दंभ में डूबे हुए शिवराज, भाजपा के उल्टे दिन शुरु

*दंभ में डूबे हुए शिवराज, भाजपा के उल्टे दिन शुरु*

# *डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’*

जैसे ही विधानसभा चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है, मध्यप्रदेश के मुखिया के तेवर वैसे-वैसे अकड़ और दंभ से भरते जा रहे है ।
मुखिया के हाल बदले से है, या तो हार का डर सता रहा है या फिर शिवराज भी समझ रहे हैं कि दुल्हन की विदाई तय है। राजधानी का हाल भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, एक तरफ बढ़ रही गर्मी शहर के तापमान की ठंडक तो खत्म कर चुकी है वैसे ही राजभवन से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक और श्यामला से लेकर सचिवालय तक गर्मी का प्रकोप छाया है, इस गर्मी का कारण चुनाव में भाजपा पर मंडरा रहे संकट के बादल ही हैं।
मध्यप्रदेश सरकार के काम भी इतने प्रभावी नहीं रहे जो मतदाताओं को लुभा सकें… व्यापम, वनरक्षक, डम्पर घोटाले से लेकर किसानों की आत्महत्याएँ, किसानों का आन्दोलन, मंदसौर काण्ड, सूबे के विधायको के बड़बोले बोल, अन्नदाताओं को अपमानित करना, गरीब, मजदूर, दलित और  शोषित वर्ग को दरकिनार कर प्रभुत्वसंपन्नो की सरकार कहलाना, बेटियों का राज्य में सबसे असुरक्षित रहना, आए दिन बेलगाम अफसरशाही का होना, जनमानस के बीच से विकास नाम के मिट्ठू का गायब होना, कृषि की नई तकनीकि सिखाने वाली विदेश यात्राओं में फर्जी किसानों को भेजना, और इसके अतिरिक्त भी हुए कई घोटालों के बावजूद भी सरकार की ओर से राहत तो नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के  तेज तर्रार तेवर से राजधानी की बौखलाहट साफ तौर पर मुखिया के चेहरे पर दिखाई दे रहीं है।
रसूखदारों के कामों को करवाने के लिए पूरी अफसरशाही रास्ते पर बैठी है, पर गरीब केवल दफ्तरों के चक्कर लगा-लगा कर ही नीला हो रहा है।
बीते शुक्रवार राजधानी में 400 किमी पैदल चलकर धार जिले की सरदारपुर के किसान, पत्रकार, मजदूर और छात्र पहुँचे, यादगार ए शाहजानी पार्क में धरने पर बैठे, जिसकी सूचना भी मुख्यमंत्री को दी गई, उन्होंने इतने दंभ भरे लहजे में किसानों से मिलना नहीं चाहा जैसे रामायण में रावण ने राम के दूत को दंभ दिखाया था|
खैर, किसान आन्दोलन भी समीप ही आ रहा है…
चूंकि कांग्रेस पूरे मनोयोग से, पूर्ण ताकत से चुनाव नहीं लड़ पाती है, न कोई कद्दावर कद सामने आता है, वर्ना मामा के सत्ता में लौटने के ख्वाब ही जीवन से दफा हो जाए। परन्तु कांग्रेस भी न जाने क्यों वॉक ओवर देने का चलन बना चुकी है।
बाबाओं को, उनके पट्ठों को, जमीन के जादुगर कांग्रेसियों को और धर्म की आड़ में वासना के शातिरों को तो मामा राज्यमंत्री दर्जा दे चुका है, क्योंकि वो डरा हुआ तो है पर बीते सप्ताह अमित शाह के प्रदेश दौरे के बाद शायद विदाई को लेकर आश्वस्त भी है कि भाजपा आए या न आए पर मामा का लौटना संभव नहीं है… इसी के चलते मामा भी अब कंस से ज्यादा हानिकारक बनने पर आतुर भी है।
नर्मदा यात्रा के घोटालों पर पर्दा डालने में असमर्थ, शराब बंदी में असफल, अपराध नियंत्रण में असक्षम, भ्रष्टाचार और व्याभिचार पर नकेल लगाने में फिसड्डी होने के बाद जो डर मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज के चेहरे पर दिख रहा है वो निश्चित तौर पर उन्हें भाजपा के शिवराज के नेतृत्व में चुनाव लड़कर बाद में डब्बा गोल होने के संकेत का पूर्वानुमान होना ही माना जाएगा।
मध्यप्रदेश की राजनीति का ये स्याह चेहरा भी विगत 15 से 20 साल में ज्यादा स्पष्ट तौर पर सामने आया है, जब उमा के नेतृत्व से चुनाव जीता फिर डब्बा गोल कर बाबूलाल गौर को काबिज़ किया, फिर शिव का नंबर आया, अब वही हाल शिवराज का भी होने की पूरी संभावनाएं है ।
खैर, हो भी क्यों न, जब आप ही बबूल के बीज बो रहे हों तो स्वाभाविक तौर पर आम तो उगने से रहें। आपने जो गड्डे दूसरों के लिए खोदे हैं, वो कभी न कभी रंग तो आपके लिए भी दिखाएंगे ही।
वैसे भी शिवराज और पाला बदलना दोनों साथ चलते है, कभी पटवा जी की आड़ लेकर तो कभी कैलाश जोशी जी, कभी आडवानी की गोद में तो कभी अमित शाह को मनाने में… मतलब साफ है, स्वार्थ जब तक है तब तक शिवराज आपके है वर्ना आपकी लाश पर भी पैर रखकर जाना पडे़ तो शिवराज को कोई गुरेज न होगा। अब सोचना मतदाताओं को होगा कि क्या ऐसे एहसान फरामोश को जीताना सही होगा, क्योंकि कुछ दिनों पूर्व शिव ने एक बयान में कहा कि वे कभी भी जा सकते है, हो सकता है शीर्ष नेतृत्व ने कुछ संकेत दिए हो जिससे भी शिवराज अनायास भय से आक्रान्तित हो जिसके कारण भी वो प्रदेश में असहजता जाहिर कर  रहें हों । अंतत: शिव की विदाई के साथ भाजपा की विदाई के संकेत भी हैं। परिणाम चाहे जो भी हो पर अब शिव के सर पर घमंड चढ़ चुका है जो निश्चित तौर पर भाजपा के बुरे दिन लाएगा।

*डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’*
खबर हलचल न्यूज, इंदौर
#खबरहलचलन्यूज #राजनीति #शिवराज

