डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

अर्पण जैन सेंस टेक्नॉलजीस के संस्थापक हैं। यह कार्पोरेशन मध्यभारत में वेबसाइट, मोबाइल एप, पोर्टल बनाने वाली कंपनियों में शामिल है।

श्री अर्पण जैन ‘अविचल’ ने आरंभिक शिक्षा वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्धयालय कुक्षी में हासिल की और फिर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्धयालय इंदौर से इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में ग्रेजुएशन एवं एमबीए करने के बाद पीएच डी जारी है | इसके बाद उन्होंने इंदौर में अपना कारोबार संभाला और फिर डिजिटल वेब व्यवसायी के साथ साथ पत्रकारिता जगत में अपने पोर्टल एवं अख़बार ‘खबर हलचल न्यूज के माध्यम से पत्रकार और सम्पादक के रूप में पत्रकारिता जगत में अपनी विशिष्ट छवि बनाई। इस कंपनी की पहचान इन्होंने अनुशंसनीय मूल्यों के आधार पर बनाई जिसकी औद्योगिक जगत में बहुत सराहना हुई। सेंस टेक्नॉलजीस और खबर हलचल न्यूज भारत के लगभग २५ राज्यों में 180 से ज़्यादा लोगो की टीम के साथ कार्यरत पंजीकृत कंपनी है।

श्री जैन ने व्यापार के दूसरे क्षेत्रों में भी उत्कृष्ट सफलताएँ प्राप्त की हैं। पत्रकारिता से अपने गहरे सरोकार को दर्शाते हुए उन्होंने भारत के पत्रकारों के लिए पहली सोशल नेटवर्किंग साइट ‘इंडियन रिपोर्टर्स’ बनाई, जिसके फलस्वरूप पंजाब, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे भारत के सभी राज्यों के पत्रकार जुड़े हुए हैं| जैन कई कंपनियों के बोर्ड के सक्रिय सदस्य भी हैं।

श्री जैन उदार और मानवतावादी व्यक्ति हैं जो कंपनी की लोकहितकारी गतिविधियों में भी रूचि रखते हैं। इन गतिविधियों के अंतर्गत एक चैरिटेबल ट्रस्ट भी चलाया जा रहा है जिसमें 10000 से ज़्यादा लोग जुड़कर मानव सेवा के मिशन में जुड़े है | श्री जैन को लिखने-पढ़ने का जज़्बा और शौक़ है। उन्हें हिन्दी साहित्य और उर्दू शायरी से गहरा लगाव है और उनके हिन्दी भाषा के विस्तार और व्यवहार के दायरे को फैलाने उद्देश्य से ‘मातृभाषा.कॉम’ और उर्दू के विकास के लिए ‘उर्दूभाषा.कॉम’ भी शुरू की है। उन्हें संगीत से भी गहरा प्रेम है।

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

नाम: डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल

पिता: श्री सुरेश जैन

माता: श्रीमती शोभा जैन

पत्नी: श्रीमती शिखा जैन

जन्म: २९ अप्रैल १९८९

शिक्षा: बीई (संगणक विज्ञान अभियांत्रिकी)

एमबीए (इंटरनेशनल बिजनेस)

पीएचडी- भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ

 पुस्तकें:

१. मेरे आंचलिक पत्रकार ( आंचलिक पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक )

२. काव्यपथ ( काव्य संग्रह)

३. राष्ट्रभाषा (तर्क और विवेचना)

४. नव त्रिभाषा सूत्र (भारत की आवश्यकता)

५. हिन्दीग्राम

६. हिन्दी! आखिर क्यों?

 साझा संग्रह:

१ मातृभाषा एक युग मंच ( साझा काव्य) संग्रह

२. मातृभाषा. कॉम ( साझा काव्य संग्रह )

३. स्पंदन ( साझा काव्य संग्रह )
४. विचार मंथन ( साझा आलेख संग्रह )

५. कथा सेतु ( साझा लघुकथा संग्रह)

 संपादन: मातृभाषा.कॉम

 दायित्व:

राष्ट्रीय अध्यक्ष- मातृभाषा उन्नयन संस्थान

राष्ट्रीय अध्यक्ष- पत्रकार संचार परिषद

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष- राष्ट्रीय मानव अधिकार परिषद महासंघ

अध्यक्ष- सेंस फाउंडडेशन

सदस्य- इंदौर प्रेस क्लब

 पत्रकारिता:

प्रधान संपादक- खबर हलचल न्यूज ( साप्ताहिक अख़बार)

प्रधान संपादक- के एन आई न्यूज ( न्यूज एजेंसी)

प्रधान संपादक- मधुकर संदेश

  व्यवसाय:

समूह सह संस्थापक- सेंस समूह

मुख्य कार्यकारी निदेशक- सेंस टेक्नॉलोजिस

संस्थापक- मातृभाषा.कॉम

संस्थापक- हिन्दीग्राम

संस्थापक- इंडियन रिपोर्टर्स

संपर्क: +९१- ७०६७४५५४५५ | +९१-९४०६६५३००५ | +९१-९८९३८७७४५५

 

अणुडाक: arpan455@gmail.com

अंतरताना:  www.arpanjain.com

पता: एस-२०७नवीन परिसरइंदौर प्रेस क्लबम.गां. मार्ग , इंदौर (मध्यप्रदेश) ४५२००१

 सम्मान:

  1. पत्रकार विभूषण अलंकरण (आईजा, मुंबई)
  2. गणेश शंकर विद्यार्थी श्रेष्ठ पत्रकार सम्मान ( गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब, इंदौर इकाई)
  3. नगर रत्न अलंकरण ( इंदौर )
  4. काव्य प्रतिभा सम्मान (इंदौर)
  5. Leaders of Tomorrow Award (India Mart, Mumbai)
  6. नेशन प्राईड, इंडिया एक्सीलेंस अवार्ड ( प्रतिमा रक्षा मंच, दिल्ली)
  7. हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान (साहित्य संगम संस्थान, तिरोड़ी) ….. आदि

परिचय- भारत माँ के स्वाभिमान पर जब-जब भी आँच आई है तब-तब धरा पर सपूतों का जन्म हुआ है, ऐसे ही सपूत का जन्म २९ अप्रैल १९८९ शनिवार को मध्यप्रदेश के सेंधवा में पिता सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा की कुक्षी से एक क्रन्तिकारी का जन्म हुआ जिनका नाम अर्पण रखा गया। अर्पण अपने माता-पिता के दो बच्चों में से सबसे बड़े हैं। उनकी एक छोटी बहन हैं। उनके पिता सुरेश जैन गृह निर्माण और सड़क निर्माण का कार्य करते है। परन्तु पिता के कारोबार में रूचि न होने और अपनी अलग दुनिया बनाने की इच्छाशक्ति ने अर्पण को तकनिकी योद्धा बनाया।   आपके दादा बाबूलालजी एक राजनैतिक व्यक्तित्व रहे। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की छोटी-सी तहसील कुक्षी में पले बड़े, आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा फिर इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्धयालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही अर्पण जैन ने सॉफ्टवेयर व वेबसाईट का निर्माण शुरू कर दिया था। इसी दौरान सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी भी की।

एक मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले किसी भी शख्स का सपना क्या होता है? यही न कि एक अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद मोटी रकम वाली सम्मानजनक नौकरी मिल जाए। लेकिन अर्पण अपनी इस 9 से 5 वाली और मोटे वेतन वाली नौकरी से संतुष्ट नहीं थे। एक दिन उन्होंने अपने सुविधा क्षेत्र से बाहर निकलने का फैसला किया और अपना खुद का उद्यम शुरू किया। सपने बड़े होने के कारण स्वयं की कंपनी बनाने का ख्वाब पूरा करने में अर्पण जुटे तो सही परन्तु दो माह बिना नौकरी के भी घर पर ही भविष्य की रणनीति बनाने के दौरान सभी बचत ख़त्म कर चुके अर्पण के जेब में मात्र १५० रुपये ही बचे थे। मात्र १५० रुपये लेकर ११ जनवरी २०१० को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत हुई, अर्पण ने फॉरेन ट्रेड में एमबीए किया, तथा पत्रकारिता के शौक के चलते एम.जे. की पढाई भी की है। समाचारों की दुनिया ही उनकी असली दुनिया थी, जिसके लिए उन्होंने सॉफ्टवेयर के व्यापार के साथ ही खबर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की और इसे भारत की सबसे तेज वेब चैनल कंपनियों में से एक बना दिया। साथ ही ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ पर ही अर्पण ने अपना शोध कार्य किया है।  सेंस टेक्नॉलजीस और खबर हलचल न्यूज भारत के लगभग 29 राज्यों में २०० से ज़्यादा लोगो के  दल के साथ कार्यरत पंजीकृत कंपनी है।

वर्ष २०१५ में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। विवाह उपरांत भी तन्मयता से पत्रकारिता और भाषा के सौंदर्य को स्थापित करने के लिए श्री जैन सतत संघर्षरत रहे। आपने अपनी कविताओं, आलेखों  के माध्यम से भी समाज की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा हैं और आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता के आधार आंचलिक पत्रकारिता और समाज के लिए ज़्यादा लिखा हैं।

