपचाप वहाँ से चल दिया, जाते-जाते उसके दिमाग़ में एक ही चीज़ घूम रह थी, ‘सीकर वाली बुआ…. बहुत वायरल हो गई।’

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

बुलेट युग में मेट्रो की समस्या से जूझता ‘इन्दौर’

भारतीय राजनीति में अपने स्वर्णिम इतिहास का बखान करता हुआ शहर, जिसने सत्ता को सदैव अपना सहयोग दिया, जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व से प्रदेश को गौरवान्वित किया, सत्ता को इतना बल दिया कि शायद ही कोई शहर दे पाए। वर्तमान में सत्ताधारी राजनैतिक दल को पूरे नौ विधायक, महापौर, सांसद, पार्षद सब चुनकर दिए पर वर्तमान के तमाम जनप्रतिनिधियों से शहर इन्दौर का विकास और समस्याएँ हल होने का नाम नहीं ले रहीं।
एक तरफ़ देश के विकास दर के आँकड़े क़दम-दर-क़दम बढ़ते जा रहे हैं, विकास की अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही हैं, वहीं इन्दौर का ग्राफ़ गिरता नज़र आने लगा। मेट्रो का स्वप्न उस युग में भी कमज़ोर दिखाई दे रहा है, जब दुनिया बुलेट ट्रेन की तरफ़ बढ़ चुकी है। अतिक्रमण, पार्किंग विहीन मेट्रो स्टेशन, शहर की यातायात समस्या, धूल-धुएँ की जद में आता इन्दौर, और फिर अंडरग्राउंड मेट्रो लाइन का संकट शहर के सामने मुँह बाहें खड़ा है।
जनप्रतिनिधि शहर में बढ़ रहे अपराध के लिए चिंतित नज़र नहीं आ रहे, फिर विकास का स्वप्न देखना शहर के लिए तो दूभर ही है।
हालात इतने बदतर होते जा रहे हैं कि अभी शहर का बाशिंदा शहर में नौकरी करना नहीं चाहता, या यूँ कहें कि शहर में नौकरियों का संकट सामने खड़ा हुआ है। ऐसे में युवा शहर छोड़कर अन्य शहरों की ओर पलायन कर रहा है।
मेट्रो तो चलने लगी पर किस मार्ग से, यह सबके सामने है। इसलिए अब जनता की पीड़ा को समझने के लिए जनप्रतिनिधियों को सामूहिक रूप से शहर की चिन्ता करनी चाहिए, क्योंकि इन्दौर ने सदैव सत्ता को सबलता प्रदान की है।
आज कमज़ोर विपक्ष और मनमानी सत्ता से शहर का भाग्य धूल धूसरित हो रहा है। चिंता इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि इन्दौर ने मध्य प्रदेश का आर्थिक भाग्य लिखा है, इन्दौर की विकास दर पर चिंता करके इस समास्याओं से इन्दौर को मुक्त कीजिए, अन्यथा जनता की नाराज़गी फिर मतदान में दिखने लगेगी।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर

‘फ़ुटपाथ’ पैदल यात्रियों के लिए, ठेले लगाने के लिए नहीं

देश के सबसे स्वच्छ शहर इन्दौर अब अन्य शहरों के लिए मानक और सीखने का विश्व विद्यालय बनता जा रहा है, जैसे स्वच्छता के मामले में हमने रिकॉर्ड बढ़त हासिल की, उसी तरह शहर को सुंदर रखना भी शहर वासियों की ज़िम्मेदारी है, और शहर यदि सुंदर रहेगा तो कई समस्याओं से मुक्त भी रहेगा।
शहर के सौंदर्यीकरण और लोगों की सुविधा के लिए नगर निगम द्वारा सड़क किनारे दोनों ओर फ़ुटपाथ बनवाए हैं, परंतु फ़ुटपाथ पर दुकानदार और फल विक्रेताओं ने कब्ज़ा कर लिया है। इस कारण बाज़ार में ख़रीदारी के लिए पैदल आने वाले लोगों को मजबूरी में सड़क पर चलना पड़ रहा है। हालांकि फ़ुटपाथ पर दुकानदार के सामान और ठेला दुकानदारों की नगर निगम कई बार कार्रवाई कर चुकी है, परंतु कुछ दिन बाद स्थिति जस की तस हो जाती है।
लाखों रुपये ख़र्च करने के बाद शहर के कई इलाकों में बने फ़ुटपाथ अब कब्ज़े और अतिक्रमण के शिकार हो गए हैं, फल विक्रेता, चाय-पान के ठेले, अन्य खाद्य सामग्रियों की दुकानें और साथ-साथ दुकान के आगे बने फ़ुटपाथ पर तो दुकानदार का ही कब्ज़ा जमा गया है। निगमकर्मी जब इन ठेलों-अस्थायी दुकानों को हटाने पहुँचते हैं तो सामान्यतः विवाद होता ही है। इनमें से कई फ़ुटपाथ पर कब्ज़े तो क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के समर्थन से चल रहे हैं, नेता के समर्थक नेताजी के नाम से कब्ज़े कर रहे हैं, जिनका किराया वसूला जा रहा है। ऐसे में शहर बदरंग होता जा रहा है, जो चिंता का विषय है। स्थानीय मरीमाता क्षेत्र हो अथवा एम.जी. रोड़ या एबी रोड़, हर फ़ुटपाथ पर रेहड़ी, ठेले और दुकानदारों के अतिक्रमण सामान्यतः दिख ही जाएँगे।
महानगर की दिशा में बढ़ते इन्दौर की व्यवस्थाओं में बेहद सुधार आवश्यक है, जो निगम की सख़्ती, दंडात्मक कार्यवाही और जनता की स्वीकार्यता से ही सम्भव है। यदि जनता भी जागरुक हो जाएगी तो शहर की ख़ूबसूरती पर कोई दाग़ नहीं लगा सकता।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर

शहर में फैल रहा ‘ई-रिक्शा’ से अव्यवस्थाओं का महाजाल

लापरवाह और बेपरवाह बनता जा रहा महानगर इन्दौर, इन दिनों ई-रिक्शा के कहर से भी अछूता नहीं है। जहाँ मर्ज़ी ई-रिक्शा रोकी और सवारी बैठाना-उतारना शुरू, जहाँ मर्ज़ी वहाँ पार्किंग। ऐसे में आलम यह है कि शहर की सुचारू बन रही यातायात व्यवस्थाओं में भी यह ई-रिक्शा मुसीबत बनती जा रही हैं।
बीते दिनों तो इन्दौर शहर में ई-रिक्शा की बैटरी फटने से दो लोगों की मौत हो गई। मामला विजय नगर क्षेत्र का है, जिसमें ई-रिक्शा की बैटरी फटने से झुलसी 60 वर्षीय रामकुंवर बाई पति नाथूसिंह के इलाज के दौरान बुधवार सुबह मौत हो गई। इसी हादसे में झुलसी उनकी बेटी पवित्रा की सोमवार को मौत हो गई थी। दोनों का एमवाय अस्पताल में इलाज चल रहा था। ई-रिक्शा चालक भी इस दुर्घटना में झुलसा है, जिसका इलाज चल रहा है। उसके ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला भी दर्ज कर लिया है।
ई-रिक्शा निश्चित रूप से सस्ते और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अच्छा माध्यम हो सकते हैं किन्तु अव्यवस्था और मनमानी के चलते हादसों के कारण भी बनते जा रहे हैं। ऐसे कई मामले हैं जिसमें ई-रिक्शा से यात्रियों की जान जोखिम में डालना, यातायात नियमों का उल्लंघन, और दुर्घटनाएँ शामिल हैं, जैसे कि एक ई-रिक्शा में बहुत ज़्यादा लोगों का बैठना, बैटरी फटने से आग लगना, और अन्य वाहनों से टक्कर। ये घटनाएँ लापरवाही, सुरक्षा नियमों की अनदेखी और कभी-कभी जानबूझकर ख़तरे पैदा करने का परिणाम हैं।
ये बेलगाम ई-रिक्शा संचालक यात्रियों की क्षमता से ज़्यादा लोगों को उसमें बैठा लेते हैं, और इससे यात्रियों की जान जोखिम में डाल देते हैं। ई-रिक्शा का अन्य वाहनों से टकराना और दुर्घटनाओं का कारण बनना भी शामिल है, जिसमें कई मौतें भी हुई हैं।
शहर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना है तो इन ई-रिक्शाओं को नियंत्रित और नियमानुसार संचालित करना होगा, भीड़ वाले क्षेत्र जैसे राजवाड़ा, रीगल, पलासिया चौराहा, मधुमिलन क्षेत्र, विजय नगर, रसोमा चौराहा सहित लालबाग चौराहा, महूनाका, अन्नपूर्णा क्षेत्र इत्यादि में इन ई-रिक्शाओं के कहर से यातायात व्यवस्था भी बिगड़ रही है और यात्रियों की जान का संकट भी खड़ा है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा,
इन्दौर

पत्रकारों से क्यों छूट रहा पुस्तकालय या संदर्भ कक्ष?

चौथा खम्बा

लिखने से अधिक पढ़ना चाहिए, यह सनातन सत्य है, जो हर लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति से कहा जाता है, पर क्या आज भी लोग लिखने से अधिक पढ़ने में विश्वास करते हैं? इस प्रश्न के उत्तर को खोजने पर खाली हाथ ही लौटना होगा। कारण साफ़ है, आपाधापी के दौर में पत्रकारिता के लोग अब केवल लिखने पर विवश हैं, भाषाई समृद्धता की ओर न तो पत्रकारिता संस्थान ध्यान देते हैं और न ही पत्रकार।