प्रकाशित पुस्तकें ही है लेखक की पहचान

*प्रकाशित पुस्तकें ही है लेखक की पहचान*

पुस्तक सर्वदा बहुत अच्छी मित्र होती है, इसके पीछे एक कारण यह है कि पुस्तक ही किसी सृजक के उपलब्ध ज्ञान का निष्कर्ष होती है।
जब तक लेखक किसी विषय को गहनता से अध्ययन नहीं कर लेता उस पर लेखन उसके लिए संभव नहीं है और गहराई से ग्रहण किए ज्ञान का निचोड़ ही उसके सृजन में उसकी मेधा का परिचय देता है।
वर्तमान समय में प्रत्येक पांचवाँ व्यक्ति एक कवि, लेखक या अन्य विधा का सृजक बनता जा रहा है, क्योंकि इस समय चलन है इंटरनेट व सोशल मीडिया का। बात यदि हिन्दी लेखन की ही की जाए तो वर्तमान में 2000 से अधिक अंतरताने उपलब्ध हैं जहाँ आप अपनी रचनाओं को स्थान दिलवा सकते है, जैसे अमरउजाला.कॉम, हिन्दीलेखक, गद्धकोश, मातृभाषा.कॉम, प्रतिलिपी, कविताकोश, प्रवक्ता, भारतवार्ता, आदि के साथ-साथ फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम भी है परन्तु इन सबके अतिरिक्त एक शौकिया या व्यावसायिक लेखक के तौर पर मिलने वाली पहचान की मुहर आपके द्वारा लिखी पुस्तक से ही मिल सकती है।
और वर्तमान समय में वो दौर भी खत्म सा हो गया जब प्रकाशक ही लेखकों को खोजते थे, अब लेखक स्वयं भी प्रकाशक खोज सकते हैं ।
ई एल जेम्स, ह्यूघ हॉवी और अमांडा हॉकिंग्स सफल प्रकाशक हो सकते हैं, तब कोई भी कारण नहीं है कि आप वह नहीं हो सकते। एक लेखक के रूप में आप कितने अच्छे हैं, यह सबसे अधिक महत्व रखता है। यद्यपि स्वयं-प्रकाशक के रूप में आपके लेखन की सफलता भी प्रकाशकों के दृष्टिकोण बदल सकती है और तब आपका लाखों में खेल सकते हैं।
लेखक की सृजनशीलता का मापदण्ड, उसका आभामंडल, उसका पाठक वर्ग और उसका किरदार भी उसके द्वारा लिखी पुस्तक से ही आँका जा सकता है।
जब आपको कोई प्रकाशन प्रकाशित नहीं कर रहा है तो इसका कारण यह बिलकुल भी नहीं है कि आपका लेखन कमजोर है, बल्कि प्रकाशक की व्यावसायिक मजबूरियाँ भी उत्तरदायी होती हैं, क्योंकि जब तक आप सम्मानित या स्थापित साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते तब तक आपकी पुस्तक कोई क्यों खरीदेगा?
दुनिया नाम के पीछे भागती है, और ऐसे में स्वयं प्रकाशन एक बेहतर उपलब्ध विकल्प है, जिसके माध्यम से आप बतौर रचनाकार या लेखक अपनी पुस्तकें प्रकाशित करवा कर अपना पाठक वर्ग खोज सकते हैं।
कई लोग आज भी ये सोचते हैं कि स्वयं प्रकाशन योजना एक अत्यधिक खर्चीला प्रकाशन प्रकल्प है, और अत्यधिक पैसा लगा कर ही स्वान्तय सुखाय पुस्तकें प्रकाशित करवाई जा सकती हैं, जबकि ऐसा हमेशा सहीं नहीं होता।
मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले से एक महिला साहित्यकार डॉ.प्रीति सुराना द्वारा संचालित *अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन* ने इस तरह के तमाम सारे मिथक तोड़ दिए हैं ।
उनका प्रकाशन छोटी पुस्तकों के प्रकाशन और ईबुक से रचनाकार के सृजन के प्रचार की कई योजनाएं लाया है, जिसमें महज 1500 रु से भी कम खर्च में 16 पृष्ठ की छोटी पुस्तकें प्रकाशित करवाई जा सकती हैं ।
और उस पर आईएसबीएन भी लिया जा सकता हैं । ये योजना एक रचनाकार के लिए सोने पर सुहागा है, क्योंकि पुस्तकों का आकार या पृष्ठ संख्या उतनी मायने नहीं रखती जितनी आपके परिचय में जुड़ी प्रत्येक पुस्तक।
यही प्रकाशित पुस्तक आपकी पहचान होती है।
अन्तरा-शब्दशक्ति प्रकाशन के माध्यम से डॉ.प्रीति सुराना जी द्वारा सैकड़ों या कहें हजारों गुमनाम और अनायास भय से आक्रान्तित (जिन्हें स्वयं प्रकाशन खर्चीला जान पड़ता था) सृजकों को एक अदद पहचान मुहैय्या करवाई जा रही है।
मानो आप एक साझा संग्रह का ही हिस्सा बनने जा रहें हो तो वहाँ जुड़ने का खर्च 500 रुपये से लेकर 2500 रुपये तो होगा ही, वहाँ पर यह राशि देने के बाद भी परिचय में साझा संग्रह ही जुड़ेगा जबकि इतने ही खर्च में आप स्वयं की पुस्तक प्रकाशित करवा सकते हैं और उस प्रकाशित पुस्तक का ईबुक संस्करण भी आपके लिए पाठक खोज लाएगा, जब आपके विश्वास हो जाए कि आपके पास पर्याप्त पाठक हो रहे हैं तो आप स्वयं की पुस्तकें ज्यादा छपवा कर विक्रय भी कर सकते है, जिससे आपको आय भी प्राप्त होगी या फिर निजी अन्तरताना (वेबसाईट या ब्लॉग) बना कर पाठक बढ़ा सकते है, जिससे गूगल एडसेंस के माध्यम से भी आय प्राप्त होगी , इसके लिए लेखकों को www.antrashabdshakti.com पर पंजीकरण करवाना होता है, पाण्डुलीपि भेजना और फिर आकर्षक कवर के साथ पुस्तकों का प्रकाशन हो जाता है, मय संपादन के |
अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन की यह छोटी पुस्तकों और ईबुक के माध्यम से रचनाकारों के प्रचार की पहल निश्चित तौर पर हिन्दुस्तान के साहित्य आकाश में कई सितारे तो देगी ही वरन साहित्कारों को स्वयं प्रकाशन योजना में उलझाने वाले प्रकाशकों और लेखक की बजाय प्रकाशकों के नाम को प्रकाशित करने बाले कुनबें से भी दूर करेगी।
वैसे साहित्य की कितनी महिमा होती है ये तो महाकवि रामधारी सिंह दिनकर ने यह कहकर ही प्रतिपादित कर दिया था कि *’जब-जब राजनीति लड़खड़ाई है, साहित्य ने ही उसे संभाला हैं’*
यह अक्षरश: सत्य भी है, इसीलिए साहित्य सृजन जारी रखें और एक बार स्वयं की छोटी पुस्तकों के प्रकाशन के बारें में जरूर सोचे.. क्योंकि *’ये प्रकाशित पुस्तकें ही साहित्यकार होने की शर्त भी और पहचान भी हैं।’*

*डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’*
हिन्दीग्राम, इंदौर

मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति

मासूमों की चित्कारों से लथपथ भारतीय राजनीति

डॉ.अर्पण जैन अविचल

भारत के भाल से पढ़े जा रहें कसीदे, कमलनी के तेज पर प्रहार हो रहा है, समाजवाद से गायब समाज है, वामपंथी भी संस्कृति और धर्म के बीच का अन्तर भूल चुके हैं, न देश की चिन्ता है,न ही परिवेश की| धर्म और जातियों के जहर में मासूम चित्कारों के गर्म तवे पर राजनैतिक खिचड़ी पकाई जा रही है, शर्म करों सत्ता के धृतराष्ट्र, शर्म करों जनता के कंधों और भावनाओं का इस्तेमाल करने वालों, शर्म करों….