अर्पण ने व्यापार के दूसरे क्षेत्रों में भी उत्कृष्ट सफलताएँ प्राप्त की हैं। पत्रकारिता से अपने गहरे सरोकार को दर्शाते हुए उन्होंने भारत के पत्रकारों के लिए पहली सोशल नेटवर्किंग साइट ‘इंडियनरिपोर्टर्स.कॉम (www.IndianReporters.com)’  बनाई, जिसके फलस्वरूप पंजाब, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे भारत के सभी राज्यों के पत्रकार जुड़े हुए हैं। जैन ने कई संस्थाओं के साथ जुड़ कर पत्रकारिता के क्षेत्र में भी और अन्य सामाजिक कार्यों और जनहितार्थ आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है।

समाचारों की दुनिया से जुड़े होने के कारण अर्पण का हिन्दी प्रेम प्रगाड़ होता चला गया, इसी के चलते वर्ष २०१६ में अर्पण ने मातृभाषा.कॉम की शुरुआत की और फिर तब से लेकर आज तक हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रतिबद्ध होकर कार्यरत रहे। इस दौरान भारत के विभिन्न राज्यों में हिन्दी भाषा के महत्व को स्थापित करने के लिए यात्राएँ की, जनमानस को हिन्दी से जोड़ा, और मातृभाषा उन्नयन संस्थान और हिन्दी ग्राम की स्थापना की।  हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सतत प्रयासरत है, इसी प्रकल्प में योगगुरु और पतंजलि योगपीठ के सूत्रधार स्वामी रामदेव जी का आशीर्वाद मिला। वर्तमान में हिन्दी के गौरव की स्थापना हेतु व हिन्दी भाषा को राजभाषा से राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्षरत डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ भारतभर में इकाइयों का गठन करके आंदोलन का सूत्रपात कर रहे हैं, और वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी है और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं।  डॉ. वेद प्रताप वैदिक के संरक्षण में संस्थान देश भर में हस्ताक्षर बदलो अभियान संचालित कर रही हैं। हिंदी योद्धा, संगणक योद्धा और संवाद सेतु के माध्यम से सम्पूर्ण भारत में हिन्दी का प्रचार प्रयास कर रहे है।

डॉ अर्पण जैन अविचल का ध्येय वाक्य है ‘हिंदी के सम्मान में, हर भारतीय मैदान में’ इसी को सम्पूर्ण राष्ट्र का समर्थन मिल रहा है। डॉ जैन ‘एक घंटा राष्ट्र को, एक घंटा देह को और एक घंटा हिन्दी को’ जैसी मांग भी जनता से कर रहे है, जिसे भरपूर समर्थन मिल रहा है।

डॉ अर्पण जैन अविचल कहते है कि ‘हिन्दी भाषा भारत की सांस्कृतिक अखंडता को मजबूत करने में अग्रणी कारक है, हिन्दी के माध्यम से ही भारत के संस्कार बचे है क्योंकि हमारे राष्ट्र में संस्कार देने दादी-नानी की कहानियां महनीय भूमिका अदा करती है, ऐसे में दादी-नानी की कहानियों की भाषा हिन्दी है, इसलिए हिन्दी युग के निर्माण हेतु हिन्दी का संरक्षण और प्रचार-प्रसार आवश्यक है। तभी भारत के संस्कार बचेंगे और भारत बचेगा वर्ना  गुलामी की स्थिति बनेगी।’

आत्मकथ्य: साहित्य सदन की पीड़ा को मैंने अपने अन्दर जीने की जिद में लेखन को अपना शौक बनाया| बतौर पत्रकार जनमंच की वेदना को ख़बरों में उकेरने के प्रयास के चलते मैं हिन्दी से प्रेम करता चला गया, यही कारण लेखन के क्षेत्र में मेरे आने का भी रहा| काव्य से ज़्यादा राजनैतिक विषयों पर टिप्पणियाँ मेरे लेखन की पहचान भी है और प्रवीणता भी उसी में ज़्यादा हैं |

देश के लगभग सभी प्रसिद्ध और बड़े अख़बारों में मेरा लेखन प्रकाशित होता रहता हैं, जनसत्ता, अमरउजाला, हरभूमि, दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, दिव्य भास्कर, समाज्ञा, मुंबई मिरर, महाराष्ट्र संदेश, इंदौर समाचार, उत्तरांचलदीप, सवेरा टाइम्स, पंजाब केसरी, पांचजन्य, सामना, स्वदेश, नवभारत टाइम्स, नवभारत, उत्तम हिंदू, सनातन प्रभात, यशोभूमि, उत्तरउजाला, जगमार्ग, राँची एक्सप्रेस, लोकजंग, जनपथ, नेशनल हेराल्ड, ग्लोबल हेराल्ड, दबंग दुनिया, पीपुल्स समाचार, अपनी दुनिया, आदि में संपादकीय आलेखों को स्थान मिलता रहता हैं |

