राजनीति में जितना महत्त्व सत्ता का होता है, उतना ही महत्त्व विपक्ष का भी माना जाता है। बल्कि विपक्ष का दायित्व अत्यधिक ही माना जाता है क्योंकि विपक्ष जनता का पक्षधर रहता है। विपक्ष जितना मज़बूत होगा, सत्ता पर उतना अंकुश भी बना रहेगा और जनहित के कार्यों को गति मिलेगी। किन्तु हालात ए इंदौर में विपक्ष की भूमिका बहुत कमज़ोर होती जा रही है। सत्तासीन राजनैतिक दल के 9 विधायक हैं, राज्यसभा और लोकसभा दोनों में इंदौर से सांसद हैं, महापौर भी सत्तासीन दल का है, राज्य सरकार में दो-दो मंत्री हैं और तो और अधिकतम पार्षद भी सत्तादल के हैं। बावजूद इसके शहर बदहाली के बुरे दौर से गुज़र रहा है।
वैसे तो विपक्षी दल के प्रदेश के मुखिया जीतू पटवारी भी इन्दौर से ही हैं परन्तु फिर भी शहर की चिंता न उन्हें कभी सताती है न उनके सिपहसलाहार शहर को याद रखते हैं। भागीरथपुरा दूषित जल काण्ड के दौरान भी पटवारी की चुप्पी और शहर अध्यक्ष चिन्टू चौकसे का कमज़ोर प्रहार भी शहर से विपक्ष की कमज़ोरी को बयाँ कर रहा था।
इस समय राजनीति का गिरता नैतिक स्तर भी जनता को भयाक्रांत कर रहा है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि ‘नेताओं और मंत्रियों को नैतिक स्तर की बड़ी चिंता है। यानी जीवन-स्तर चाहे रसलात को चला जाए, नैतिक स्तर हिमालय के शिखर पर चढ़ा रहना चाहिए।’
शिखर पर दिखना तो सब चाहते हैं पर शिखर के लायक कार्य करने में शहर के विपक्षी नेता फिसड्डी ही साबित हो रहे हैं। न शहर अध्यक्ष और न ही कांग्रेसी टीम कहीं मैदान पर जनता की बात करती नज़र आ रही है। कांग्रेसी प्रवक्ता टीवी और समाचारों में तो दिखना चाहते हैं पर वहीं जनता के साथ खड़े रहने में उनकी कोई रुचि नहीं दिखती। शहर के परिंदों की चिंता हो चाहे ग्रीन लंग्स के प्रति विपक्ष की चिंता इनके अतिरिक्त जनता के मुद्दों पर कहीं भी विपक्ष कोई मज़बूत भूमिका अदा नहीं कर पा रहा है। ऐसे में विपक्ष विहीन शहर सत्ता की मदमस्त गति के आगे पस्त और बेबस नज़र आ रहा है।
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं हिन्दीयोद्धा
इन्दौर