देश में विगत एक पखवाड़े में लगातार ३ मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म हुआ, कठुआ, उन्नाव और इंदौर |  सत्तामद में डूबे नेताओं ने उस पर भी राजनीति करना शुरू कर दी | एक और मोमबत्ती गेंग सक्रिय हो गई दूसरी और राजनेताओं का जुलूस और शक्ति प्रदर्शन |

कोई तंत्र को दोषी ठहरा रहा हैं तो कोई जागरूकता की कमी | असल मानों तो यह बलात्कार की घटनाएँ केवल और केवल मानवता की हार से ज़्यादा नहीं | मानवीय धर्म कमजोर पड़ चुका हैं, क्योंकि व्याभिचारी कितना भी गिर क्यों न जाए पर जब बात मासूम की आती है तो शायद वो भी थोड़ा तो मानवीय हो सकता है | परंतु ऐसा नहीं होना मतलब साफ तौर पर मानवीय पहलू में छिपी सांस्कृतिक अक्षुण्णता नस्ते-नाबूत हो चुकी हैं |

किस मानसिक अवसाद के चलते यह कुकृत्य हो रहे है, यह तो जानना कठिन है किंतु इतना तो हम समझ ही सकते है क़ि कहीं न कहीं मानव धर्म ख़तरे में हैं | कोई हिंदू का तो कोई मुस्लिम का बलात्कार बता रहा हैं, परंतु बलात्कार धर्म का नहीं बल्कि लड़की का होता है, जिसका धर्म मायने नहीं रखता, अस्मिता मायने रखती हैं |

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। इस प्रकार भारतभर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी इज़्ज़त गंवा देती हैं, लेकिन आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई बयां नहीं करती। बहुत सारे मामले ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट ही नहीं हो पाती।

प्रत्येक वर्ष बलात्कार के मामलों में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है। वर्ष 2011 में देशभर में बलात्कार के कुल 7,112 मामले सामने आए, जबकि 2010 में 5,484 मामले ही दर्ज हुए थे। आंकड़ों के हिसाब से एक वर्ष में बलात्कार के मामलों में 29.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

बलात्कार के मामलों में मध्यप्रदेश सबसे अव्वल रहा, जहां 1,262 मामले दर्ज हुए, जबकि दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश (1,088) और महाराष्ट्र (818) रहे। इन तीनों प्रदेशों के आंकड़े मिला दिए जाएं तो देश में दर्ज बलात्कार के कुल मामलों का 44.5 प्रतिशत इन्हीं तीनों राज्यों में दर्ज किया गया। यह आंकड़ा राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीबी के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। पिछले कुछ दिनों में ही दिल्ली में कार में बलात्कार के कई सनसनीखेज मामले दर्ज हुए। दूसरी ओर राजस्थान की राजधानी जयपुर भी बलात्कार के मामलों में देशभर में पांचवें नंबर पर है। दिल्ली, मुंबई, भोपाल और पुणे के बाद जयपुर का नंबर इस मामले में आता है।

2007 से 2011 की अवधि के दौरान अर्थात चार साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस मामले में दिल्ली नंबर वन रही। एनसीबी के आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी लगातार चौथे साल बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में साल 2011 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए, जबकि मुंबई में 218 मामले दर्ज हुए। रिपोर्ट के मुताबिक 2007 से 2008 के बीच 18 से 30 की उम्र के करीब 57,257 लोगों को गिरफ्तार किया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा यह आंकड़े सिर्फ महिला अत्याचार के आधार पर जारी किए गए हैं।

बलात्कार के मामले में भारत विश्व की ‘डर्टी कंट्री’ की श्रेणी में शामिल हो रहा हैं, तब हमारी सरकारों और जनता की चिंता और बड़ जानी चाहिए, क्योंकि भारत का नाम विश्व पटल पर संस्कार सिंचन में अव्वल रहा हैं किंतु वर्तमान के हालात तो हमें दैहिक शोषण और यौन शोषण में ‘विश्वगुरु’ का दर्जा दिलाने से बाज नहीं आ रहे हैं |

‘विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, ‘भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’ वहीं महिलाओं के विकास के लिए केंद्र (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) के अनुसार, ‘भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’

बलात्कार के मामलों की जांच में जुटे पुलिस अधिकारियों का मानना है कि ऐसे अधिकतर मामलों में आरोपी को पीड़िता के बारे में जानकारी होती है। यह एक सामाजिक समस्या है और ऐसे अपराधों पर नकेल कसने के लिए रणनीति बनाना असंभव है।

अधिकारियों की मानें तो इनमें से अधिकांश मामले बेहद तकनीकी होते हैं। अक्सर ऐसे अपराध दोस्तों या रिश्तेदारों द्वारा किए जाते हैं, जो पीड़िता को झूठे वादे कर बहलाते हैं, फिर गलत काम करते हैं। कई बार ऐसे अपराध अज्ञात लोग करते हैं और पुलिस की पहुंच से आसानी से बच निकलते हैं। हालांकि कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि इसमें पीड़िता की रजामंदी होती है। उसे इस बात के लिए रजामंद कर लिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया।

वर्तमान में बाल अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया ( पॉक्सो क़ानून) में बदलाव किया जिसमें १२ वर्ष के कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म करने पर फाँसी की सज़ा दी जाएगी| यह निर्णायक परिवर्तन आवश्यक है साथ ही समाज को भी इस तरह के आरोपी के परिवार का सामाजिक बहिष्कार भी करना चाहिए, ताकि दुष्कर्म करने जैसे घृणित कार्य करने के पहले व्यक्ति उसके परिवार की दुर्दशा से भी बाख़बर रहें |

हमारे राष्ट्र में यदि दुष्कर्म के मामलों में वृद्धि हो रही है तो देश के तमाम राजनैतिक दलों को मिलकर एक रूपरेखा बनानी चाहिए जिससे इस तरह की समस्या से देश को बचाए जा सके, और किस क़ानून और प्रावधान के तहत दुष्कर्मी को दंड दे सके ताकि भविष्य में कोई पुनरावृत्ति न कर सके, साथ ही देश के सभी धर्म गुरुओं को भी मानवीयता के गिरते स्तर पर चिंता जाहिर करते हुए उसे बचाने के प्रयास करना चाहिए, न की सड़कों पर निकल कर राजनीति |