किन व्यक्तित्व से मैं सदा प्रभावित रहा:

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, बाबा नागार्जुन, धूमिल, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, बाबू विष्णु पाराडकर, गणेशचंद्र विद्धयार्थी, प. दीनदयाल उपाध्याय ( एकात्मवाद के कारण), डॉ. अबुल पॅकिर जेनुलआबदीन अब्दुल कलाम, राजेंद्र माथुर( रज्जु बाबू) धीरू भाई अंबानी( रिलायंस), वारेन बफ़ेट(बर्कले हैथशायर), स्टीव जॉब्स (एपल) डॉ. प्रीति सुराना (अंतरा शब्दशक्ति)|

पाठकों के लिए: बेहतर रचना लिखने के लिए बेहतर पढ़ना श्रेष्ठ होता है,एक अच्छा पाठक ही लेखन के उद्देश्य को अपनी सम्पूर्णता तक पहुंचाता है | काव्य सृजन भी मानस के अन्तस तक उतरने वाला वह प्रयास हैं जिसमे भाव के रास्ते ह्रदय के तम को उजास प्रदान करना होता हैं | प्रतिक्रिया रूपी शब्द तरकश सृजक की प्रेरणा होती हैं |

मातृभाषा के प्रति: मातृभाषा.कॉम के प्रयास हिन्दी को ‘राजभाषा से राष्ट्रभाषा’ बनाने की ओर बहुत ही सार्थक कदम हैं, हिन्दी अभी तक साहित्य के बुनकरों के झोले में कैद-सी थी, जिसे अंतरताना के माध्यम से वैश्विक मंच तक और अंचल के हिन्दीभाषियों तक पहुंचाकर हिन्दी का गौरव स्थापित किया जा रहा हैं।

व्यक्तित्व (कार्य करने का तरीका) : किसी भी परिस्थिति में न हारना न अपने समूह को हारने देने के मूल वाक्य की तरह ही डॉ. अर्पण जैन अविचल कार्य करते हैं । ज़िद करों- दुनिया बदलोको मैं अपना कर्म वाक्य मानता हूँ ।

 संघर्ष काल- व्यापार के बालपन में ही संघर्ष का कठिन काल मेरे जीवन में आया जिस दौरान आर्थिक नुकसान भी बहुत उठाया, इसी दौरान मेरे माता-पिता और परिवार के सहयोग से पुन: स्थापित हो पाया और उसके बाद जीवन का लक्ष्य ही बदल गया । हिन्दी भाषा के गौरव की स्थापना का ध्येय भी इसी दौरान चुना।

सफलता का राज: ‘मेहनत इतनी खामोशी से करो, कि सफलता शौर मचा दें’ इसी तथ्य के साथ सतत मेहनत और श्रम किया जाए तो जीवन में असफलता कभी छू भी नहीं सकती ।

सबसे बड़ी उपलब्धि: जीवन में सबसे पहली और बड़ी उपलब्धि यह रही की उम्र के मात्र २१वें वर्ष में ही जिस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में कार्य किया उसे खरीद कर अपनी ज़िद को साबित किया । फिर महज ५ वर्षों में ही पत्रकारिता जगत से लेकर साहित्य की दुनिया में एक अदद पहचान कायम कर सकने में कामयाब रहा ।

भविष्य की योजना: वैसे तो अब संपूर्ण जीवन ही हिन्दी की सेवा में समर्पित कर चुका हूँ तो इसी तारतम्य में हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाना तथा हिन्दी को संपूर्ण राष्ट्र के अभिमान स्वरूप जनभाषा के रूप में स्थापित करवाने में हर संभव गतिशील रहना ही मेरे भविष्य की योजनाओं में शामिल हैं। साथ ही भारत में पत्रकारिता की शुचिता हेतु कार्य करना भी लक्ष्य हैं ।

समाज को संदेश: समाज में निरंतर मानवता की हत्या सारे आम हो रही है, सबसे पहले हम भी मानव बने और बच्चों को मानव बनाएँ इसके बाद हमेशा ज़िद करो तभी दुनिया बदलने का माद्दा रख पाओगे क्योंकि ये दुनिया जिद्दी व्यक्तियों ने ही बदली है, बाकी ने उन जिद्दी लोगों का अनुसरण ही किया है । मेहनत का कोई अन्य विकल्प नहीं होता, केवल भाग्य के भरोसे या शार्टकट से कोई सफलता नहीं मिलती।