मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति

मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल‘ भारत के भाल से पढ़े जा रहें कसीदे, कमलनी के तेज पर प्रहार हो रहा है, समाजवाद से गायब समाज है, वामपंथी भी संस्कृति और धर्म के बीच का अन्तर भूल चुके हैं, न देश की चिन्ता है,न ही परिवेश की| धर्म और जातियों के […]


लघुकथा- चुनौती

*चुनौती* सुन निगोड़ी… रोज सुबह उठ कर कहा चली जाती है, रोज के काम करना ही नहीं चाहती, घर के बर्तन, कपड़े, खाना बनाना ये सब कौन करेगा…? तेरी माँ??? नौकरी से ज्यादा जरुरी घर का काम भी है… रमा की सास ने रमा को डाँटते हुए कहा.. इसी बीच रमा का पति आकर कहने […]


ऐ जाने वाले, लौट के आ जाओं…

आदरणीय सुरेश सेठ साहब की अन्तिम विदाई पर समर्पित चंद पंक्तियाँ…   *ऐ जाने वाले, लौट के आ जाओं…* जब भी बदलती है बयार सभी, शहर की कोई परवाह नहीं करता, पर वो अकेला ही खड़ा रहा, इंदौर की आत्मा का कवच बनकर… एक शख्स जो रहा हमेशा शेर-सा शान-ए-इंदौर राजवाड़े को बचाकर गजासीन हो […]


यादों में हमेशा रहेंगे सेठ साहब

यादों में हमेशा रहेंगे सेठ साहब हाँ! याद है पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए पोस्टकार्ड अभियान हेतु सेठ साहब से मिलना, पूर्ण समर्थन करने से शुरु हुआ मिलना, जानना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को…। शहर की जनता को राजवाड़ा वापस दिलवाने के संघर्ष से लेकर कई बड़े मुद्दे जिनमें स्ट्रीट लाईट की सौगात और यहाँ […]


झुलस रहा गणतंत्र, यह राष्ट्र धर्म नहीं

झुलस रहा गणतंत्र, यह राष्ट्र धर्म नहीं ===================================================== डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल‘ जहाँ हुए बलिदान प्रताप और जहाँ पृथ्वीराज का गौरव हो, जहाँ मेवाड़ धरा शोभित और जहाँ गण का तंत्र खड़ा हो, ऐसा देश अकेला भारत है, परन्तु वर्तमान में जो हालात विश्वपटल पर पहुँचाए जा रहे है वो भारत का असली चेहरा नहीं | […]


मैं जरुरत बनूंगा

हाँ ! प्यार की ठण्ड से *ठिठुरते* जज्बातों पर मैं तुम्हारी तपन बनूंगा, हाँ ! उम्मीद के स्याह आसमान में दीपक-सी मैं तुम्हारे लिए रोशनी बनूंगा, हाँ! थामकर हाथ मेरा चलने की आदत है तुम्हें मैं तुम्हारी लाठी बनूंगा, हाँ ! तुम्हें जरुरत दवा की नहीं मेरे साथ की है, मैं तुम्हारी जरुरत बनूंगा हाँ! […]


भारतीय

तारीखों के पटलने से साल बदल जाता है, मौसम के पटलने से नव सृजन मना कर देखो, हाँ ! तुम जो आज नया साल मना रहे हो, गुलामी की जंजीरों से परे निकल कर देखो, हाँ ! वही बेड़ियाँ जिसमें शताब्दियों की चारणता है, कभी स्वाधीनता के समर का विज्ञान बनकर देखो, हाँ ! वही […]


धुंध

सुनो! ये मौसम है ठण्ड और *धुंध* का, पर तुम ज्यादा संभलना इससे, क्योंकि इस मौसम में नमी और साथ-साथ आलस होता है, और यह मौसम सपनों पर भी धुंध की परते चढ़ा देता है । और अभी सपनों को धुंध से बचाना होगा, वरना हम बिखर से जाएंगे, हाँ ! इसके लिए तुम मेहनत […]


लघुकथा- मंचों की कवयित्री

*2.लघुकथा-मंच की कवयित्री* संस्कृति मंचों की एक उम्दा कवियत्री है । सप्ताह में 4 से अधिक कवि सम्मेलनों में रचना पाठ करना ही संस्कृति की पहचान थी । पुरुषप्रधान समाज होने के कारण कई बार संस्कृति का सामना फूहड़ कवियों और श्रोताओं से भी होता था । इसी बीच एक गाँव में हुए कवि सम्मेलन […]


लघुकथा- प्रतिक्रिया

*लघुकथा- प्रतिक्रिया* सारांश अपनी व्यस्त जीवन शैली में संचयनी के साथ बहुत खुश था, पर संचयनी अपनी सहेलियों और सहकर्मीयों के बीच बहुत सीधी और भोली थी | संचयनी के सहकर्मी उसके भोलेपन का हमेशा नाजायज फायदा उठा कर संचयनी को ही तंज कसते रहते थे, जिसके कारण वह पिछले कुछ दिनों से थोड़ी उखड़ी-उखड़ी […]