हमारे राष्ट्र में चुनावी आक्षेप लगाना बहुत आसान हैं, जबकि यदि राष्ट्र की असमर ख़तरे में है तो हम सब की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है की सरकार के साथ मिल कर देश बचाएँ, मीडिया, राजनेता, समाजसेवी, आंदोलनकारी आदि सभीजन मिल कर इस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं, पर हमारे यहाँ सभी ज़िम्मेदारों को राजनीति करने से फुरसत मिले तब तो देश के बारे में सोचेंगे |

कठुआ, उन्नाव और इंदौर कांड पर भी सरे आम राजनीतिक प्रपंच किए गए, बयानबाजी, नारे-प्रदर्शन आदि आदि | किंतु समाधान की दिशा में किसी ने नहीं सोचा, न समाज ने, न ही समाज के ठेकेदारों ने| लिहाजा कुकृत्य होने से कोई रोक नहीं सकता, रोकना केवल मानवीयता के गिरते स्तर को है |

डॉ. अर्पण जैनअविचल

पत्रकार एवं स्तंभकार

संपर्क: ०७०६७४५५४५५

अणुडाक: arpan455@gmail.com

अंतरताना:www.arpanjain.com

[लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ पत्रकार होने के साथ-साथ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं| ]

 

अंतर्राज्यीय भाषा समन्वय से भारत में स्थापित होगी हिन्दी

अंतर्राज्यीय भाषा समन्वय से भारत में स्थापित होगी हिन्दी

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

विविधताओं में एकता की परिभाषा से अलंकृत राष्ट्र यदि कोई हैं तो भारत के सिवा दूसरा नहीं | यक़ीनन इस बात में उतना ही दम हैं जितना भारत के विश्वगुरु होने के तथ्य को स्वीकार करने में हैं | भारत संस्कृतिप्रधान और विभिन्न जाति, धर्मों, भाषाओं, परिवेश व बोलियों को साथ लेकर एक पूर्ण गणतांत्रिक राष्ट्र बना | इसकी परिकल्पना में ही सभी धर्म, पंथ, जाति और भाषाओं का समावेश हैं |

जिस राष्ट्र के पास अपनी २२ संवैधानिक व अधिकारिक भाषाएँ हों, जहां पर कोस-कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदलने की बात कही जाती है, जहां लगभग १७९ भाषाओं ५४४ बोलिया हैं बावजूद इसके राष्ट्र का राजकाज एक विदेशी भाषा के अधिकनस्थ और गुलामी की मानसिकता के साथ हो रहा हो यह तो ताज्जुब का विषय हैं | स्वभाषाओं के उत्थान हेतु न कोई दिशा हैं न ही संकल्पशक्ति | भारतीय भाषाएं अभी भी विदेशी भाषाओं के वर्चस्व के कारण दम तोड़ रही रही हैं | एक समय आएगा जब देश की एक भाषा हिन्दी तो दूर बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं की भी हत्या हो चुकी होगी | इसलिए राष्ट्र के तमाम भाषा हितैषियों को भारतीय भाषाओं में समन्वय बना कर हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाना होगा और अंतर्राज्यीय कार्यों को स्थानीय भाषाओं में करना होगा | अँग्रेजियत की गुलाम मानसिकता से जब तक किनारा नहीं किया जाता भारतीय भाषाओं की मृत्यु तय हैं| और हिन्दी को इसके वास्तविक स्थान पर स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि इसकी स्वीकार्यता जनभाषा के रूप में हो | यह स्वीकार्यता आंदोलनों या क्रांतियों से नही आने वाली है | इसके लिए हिन्दी को रोजगारपरक भाषा के रूप में विकसित करना होगा क्योंकि भारत विश्व का दूसरा बड़ा बाजार हैं और बाजारमूलक भाषा की स्वीकार्यता सभी जगह आसानी से हो सकती हैं | साथ ही अनुवादों और मानकीकरण के जरिए इसे और समृद्धता और परिपुष्टता की ओर ले जाना होगा |

हमारे राष्ट्र को सृजन की ऐसी आधारशिला की आवश्यकता हैं जिससे हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओँ के उत्थान के लिए एक ऐसा सृजनात्मक द्दष्टिकोण विकसित हो जो न सिर्फ हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओँ को पुष्ट करेगा बल्कि उन भाषाओ को एक दूसरे का पूरक भी बनाएगा। इससे भाषा की गुणवता तो बढ़ेगी ही उसकी गरिमा फिर से स्थापित होगी। आज के दौर में हिन्दी को लेकर जो नकारात्मकता चल रही है उसे सकारात्मक मूल्यों के साथ संवर्धन हेतु प्रयास करना होगा|

भारतीय राज्यों में समन्वय होने के साथ-साथ प्रत्येक भाषा को बोलने वाले लोगो के मन में दूसरी भाषा के प्रति भरे हुए गुस्से को समाप्त करना होगा | जैसे द्रविड़ भाषाओं का आर्यभाषा,नाग और कोल भाषाओं से समन्वय स्थापित नहीं हो पाया, उसका कारण भी राजनीति की कलुषित चाल रही, अपने वोटबैंक को सहेजने के चक्कर में नेताओं ने भाषाओं और बोलियों के साथ-साथ लोगो को भी आपस में मिलने नहीं दिया | इतना बैर दिमाग़ में भर दिया कि एक भाषाई दूसरे भाषाई को अपना निजी शत्रु मानने लग गया, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था| हर भारतवंशीय को स्वभाषा का महत्व समझा कर देश की एक केंद्रीय संपर्क भाषा के लिए तैयार करना होगा. क्योंकि विश्व पटल पर भारत की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं हैं, विविधताओं के बावजूद भी भारत की साख में केवल राष्ट्रभाषा न होना भी एक रोड़ा हैं| हर भारतीय को चाहना होगा एक संपर्क भाषा वरना दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर रोटी खा जाएगा, मतलब साफ है कि यदि हमारी भारतीय भाषाओं के बीच हो लड़ाई चलती रही तो स्वभाविक तौर पर अँग्रेज़ी उस स्थान को भरेगी और आनेवाले समय में एक अदने से देश में बोली जाने वाली भाषा जिसे विश्व में भी कुल ७ प्रतिशत से ज़्यादा लोग नहीं बोलते भारत की राष्ट्रभाषा बन जाएगी |