यही सच है कि मीडिया संस्थानों से पुस्तकालयों ने विदाई लेना शुरू कर दी है, कुछेक इक्का-दुक्का संस्थान ही शेष बचे हैं जहाँ निजी पुस्तकालय जीवित हैं। कुछ मीडिया संस्थानों में पुस्तकालय तो जीवित हैं पर वहाँ पत्रकारों के पास फुरसत नहीं है कि उस पुस्तकालय का कभी उपयोग कर लिया जाए। इन्दौर प्रेस क्लब में पूर्व अध्यक्ष अरविंद तिवारी ने प्रीतमलाल दुआ स्मृति संदर्भ एवं अध्ययन कक्ष का निर्माण करवाया, सैंकड़ों किताबें रखवाईं, वरिष्ठ लाइब्रेरियन एवं पत्रकार कमलेश सेन के माध्यम से दुरुस्तीकरण और संयोजन भी करवाया पर भाग्य अनुसार उस पुस्तकालय में 6 महीने में कुछ पाठक भी ऐसे नहीं आए, जो किसी किताब को पढ़ना चाहते हों अथवा उन्हें पढ़ने के लिए ऐसी किसी पुस्तक की आवश्यकता हो जो पुस्तकालय में नहीं हो और क्लब उसे ख़रीदकर बुलवा सके।
ऐसे कठिन दौर में भी पत्रकारों को अपनी पढ़ने-लिखने की आदत को फिर से जीवित रखना होगा। पहले के समय में जैसे संदर्भों का उपयोग/प्रयोग ख़बरों में किया जाता था, अब वह भी डायनासोर की भांति विलुप्त होता जा रहा है। संदर्भों का अध्ययन करना होगा, तभी हमारी लिखने की शक्ति बढ़ेगी, भाषाई और शाब्दिक संपदा में बढ़ोत्तरी होगी वरना एक दिन यह अच्छी भाषा भी विलुप्त हो जाएगी। इस समय पत्रकारिता के सामने भाषाई सौन्दर्य और हिन्दीनिष्ठ भाषा दो महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं, जो भाषाई अस्तित्व को बचा सकती हैं। ऐसे में यदि हमने पुस्तकालय नहीं बचाए तो पुस्तक संस्कृति मर जाएगी, फिर रोबोट ही लिखेंगे एआई या गूगल के सहारे तथ्यात्मक ख़बरें।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं लेखक, इंदौर

पारंपरिक सराफ़ा बाज़ार बचाना शहर की ज़िम्मेदारी

वर्षों से शहर की पुरातन परम्पराएँ जीवित हैं, उसमें शहर की पहचान भी सम्मिलित है और शहर के खान-पान का ठियों का भी अपना महत्त्व है। उन्हीं पारंपरिक पहचान में शहर के सराफ़ा बाज़ार में रात में लगने वाला खाने-पीने का बाज़ार भी शामिल है। लगभग सौ वर्षों से अधिक समय से यह बाज़ार इस शहर में सजता है।
इंदौर के स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजन पूरे भारत में मशहूर हैं। यहाँ का सराफ़ा बाज़ार का स्‍ट्रीट फ़ूड मार्केट है। यहाँ घूमने आने वाले लोगों को हज़ारों तरह के अलग-अलग व्‍यंजनाें का स्‍वाद चखने का मौका मिलता है। अगर आप शाकाहारी हैं, तो आपके लिए तो यह मार्केट बहुत अच्‍छा है, क्‍योंकि यहाँ पर कुछ भी माँसाहारी नहीं मिलता। स्थानीय सराफ़ा व्यापारियों ने ही इस बाज़ार को प्रोत्साहित किया था, ताकि उनकी दुकानें अंधेरी रात में भी सुरक्षित रहें। किन्तु विगत कुछ सालों से इस बाज़ार में पारंपरिक स्वाद के अलावा विदेशी स्वाद चाइनीज़, इटालियन, मैक्सिकन खाद्य सामग्री की भरमार होने लग गई। साथ ही, कई विकृतियों ने घर करना शुरू कर दिया था। इसी को लेकर स्थानीय सराफ़ा व्यापारियों ने प्रशासन से शिकायतें कीं और परिणाम स्वरूप इस मार्केट से अब उन गैर पारंपरिक खाद्य पदार्थों का विक्रय प्रतिबंधित किया गया है।
बहरहाल, विषय यह भी है कि क्या इंदौर चाहता है कि हम ‘फ़ूड कैपिटल ऑफ़ मध्यप्रदेश’ का अपना तमगा खो दें या फिर अपने पुरातन स्वाद को समाप्त कर दें या फिर उन पारंपरिक व्यंजनों से आने वाली पीढ़ी को वंचित कर दें?
यदि इंदौर यह सब नहीं चाहता है तो फिर इंदौर को प्रशासन के इस निर्णय के साथ खड़ा होना होगा। हमें अपने पुरातन स्वाद को बचाना है तो तटस्थ होना ही होगा। हमें सराफ़ा में होने वाली उच्छंदताओं के विरुद्ध एकजुट होना पड़ेगा, खाद्य सामग्रियों के नाम पर परोसे जाने वाले कचरे का विरोध करके अपने इंदौर के पारंपरिक स्वाद को जीवित रखना होगा, तभी हम देशभर में व्याप्त हमारी पहचान बचा पाएँगे वरना एक दिन यह सब चाइनीज़, इटेलियन, मैक्सिकन और न जाने क्या उटपटांग की भेंट चढ़ जाएगा।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इंदौर