स्वभाषाओं के बीच समन्वय का सबसे बेहतर विकल्प हैं- अंतर्राज्यीय भाषा सम्मेलन परिचर्चा | भारत के प्रत्येक वर्चस्वशील भाषाओं के बीच में साहित्यिक समन्वय से शुरुआत की जा सकती हैं | जैसे एक कवि सम्मेलन में तमिल, तेलगु, मलयाली भाषा के कवियों को आमंत्रित किया जाए और साथ में एक-एक हिन्दी अनुवादक लाए जाए जो तमिल की रचना को हिन्दी में सुनाए और हिन्दी की रचना को तमिल आदि भाषा में | साथ में भाषाओं के बोलने वालों के बीच समन्वय हेतु चर्चाओं का दौर शुरू हो, एक-दूसरे को स्वभाषा का सम्मान  बताया जाए, कमियाँ न गिना कर समन्वय की स्थापना की जाए | जब यह कार्य वृहद स्तर पर होने लगेगा तो निश्चित तौर पर हिन्दी राष्ट्र की जनभाषा का दर्जा पुन: प्राप्त कर लेगी और राष्ट्रभाषा बनने की कठिनाई भी दूर होगी|

साथ-साथ जनता में भाषा को लेकर राजनैतिक दूषिता को भी दूर करना होगा | एक भाषा की स्वीकार्यता के लिए सभी स्वभाषाओं का सम्मान करना सबसे आवश्यक कदम है | देश के २९ राज्यों और ७ केंद्रशासित राज्यों में भाषा की एकरूपता और स्वीकार्यता बहुत आवश्यक हैं | जनभाषा बनने के लिए हिन्दी भाषियों को भी विशाल हृदय का परिचय देते हुए अन्य भाषी समाज को स्वीकारना होगा तो अन्य भाषाओं के लोगों को हिन्दी भाषियों के साथ भी समन्वय रखना होगा| इसमे शासकीय भूमिका और मंशा भी महत्वपूर्ण कड़ी है | अन्यथा जनता की स्वीकारता को सरकार कमजोर भी कर सकती है यदि उनकी मंशा नहीं हैं तो | फिर भी जनतंत्र में जनता से बड़ी कोई इकाई नहीं हैं | जहाँ जनमत चाहेगा की एक भाषा हो, हिन्दी हमारी राष्ट्र की प्रतिनिधि भाषा हो तब सरकार को भी झुकना होगा | ‘एक साधे-सब सधे’ के सूत्र से राष्ट्र में भाषा क्रांति का सूत्रनाद संभव हैं, अन्यथा ढाक के तीन पात|

राजनीति से बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि इन्हीं राजनैतिक छल-प्रपंचों ने हिन्दी को अभी तक स्वाभिमान नहीं दिलाया | इन्ही पर किसी शायर का एक शेर है –

गर चिरागों की हिफ़ाज़त फिर इन्हें सौंपी गई,

तो रोशनी के शहर में बस अंधेरा ही रह जाएगा…

 

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

पत्रकार एवं स्तंभकार

[ लेखक डॉ. अर्पण जैनअविचलमातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं| ]

 

लघुकथा- चुनौती

*चुनौती*
सुन निगोड़ी… रोज सुबह उठ कर कहा चली जाती है, रोज के काम करना ही नहीं चाहती,
घर के बर्तन, कपड़े, खाना बनाना ये सब कौन करेगा…? तेरी माँ???
नौकरी से ज्यादा जरुरी घर का काम भी है…

रमा की सास ने रमा को डाँटते हुए कहा.. इसी बीच रमा का पति आकर कहने लगा…

*’रमा इस बार मकान की किश्त तुम तुम्हारी तनख्वाह से चुका देना, मेरी तन्ख्वाह इस बार भी नहीं मिली है……😔’*

अब चुनौती रमा के लिए यह है कि सास के काम में हाथ बटाएं या नौकरी करके घर चलाएं…?

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*

हिन्दीग्राम, इंदौर

यादों में हमेशा रहेंगे सेठ साहब

यादों में हमेशा रहेंगे सेठ साहब

हाँ! याद है पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए पोस्टकार्ड अभियान हेतु सेठ साहब से मिलना, पूर्ण समर्थन करने से शुरु हुआ मिलना, जानना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को…।
शहर की जनता को राजवाड़ा वापस दिलवाने के संघर्ष से लेकर कई बड़े मुद्दे जिनमें स्ट्रीट लाईट की सौगात और यहाँ तक कि सुगनीदेवी जमीन का मामला सब जगह सफेद शेर की दहाड़ से शहर भलिभांति परिचित रहा |
कई दिनों के स्वास्थ्य संघर्ष के बाद सेठ साहब का शहर को अलविदा कहने से ज्यादा दुखदायी यकीनन एक आवाज का हमेशा के लिए चुप हो जाना और इंदौर के लिए लड़ने वाले शेर का चले जाना है ।
दैनिक इंदौर समाचार में लगातार मेरे आलेखों का प्रकाशित होना और पुन: मिलने पर सेठ साहब का पहचान जाना और लेखन के लिए आशीष देना सबकुछ अब चिर स्मृतियों में हमेशा के लिए अंकित हो गया। असमय काल के आगे शेर का नतमस्तक होकर विधि के विधान को स्वीकार कर हमें छोड़ जाना बहुत याद आएगा…सेठ साहब आप हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे…
अश्रुपूरित श्रृद्धांजलि सहित…

डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’
सम्पादक- खबर हलचल न्यूज,इंदौर

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झुलस रहा गणतंत्र, यह राष्ट्र धर्म नहीं

झुलस रहा गणतंत्र, यह राष्ट्र धर्म नहीं ===================================================== डॉ. अर्पण जैन अविचल

जहाँ हुए बलिदान प्रताप और जहाँ पृथ्वीराज का गौरव हो, जहाँ मेवाड़ धरा शोभित और जहाँ गण का तंत्र खड़ा हो, ऐसा देश अकेला भारत है, परन्तु वर्तमान में जो हालात विश्वपटल पर पहुँचाए जा रहे है वो भारत का असली चेहरा नहीं |

बलिदानों और शूरवीरों की धरा पर बच्चों पर हमले, राष्ट्र के इतिहास के नाम पर भविष्य पर पथराव ये राष्ट्र गौरव नहीं बल्कि राष्ट्र को बदनाम करने की सुपारी लेकर काम करने की नीयत ही प्रतीत होती है|

गणतंत्र दिवस पर इस बार इतिहास खुद को दोहराएगा। भारत ने 26 जनवरी 1950 को अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया था और उस समय दक्षिण पूर्व एशिया के दिग्गज नेता और इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो मुख्य अतिथि थे। आजादी के 68 साल बाद भारत ने एक बार फिर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदो को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित किया है।

                              हालांकि इस बार सिर्फ इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ही मुख्य अतिथि नहीं होंगे। भारत ने आसियान के नौ अन्य राष्ट्राध्यक्षों को भी इस ऐतिहासिक पल के लिए आमंत्रित किया है जो गणतंत्र दिवस की परेड में भारत की सैन्य क्षमता और सांस्कृतिक विविधता के गवाह बनेंगे। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान के 10 देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया है जो अपने आप में अप्रत्याशित है।

और इस गौरव क्षण में राष्ट्र जातिवाद के दावानल में जल रहा है, विरोध तो इतिहास के साथ हुई खिलवाड़ का होना था, परन्तु कहीं मासूम बच्चों की स्कूली बस पर पथराव तो कहीं बसें जलाई जा रही है | ये सब सोची समझी साजिश है हिन्द की अस्मिता को दाँव पर लगा कर वैश्विक मंच पर बदनाम करने की |

राष्ट्र आन्तरिक कलह की आग में झुलस रहा है,और झुलसा हुआ शरीर लेकर क्या हम गणतंत्र दिवस मनाएंगे ? आखिर शर्म तो तब आनी चाहिए थी जब देश के अंदर ही जयचंद जिन्दा हो |

राष्ट्रीय पर्व के समीप आते ही गर्व और शौर्य का परचम लहराने वाले राजपूतों के नाम पर करणी सेना बना कर शौर्य को बदनाम करने का बीड़ा उठाकर राष्ट्र को तोड़ा जा रहा है |खण्डित गणतंत्र क्या राष्ट्रधर्म का निर्वाह कर रहा है ??

धिक्कार है ऐसे शिखंडियों पर, जो राष्ट्र के गौरव और सम्मान को विश्व पटल पर लज्जित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हो |अब भी हमारी आजादी और गणतंत्र अधूरा है, क्योंकि अभी भी जयचंद जिन्दा है |

भामाशाह और प्रताप के वंशज ऐसा तो नहीं कर सकते, क्योंकि सुना है शेर पुष्प और मासूम घास नहीं खाता|

परन्तु दुर्भाग्य है इस देश का कि यहाँ चंद चांदी के सिक्को की खनक से माँ का चीर हरण भी सहर्ष देखा और खरीदा जा सकता है |करणी सेना द्वारा जो राष्ट्रीय पर्व के समिप ही राष्ट्र संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है, ये उनके जयचंद होने के प्रमाण से ज्यादा क्या होगा | भारत में जिस तरह से करणी सेना पद्मावत फिल्म के विरोध में राष्ट्र संपत्ति पर प्रहार कर रही हैं, ये लोकतंत्र या गणतंत्र नहीं बल्कि विरोध के तरीके से राष्ट्रीय नुकसान हैं |

बहरहाल देश को झुलसने से बचाने में अपना सर्वस्व अर्पण करें, वर्ना हम एक दिन बिखरा हुआ राष्ट्र और खण्ड-खण्ड विखंडित समाज ही बच्चों को विरासत में सौंप पाएंगे |

 डॉ. अर्पण जैन अविचल

पत्रकार एवं स्तंभकार

इंदौर, मध्यप्रदेश

07067455455

 

स्वास्थ्य समस्या- जिम्मेदार कौन

 

हमारे धर्म शास्त्रों में मानव शरीर को सबसे बड़ा साधन माना गया है | कहा भी गया है कि
*शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम*– यानी यह शरीर ही सारे अच्छे कार्यों का साधन है | सारे अच्छे कार्य इस शरीर के द्वारा ही किये जाते हैं|
जब शरीर स्वस्थ रहेगा तो मन और दिमाग तंदरुस्ती से लबरेज होकर उत्साहित रहेंगे | परन्तु आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में मनुष्य अपने स्वास्थ्य को लेकर लापरवाह होते जा रहे है| यही लापरवाही जीवन की बड़ी कठीनाईयों को आमंत्रण दे रही है | आज के दौर में स्वस्थ्य रहना ही सबसे बड़ी चुनौती है | हमारे धर्मग्रंथो में तो यह भी लिखा है कि –
*को रुक् , को रुक् , को रुक् ?* *हितभुक् , मितभुक् , ऋतभुक् ।*

अर्थात ‘कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है ?
हितकर भोजन करने वाला , कम खाने वाला, ईमानदारी का अन्न खाने वाला ही स्वस्थ्य है |

“आप क्या खा रहे हैं स्वास्थ्य का संबंध केवल इससे नहीं है बल्कि आप क्या सोच रहे हैं और क्या कह रहे हैं स्वास्थ्य का संबंध इससे भी है।” आम तौर पर एक व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से फिट होने पर अच्छे स्वास्थ्य का आनंद लेना कहा जाता है। हालांकि स्वास्थ्य का महत्व इससे अधिक है। स्वास्थ्य की आधुनिक परिभाषा में कई अन्य पहलुओं को शामिल किया गया है जिनके लिए स्वस्थ जीवन का आनंद लेना बरकरार रखा जाना चाहिए।

*स्वास्थ्य की परिभाषा कैसे विकसित हुई?*

शुरुआत में स्वास्थ्य का मतलब केवल शरीर को अच्छी तरह से कार्य करने की क्षमता होता था। इसको केवल शारीरिक दिक्कत या बीमारी के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता था। 1948 में यह कहा गया था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने किसी व्यक्ति की संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति को स्वास्थ्य में शामिल किया है न कि केवल बीमारी का अभाव। हालांकि यह परिभाषा कुछ लोगों द्वारा स्वीकार कर ली गई थी लेकिन फिर इसकी काफी हद तक आलोचना की गई थी। यह कहा गया था कि स्वास्थ्य की यह परिभाषा बेहद व्यापक थी और इस तरह इसे सही नहीं माना गया। इसे लंबे समय के लिए अव्यवहारिक मानकर खारिज कर दिया गया था। 1980 में स्वास्थ्य की एक नई अवधारणा लाई गई। इसके तहत स्वास्थ्य को एक संसाधन के रूप में माना गया है और यह सिर्फ एक स्थिति नहीं है।

आज एक व्यक्ति को तब स्वस्थ माना जाता है जब वह अच्छा शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद ले रहा है।

*स्वास्थ्य को बनाए रखने का महत्व*

अच्छा स्वास्थ्य जीवन में विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए आधार बनता है। यहां बताया गया है कि यह कैसे मदद करता है:

*पारिवारिक जीवन:* कोई व्यक्ति जो शारीरिक रूप से अयोग्य है वह अपने परिवार की देखभाल नहीं कर सकता है। इसी तरह कोई व्यक्ति मानसिक तनाव का सामना कर रहा है और अपनी भावनाओं को संभालने में अक्षम है तो वह परिवार के साथ अच्छे रिश्तों का निर्माण और उनको बढ़ावा नहीं दे सकता है।

*कार्य:* यह कहना बिल्कुल सही है कि एक शारीरिक रूप से अयोग्य व्यक्ति ठीक से काम नहीं कर सकता। कुशलतापूर्वक काम करने के लिए अच्छा मानसिक स्वास्थ्य बहुत आवश्यक है। काम पर पकड़ बनाने के लिए अच्छे सामाजिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद लेना चाहिए।

*अध्ययन:* ख़राब शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी अध्ययन में एक बाधा है। अच्छी तरह से अध्ययन करने के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अलावा अच्छा संज्ञानात्मक स्वास्थ्य बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

एक सर्वे के अनुसार तो वर्तमान में होने वाली बीमारीयों में 78 प्रतिशत से ज्यादा बीमारीयाँ हमारी जीवनशैली की अनियमितताओं और गड़बड़ीयों के कारण ही होती है |
इसलिए यह भी कटु सत्य है कि मानव की लापरवाही ही उसके रोगी होने की मूल कारक है |
अष्टावक्र में लिखा भी गया है कि *बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का जो चेहरा रहता है, वह प्रकृति की देन है, तीस वर्ष की आयु का चेहरा जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन पचास वर्ष की आयु का चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है।*

और व्यक्ति की अपनी कमाई से तात्पर्य उसके स्वास्थ्य के प्रति परवाह और जिम्मेदारी ही है |
हमें अपनी जीवनशैली में नियमितता का विशेष ध्यान रखना होगा, अन्यथा रोग को निमंत्रण हम स्वयं ही देंगे | एक अंग्रेजी डाक्टर थॉमस फुल्लर अपनी किताब में लिखते है कि *’जब तक रुग्णता का सामना नहीं करना पड़ता; तब तक स्वास्थ्य का महत्व समझ में नहीं आता है।’*

*स्वास्थ्य को सुधारने की तकनीक*

स्वास्थ्य का सुधार करने में सहायता करने के लिए यहां कुछ सरल तकनीकें दी गई हैं:

*स्वस्थ आहार योजना का पालन करें*

अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने की ओर पहला कदम विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध आहार होना है। आपके आहार में विशेष रूप से ताजे फल और हरी पत्तेदार सब्जियां शामिल होनी चाहिए। इसके अलावा दालें, अंडे और डेयरी उत्पाद भी हैं जो आपके समग्र विकास और अनाज में मदद करती हैं जो पूरे दिन चलने के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं।

*उचित विश्राम करें*

अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करने और काम करने के लिए ऊर्जा बनाए रखना आवश्यक है। इसके लिए 8 घंटों के लिए सोना ज़रूरी है। किसी भी मामले में आपको अपनी नींद पर समझौता नहीं करना चाहिए। नींद की कमी आपको सुस्त बना देती है और आपको शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान करती है।

*व्यायाम*

आपको अपने पसंद के किसी भी शारीरिक व्यायाम में शामिल होने के लिए अपने दैनिक कार्यक्रम से कम से कम आधे घंटे का समय निकालना चाहिए। आप तेज़ चलना, जॉगिंग, तैराकी, साइकिल चलाना, योग या अपनी पसंद कोई भी अन्य व्यायाम का प्रयास कर सकते हैं। यह आपको शारीरिक रूप से फिट रखता है और अपने दिमाग को आराम देने का एक शानदार तरीका भी है।

*दिमागी खेल खेलें*

जैसा कि आप के लिए शारीरिक व्यायाम में शामिल होना महत्वपूर्ण है आपके लिए दिमागी खेल खेलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ये आपके संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

*ध्यान लगाना*

ध्यान आपके मन को शांत करने और आत्मनिरीक्षण करने का एक शानदार तरीका है। यह आपको एक उच्च स्थिति में ले जाता है और आपके विचारों को और अधिक स्पष्टता देता है।

*सकारात्मक लोगों के साथ रहें*

सकारात्मक लोगों के साथ रहना आवश्यक है। उन लोगों के साथ रहें जिनके साथ आप स्वस्थ और सार्थक चर्चाओं में शामिल हो सकते हैं तथा जो आपको निराश करने की बजाए आपको बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। यह आपके भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

*रूटीन चेक-अप कराते रहें*

वार्षिक स्वास्थ्य जांच कराना एक अच्छा विचार है। सावधानी हमेशा इलाज से बेहतर है। इसलिए यदि आप अपनी वार्षिक रिपोर्ट में किसी भी तरह की कमी या किसी भी तरह के मुद्दे को देखते हैं तो आपको तुरंत मेडिकल सहायता प्राप्त करनी चाहिए और इससे पहले कि यह बढ़े इसे ठीक कर लेना चाहिए।इन्ही सब कारकों के साथ सब स्वस्थ रहें, मस्त रहें |

  • *डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’*&

लघुकथा- प्रतिक्रिया

*लघुकथा- प्रतिक्रिया*

सारांश अपनी व्यस्त जीवन शैली में संचयनी के साथ बहुत खुश था, पर संचयनी अपनी सहेलियों और सहकर्मीयों के बीच बहुत सीधी और भोली थी |
संचयनी के सहकर्मी उसके भोलेपन का हमेशा नाजायज फायदा उठा कर संचयनी को ही तंज कसते रहते थे, जिसके कारण वह पिछले कुछ दिनों से थोड़ी उखड़ी-उखड़ी सी रहने लगी थी, जबकि संचयनी पेशे से एक्युप्रेशर चिकित्सक थी, और उसका शौक लेखन था ।
उसकी एक सहकर्मी ने संचयनी की डीग्री पर जलनवश टिप्पणी की थी , जिससे संचयनी बहुत ज्यादा व्यथित थी ।
उसके माथे की शिकन देखकर सारांश ने उससे कारण जाना ।
कारण जानने के बाद सारांश ने तर्क दिया कि
संचयनी तुम प्रतिक्रियावादी समाज में रहती हो, और तुम एक बात ध्यान रखो
हर क्रिया की एक *प्रतिक्रिया* होती है,
जब तक तुम प्रतिक्रिया नहीं दोगी, ये समाज तुम्हे जीने नहीं देगा ।
जिस सहकर्मी ने टिप्पणी दी उसका भी तो तुम व्यक्तित्व देखो, क्या वो उस लायक भी है जिसे महत्व दिया जाए, तो तुम क्यों लिहाज करती हो, तुम्हें प्रतिक्रिया देना आना चाहिए ।
इनसब संवाद के बाद से संचयनी के जीवन में बहुत सुधार आया और संचयनी अब प्रतिक्रियावादी समाज में सहर्ष प्रतिक्रिया देकर जीवन को सशक्तता से जीने लग गई है ।

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*
इंदौर, मध्यप्रदेश

तर्क के आरोहण के बाद बनेगा हिन्दी राष्ट्रभाषा का सूर्य

*तर्क के आरोहण के बाद बनेगा हिन्दी राष्ट्रभाषा का सूर्य*

*_समग्र के रोष के बाद, सत्य की समालोचना के बाद, दक्षिण के विरोध के बाद, समस्त की सापेक्षता के बाद, स्वर के मुखर होने के बाद, क्रांति के सजग होने के बाद, दिनकर,भास्कर, चतुर्वेदी के त्याग के बाद, पंत,सुमन, मंगल,महादेवी के समर्पण के बाद भी कोई भाषा यदि राष्ट्रभाषा के गौरव का वरण नहीं कर पाई तो इसके पीछे राजनैतिक धृष्टता के सिवा कोई कारक तत्व दृष्टिगत नहीं होता |_*

हाँ! जब एक भाषा संपूर्ण राष्ट्र के आभामण्डल में उस पीले रंग की भांति सुशोभित है जो चक्र की पूर्णता को शोभायमान कर रहा है, उसके बाद भी ‘राजभाषा’ की संज्ञा देना न्यायसंगत नहीं लगता।
बहरहाल हम पहले ये तो जाने कि क्यों आवश्कता है राष्ट्रभाषा की ? जिस तरह एक राष्ट्र के निर्माण के साथ ही ध्वज को, पक्षी को, खेल को, पिता को, गीत को, गान को, चिन्ह तक को राष्ट्र के स्वाभिमान से जोड़कर संविधान सम्मत बनाने और संविधान की परिधि में लाने का कार्य किया गया है तो फिर भाषा क्योंकर नहीं?
किसी भी राष्ट्र में जिस तरह राष्ट्रचिन्ह, राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पशु की अवहेलना होने पर देशद्रोह का दोष लगता है परन्तु भारत में हिन्दी के प्रति इस तरह का प्रेम राजनैतिक स्वार्थ के चलते राजनीति प्रेरित लोग नहीं दर्शा पाए, उसके पीछे मूल कारण में सत्तासीन राजनीतिक दल का दक्षिण का पारंपरिक वोट बैंक टूटना भी है।
हाशिए पर आ चुकी बोलियाँ जब केन्द्रीय तौर पर एकिकृत होना चाहती है तो उनकी आशा का रुख सदैव हिन्दी की ओर होता है, हिन्दी सभी बोलियों को स्व में समाहित करने का दंभ भी भरती है साथ ही उन बोलियों के मूल में संरक्षित भी होती है। इसी कारण समग्र राष्ट्र के चिन्तन और संवाद की केन्द्रिय भाषा हिन्दी ही रही है।
विश्व के 178 देशों की अपनी एक राष्ट्रभाषा है, जबकि इनमे से 101 देश में एक से ज्यादा भाषाओं पर निर्भरता है और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि एक छोटा-सा राष्ट्र है *’फिजी गणराज्य’* जिसकी आबादी का कुल 37 प्रतिशत हिस्सा ही हिन्दी बोलता है, पर उन्होनें अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी को घोषित कर रखा है । जबकि हिन्दुस्तान में 50 प्रतिशत से ज्यादा लोग हिन्दीभाषी होने के बावजूद भी केवल राजभाषा के तौर पर हिन्दी स्वीकारी गई है।
*राजभाषा का मतलब साफ है कि केवल राजकार्यों की भाषा।*
आखिर राजभाषा को संवैधानिक आलोक में देखें तो पता चलता है कि ‘राजभाषा’ नामक भ्रम के सहारे सत्तासीन राजनैतिक दल ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। उन्होनें दक्षिण के बागी स्वर को भी समेट लिया और देश को भी झुनझुना पकड़ा दिया ।
राजभाषा बनाने के पीछे सन 1967 में बापू के तर्क का हवाला दिया गया जिसमें बापू नें संवाद शैली में राष्ट्रभाषा को राजभाषा कहा था । शायद बापू का अभिप्राय राजकिय कार्यों के साथ राष्ट्र के स्वर से रहा हो परन्तु तात्कालिन एकत्रित राजनैतिक ताकतों ने स्वयं के स्वार्थ के चलते बापू की लिखावट को ढाल बनाकर हिन्दी को ही हाशिए पर ला दिया ।
देश के लगभग १० से अधिक राज्यों में बहुतायत में हिन्दी भाषी लोग रहते हैं, अनुमानित रुप से भारत में ४० फीसदी से ज़्यादा लोग हिन्दी भाषा बोलते है । किंतु दुर्भाग्य है क़ि हिन्दी को जो स्थान शासकीय तंत्र से भारत में मिलना चाहिए वो कृपापूर्वक दी जा रही खैरात है बल्कि हिन्दी का स्थान राष्ट्र भाषा का होना चाहिए न क़ि राजभाषा का । हिन्दी का अधिकार राष्ट्रभाषा का है। *राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा बताये गये निम्नलिखित लक्षणों पर दृष्टि डाल लेना ही पर्याप्त रहेगा, जो उन्होंने एक ‘राजभाषा’के लिए बताये थे-*
(1) अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।
(2) उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार हो सकना चाहिए।
(3) यह जरूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।
(4) राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।
(5) उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्प स्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए।
इन लक्षणों पर हिन्दी भाषा खरी तो उतरी किंतु राष्ट्रभाषा होना हिन्दी के लिए गौरव का विषय होगा ।
*अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा*
संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के अशासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।
खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था, परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।
इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात विधि द्वारा
(क) अंग्रेजी भाषा का या
(ख) अंकों के देवनागरी रूप का,
ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं।
*अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के विकास के लिए निदेश*
संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करें।
हिन्दी के सम्मान की संवैधानिक लड़ाई देशभर में विगत ५ दशक से ज़्यादा समय से जारी है, हर भाषाप्रेमी अपने-अपने स्तर पर भाषा के सम्मान की लड़ाई लड़ रहा है ।
हाँ! हम भारतवंशियों को कभी आवश्यकता महसूस नहीं हुई राष्ट्रभाषा की, परन्तु जब देश के अन्दर ही देश की राजभाषा या हिन्दी भाषा का अपमान हो तब मन का उत्तेजित होना स्वाभाविक है ।जैसे राष्ट्र के सर्वोच्च न्याय मंदिर ने एक आदेश पारित दिया है कि न्यायालय में निकलने वाले समस्त न्यायदृष्टान्त व न्यायिक फैसलों की प्रथम प्रति हिन्दी में होगी, परन्तु 90 प्रतिशत इसी आदेश की अवहेलना न्यायमंदिर में होकर सभी निर्णय की प्रतियाँ अंग्रेजी में दी जाती है और यदि प्रति हिन्दी में मांगी जाए तो अतिरिक्त शुल्क जमा करवाया जाता है ।
वैसे ही देश के कुछ राज्यों में हिन्दीभाषी होना ही पीढ़ादायक होने लगा है जैसे कर्नाटक सहित तमिलनाडु, महाराष्ट्र आदि । वही हिन्दीभाषियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार भी सार्वभौमिक है । साथ ही कई जगहों पर तो हिन्दी साहित्यकारों को प्रताड़ित भी किया जाता है । ऐसी परिस्थिति में कानून सम्मत भाषा अधिकार होना यानी राष्ट्रभाषा का होना सबसे महत्वपूर्ण है ।
कमोबेश हिन्दी की वर्तमान स्थिति को देखकर सत्ता से आशा ही की जा सकती है कि वे देश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए, संस्कार सिंचन के तारतम्य में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित कर इसे अनिवार्य शिक्षा में शामिल करें । इन्हीं सब तर्कों के संप्रेषण व आरोहण के बाद ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सूर्य मिलेगा और देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी वैदिक संस्कृति व पुरातात्विक महत्व के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम जीवित रहेगा ।

*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*
संस्थापक- हिन्दीग्राम
इंदौर,मध्यप्रदेश